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चुनावी मौसम पर कुंडलिया

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कुंडलिया : चुनावी मौसम            --ओंकार सिंह विवेक खाया  जिस  घर  रात-दिन,नेता जी ने  माल, नहीं  भा  रही  अब  वहाँ, उनको  रोटी-दाल। उनको  रोटी-दाल , बही   नव   चिंतन  धारा, छोड़   पुराने   मित्र , तलाशा   और   सहारा। कहते  सत्य  विवेक,नया  फिर  ठौर  बनाया, भूले  उसको  आज ,जहाँ  वर्षों  तक खाया।           ---ओंकार सिंह विवेक           (सर्वाधिकार सुरक्षित) चित्र : गूगल से साभार चित्र : गूगल से साभार

लोहड़ी व मकर संक्रांति

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💥दोहे:मकर संक्रांति पर💥                   -–-ओंकार सिंह विवेक  💥   सूरज  दादा  चल   दिए ,अब  उत्तर  की  ओर,   शनैः-शनैः  कम  हो रहा,शीत  लहर  का ज़ोर।  💥   दिखलाकर सबको यहाँ, प्रतिदिन नए  कमाल,   सर्दी   रानी   जा   रहीं  ,  ओढ़े  अपनी  शाल। 💥  शुद्ध  भाव  से  कीजिए , भजन-साधना-ध्यान,  पर्व   मकर   संक्रांति  का , देता  है  यह  ज्ञान। 💥  समरसता  है  बाँटता ,  खिचड़ी  का  यह  पर्व,  करें न क्यों संक्रांति पर, फिर  हम  इतना गर्व। 💥   जीवन  में   उत्साह   का , हो  सबके    संचार,   कहता है   संक्रांति  का , यह  पावन  त्योहार।  💥                                 ---–ओंकार सिंह विवेक                                        सर्वाधिकार सुरक्षित      

हाड़ कँपाती सर्दी आई है

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वृक्षों के संरक्षण को लेकर

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           कुंडलिया          ---ओंकार सिंह विवेक ********************************* देते   हैं  सबको  यहाँ,प्राणवायु   का   दान, फिर भी वृक्षों की मनुज,लेता है नित जान। लेता है नित जान, गई  मति  उसकी  मारी, जो वृक्षों पर आज,चलाता पल-पल आरी। कहता सत्य विवेक,वृक्ष हैं कब कुछ  लेते, वे तो  छाया-वायु,,फूल-फल  सबको  देते।  ********************************         ---ओंकार सिंह विवेक (सर्वाधिकार सुरक्षित)

बड़ी दिलकश तुम्हारी शायरी है

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ग़ज़ल--  ©️ओंकार सिंह विवेक ©️ यूँ   लगता   है,  गुलों   की  ताज़गी  है, बड़ी    दिलकश   तुम्हारी   शायरी   है। कमी   कुछ  आपसी   विश्वास   की  है,  अगर  बुनियाद  रिश्तों   की   हिली  है। न   जाने     ऊँट   बैठे    कौन   करवट, दिये   की   फिर   हवाओं   से  ठनी  है। ©️ ज़ुबां  से   फिर  गया  है  वो   भी  देखो, जिसे   समझा,   उसूलों   का   धनी  है। किए    हैं    तीरगी    से    हाथ   दो-दो, मिली   यूँ   ही    नहीं   ये    रौशनी   है। सो  उसकी   फ़िक्र तो  होगी ही   आला, किताबों   से    जो   गहरी    दोस्ती   है। 1 सदा  है   मौत   के  साये   में,  फिर  भी, सँवरती   और     सजती     ज़िंदगी   है।        ----©️ ओंकार सिंह विवेक

कुंडलिया : सर्दी के नाम

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कुंडलिया  ******         ----ओंकार सिंह विवेक सर्दी  से   यह  ज़िंदगी , जंग   रही  है  हार, हे भगवन! अब  धूप का,खोलो  थोड़ा द्वार। खोलो   थोड़ा   द्वार,  ठिठुरते  हैं   नर-नारी, जाने  कैसी  ठंड , जमी  हैं   नदियाँ  सारी। बैठे  हैं  सब  लोग ,पहन   कर   ऊनी  वर्दी, फिर भी रही न छोड़,बदन को  निष्ठुर सर्दी।            ---ओंकार सिंह विवेक चित्र--गूगल से साभार चित्र--गूगल से साभार

मिला है ख़ुश्क दरिया देखने को

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ग़ज़ल-- ©️ओंकार सिंह 'विवेक' ©️ मिला  है  ख़ुश्क  दरिया  देखने को, मिलेगा  और  क्या-क्या देखने को। किसी  मुद्दे  पे  सब  ही एकमत हों, कहाँ  मिलता  है  ऐसा  देखने  को। तो   गुजरेंगे  अजूबे  भी   नज़र  से, अगर निकलोगे  दुनिया  देखने को। ©️ किसी  के  पास  है  अंबार  धन का, कोई  तरसा  है   पैसा   देखने  को। सुना  आँधी  को  पेड़ों  से  ये कहते, तरस   जाओगे   पत्ता   देखने  को। बना था ज़ेहन में कुछ अक्स वन का, मिला  कुछ  और  नक़्शा देखने को। नज़र   दहलीज़   से   कैसे  हटा  लूँ, कहा   है   उसने  रस्ता   देखने  को।     --- ©️ ओंकार सिंह 'विवेक'
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Onkar Singh 'Vivek'
Voluntarily retired Bank Manager. Was editor of bank's esteemed house magazine 'Bulandiyan' for one year.I am a poet, freelance content writer and thinker. So far many creative writings of mine have been published in various leading magazines and news papers. For over 30 years I have been associated with All India Radio Rampur (UP) as a poet and writer. Member of S W A Mumbai.Many literary organizations like A B D S Academy Delhi,Ghazal Kumbh Delhi,Saini Samaj Delhi and Nirjhar Sahityik Sanstha Kasganj,UP have honoured me for my literary works. Published books to my credIt: "दर्द का एहसास " ग़ज़ल -संग्रह

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