May 15, 2026
'सदीनामा' कोलकता का हार्दिक आभार 🙏
May 13, 2026
चंद शेर मुलाहिज़ा फरमाएँ
May 9, 2026
शायरी ही शायरी
April 21, 2026
दो शब्द 'कुछ मीठा कुछ खारा' के बारे में
April 20, 2026
मुलाक़ात के हसीन लम्हे
मुंबई निवासी श्री प्रदीप गुप्ता जी,पूर्व स्टेट बैंक अधिकारी/साहित्यकार/यूट्यूबर/ब्लॉगर/पॉडकास्टर कल शाम चाय पर हमारे ग़रीबखाने पर पधारे।श्री गुप्ता जी मूलतय: मुरादाबाद के निवासी हैं परंतु अब स्थाई रूप से मुंबई में बस गए हैं।आपसे सोशल मीडिया के कई माध्यमों से अक्सर संवाद होता रहता है।परंतु उनसे रूबरू यह मेरी पहली मुलाक़ात थी।
आदरणीय प्रदीप गुप्ता जी की सदाशयता, विनम्रता और सकारात्मक ऊर्जा ने बहुत प्रभावित किया। अनौपचारिक माहौल में काफ़ी देर आपसे तमाम सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर खुलकर बातचीत हुई।आदरणीय गुप्ता जी के अचानक आगमन के कारण अपने सभी साहित्यिक मित्रों को विधिवत आमंत्रण देकर उनके सम्मान में हम कोई बड़ा कार्यक्रम तो नहीं कर पाए परंतु फिर भी कुछ साहित्यिक मित्र एक short notice पर उनकी मेज़बानी के लिए एकत्र हो गए इसके लिए उन सभी दोस्तों का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
चाय पर चर्चा के दौरान अच्छी ख़ासी कविता/शायरी भी हो गई। श्री गुप्ता जी को मैंने अपने दूसरे ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' की प्रति भी भेंट की।
श्री प्रदीप गुप्ता जी की मेज़बानी का अवसर पाकर प्रसंगवश मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का यह शेर याद आ रहा है :
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।
इस अवसर पर अपने साहित्यिक मित्रों को भी अपने ग़ज़ल संग्रह की प्रतियाँ भेंट कीं :
निःसंदेह ऐसे अवसर जीवन को एक नई आशा,ऊर्जा और उत्साह से भर देते हैं।
--- ओंकार सिंह विवेक
April 16, 2026
हँसते-हँसते कट जाएँ रस्ते
April 6, 2026
अपनी बात ग़ज़ल के साथ
March 29, 2026
प्रसंगवश सृजित रचनाएँ
March 21, 2026
चतुर सुजान
जिसकी बनती हो बने, सूबे में सरकार।
हर दल में हैं एक-दो, उनके रिश्तेदार।।
उनके रिश्तेदार, रोब है सचमुच भारी।
सब साधन हैं पास,नहीं कोई लाचारी।
अब उनकी दिन-रात,सभी से गाढ़ी छनती।
बन जाए सरकार,यहाँ हो जिसकी बनती।।
-- ओंकार सिंह विवेक(सर्वाधिकार सुरक्षित)
March 8, 2026
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष
March 3, 2026
👩🦯👩🦯होली पर इस बार 🖍️🖍️
प्रस्तुत हैं होली पर कुछ दोहे
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सैयाँ जी ने घेरकर, डारो ऐसो रंग।
नस-नस में सिहरन हुई,भीज गयो हर अंग।।
कर में पिचकारी लिए,पीकर थोड़ी भंग।
देवर जी डारन चले,भौजाई पर रंग।।
महँगाई की मार से,टूट गई हर आस।
रमुआ की इस बार भी,होली रही उदास।।
सजनी को कैसे फबे,होली का त्योहार।
बैठे हों जब साजना, सात समुंदर पार।।
है बस इतनी कामना, होली पर हर बार।
करें सभी अपनत्व के, रंगों की बौछार।।
©️ ओंकार सिंह विवेक
February 23, 2026
लीजिए पेश है नई ग़ज़ल
February 20, 2026
प्रसंगवश
कैसी-कैसी ने'मत हमको जंगल देते हैं।
आज बना है मानव उनकी ही जाँ का दुश्मन,
जीवन भर जो पेड़ उसे मीठे फल देते हैं।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
February 15, 2026
उनके हिस्से चुपड़ी रोटी ------
और हमारी क़िस्मत,हमको रूखी-सूखी खानी है।
जनता की आवाज़ दबाने वालो इतना ध्यान रहे,
कल पैदल भी हो सकते हो आज अगर सुल्तानी है।
प्यार लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,
ऐसे ही थोड़ी धरती की चूनर धानी-धानी है।
फ़स्ल हुई चौपट बारिश से और धेला भी पास नहीं,
कैसे क़र्ज़ चुके बनिये का मुश्किल में रमज़ानी है।
खिलने को घर के गमलों में चाहे जितने फूल खिलें,
जंगल के फूलों-सी लेकिन बात न उनमें आनी है।
एक झलक पाना भी अब तो सूरज की दुश्वार हुआ,
जाने ज़ालिम कुहरे ने ये कैसी चादर तानी है।
बात न सोची जाए किसी की राह में काँटे बोने की,
ये सोचें फूलों से कैसे सबकी राह सजानी है।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
February 8, 2026
भावों की अभिव्यक्ति
February 6, 2026
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग -3/अंतिम कड़ी )
यह☝️ विशाल धमेख स्तूप है। यह वह पवित्र स्थान है, जहां ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।धमेख स्तूप: एक विशाल और ठोस गोलाकार स्तूप है, जो उस स्थान को चिह्नित करता है जहाँ बुद्ध बैठे थे। इसे गुप्त काल के दौरान और अधिक विकसित और विस्तारित किया गया था।धमेख स्तूप के पास ही सम्राट अशोक द्वारा स्थापित एक भव्य स्तंभ (अशोक स्तंभ) था (जिसका शीर्ष अब सारनाथ संग्रहालय में है)जो आज भी इस स्थल के महत्व को दर्शाता है।भारत का राष्ट्रीय चिह्न जो हमारे नोटों में भी दर्शाया गया है इसी अशोक स्तंभ से लिया गया है।हम लोग सारनाथ (वाराणसी) में पीपल के वृक्ष के पास स्थित भगवान बुद्ध को समर्पित बौद्ध मंदिर (विशेषकर मूलगंध कुटी विहार) में दर्शन करने के लिए पहुँचे। यह उसी पवित्र स्थान के निकट है जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था।सन 1931 में निर्मित यह मंदिर ध्यान और बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र प्रवर्तन' (प्रथम उपदेश) की याद दिलाता है।
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बहुुुत कम लोग ऐसे होते हैैं जिनको अपनी रुचि के अनुुुसार जॉब मिलता है।अक्सर देेखने में आता है कि लोगो को अपनी रुचि से मेल न खाते...
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शुभ प्रभात मित्रो 🌹🌹🙏🙏 संगठन में ही शक्ति निहित होती है यह बात हम बाल्यकाल से ही एक नीति कथा के माध्यम से जानते-पढ़ते और सीखते आ रहे हैं...