कुंडलिया ****** ----ओंकार सिंह विवेक सर्दी से यह ज़िंदगी , जंग रही है हार, हे भगवन! अब धूप का,खोलो थोड़ा द्वार। खोलो थोड़ा...
आपके स्नेह-आशीष की अभिलाषा के साथ आज अपने जन्मदिन के अवसर पर एक ग़ज़ल के साथ आपसे मुखातिब हूँ : ग़ज़ल ...