June 30, 2026

यादों के झरोखों से

'सदीनामा' कोलकता से प्रकाशित होने वाला एक प्रतिष्ठित अख़बार है जो अपनी बेबाक राय के लिए जाना जाता है। इस समाचार पत्र में विभिन्न ज्वलंत विषयों पर बहुत सार्थक सामग्री प्रकाशित होती है।अख़बार से जुड़े जनाब ओमप्रकाश नूर साहब जैसे उम्दा अदीब सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उच्च कोटि की साहित्यिक सामग्री भी इस अख़बार के लिए जुटाते हैं, जो बहुत ही नेक काम है। मैं अख़बार के संपादक मंडल, ख़ास तौर से श्री ओमप्रकाश नूर साहब,का दिली शुक्रिया अदा करता हूँ कि मेरी ग़ज़लों को अक्सर ही इस सम्मानित अख़बार में जगह देते हैं 🌹🌹🙏🙏


-- ओंकार सिंह विवेक 
ग़ज़लकार/समीक्षक/स्वतंत्र विचारक/कॉन्टेंट राइटर/टैक्स्ट ब्लॉगर 


June 24, 2026

जंगल,नदी,पहाड़


कुछ विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों के कारण काफ़ी दिन से ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं लिखी थी।इधर पर्यावरण प्रदूषण के भयंकर दुष्परिणामों और मानवीय असंवेदनशीलता से हृदय उद्वेलित हुआ तो ये दोहे सृजित हुए जो आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए प्रस्तुत हैं 

जंगल  नदी  पहाड़  को, करता   रहा  निढाल।

ले  अब  तू  भी  देख  ले,मानव  अपना हाल।।


रोने   की   हो  बात   तो,हँस   पड़ते  हैं  लोग।

किस सीमा तक बढ़ गए,आज मानसिक रोग।।

         --- ओंकार सिंह विवेक 


     सारनाथ 👇




June 16, 2026

उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई की 13 वीं काव्य गोष्ठी/निशस्त


साहित्य और साहित्यकारों का काम हमेशा से अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक सरोकारों की पैरवी करना और आपसी सौहार्द को बढ़ाना रहा है। जब-जब लोग इंसानियत और मेलजोल के रास्ते से भटके हैं, साहित्यकारों ने तब-तब अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को प्रेम,शांति,सद्भाव तथा आपसी सौहार्द का संदेश देकर जागरूक करने का प्रयास किया है।
अपने इन्हीं दायित्वों को पूरा करने की कड़ी में 
उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई की 13 वीं काव्य गोष्ठी/निशस्त सभा के नए संरक्षक शायर नईम नज्मी जी के सौजन्य से सौलत पब्लिक लाइब्रेरी रामपुर में  सफलतापूर्वक संपन्न हुई।गोष्ठी की अध्यक्षता लाइब्रेरी के सद्र जनाब डॉo महमूद अली ख़ान साहब ने की तथा जावेद रहीम जी,नईम नज्मी जी तथा ओंकार सिंह विवेक क्रमशः मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथि के तौर पर मंच पर विराजमान रहे।

गोष्ठी में पधारे रचनाकारों ने समसामयिक विषयों पर अपनी धारदार रचनाओं के पाठ से आमंत्रित श्रोताओं तथा मेहमानों का दिल जीत लिया। काव्य रचनाओं में हिन्दी एवं उर्दू का अद्भुत संगम देखने को मिला,जो आज की एक बड़ी ज़रूरत भी है।
अपने दिलकश तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ते हुए सभा के सचिव राजवीर सिंह राज़ ने कहा 

दर्द    में    भी    मुस्कुराकर  देखना,

ज़ब्त  अपना   आज़माकर   देखना।

जान लेंगे  हम भी तेरे दिल की बात,

गीत   कोई     गुनगुनाकर    देखना।

 जावेद रहीम जी ने आज के इंसान की हक़ीक़त कुछ इस तरह बयान की

अपने हमदर्दों को अपना ही दर्द बनते देखा है,    

बदलते  इंसानों  को  बहुत  करीब  से  देखा है।

डॉ प्रीति अग्रवाल ने वृक्षों की महत्ता का बखान करते हुए अपने दोहे पढ़े 

वृक्ष  हमारा  हर  तरह, रखते हरपल ध्यान। 

बिन इनके पाता नहीं, ऑक्सीजन इंसान ।।

वृक्षों  ने हम  पर  किया, सदा-सदा उपकार। 

मानव   है   इनके  बिना, सारा  ही  बेकार ।।

उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई के अध्यक्ष ओंकार सिंह विवेक ने बिगड़ी हुई व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए जब ये अशआर पढ़े तो श्रोताओं ने बार-बार तालियाँ बजाकर उत्साहवर्धन किया 


पेट   हमारा   भरते   हैं   वो   वा'दों-ना'रों   से,

ये  कैसी  हमदर्दी  है  हम  ग़म   के   मारों  से।

बोलो क्यों तासीर तुम्हारी आज ख़िज़ाँ-सी है?

पूछ  रहे  हैं  गुलशन  के  सब  फूल  बहारों से। 

            -- ओंकार सिंह विवेक 

सुधाकर सिंह परिहार जी ने इंसान को अपनी ताक़त पहचानने के लिए प्रेरित करते हुए कहा 

अपनी कमजोरी निर्बलता का रोना इंसान कब तक  रोयेगा।। ये बेबसी और लाचारी कब तक ढोयेगा ।। वो पकड़े तो सहे खींचे तो सही ईश्वर के‌ पास सबकी डोर है।।बस एक बार वो  सोचे क्या वो पशु पक्षी से भी कमजोर है।।... सुधाकर सिंह परिहार

सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष फ़ैसल मुमताज़ ने अपने

ख़यालात का इज़हार करते हुए कहा 

वो जिससे दिल दुखे इंसानियत का! 

उन्हीं लफ़्ज़ों को बोला जा रहा है!!

सहारा लेकर सोशल मीडिया का!!!

फ़ज़ा में ज़हर घोला जा रहा है!!

रश्मि चौधरी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा 

तुम वजह ना पूछो मुस्कुराने की 

मुझको आदत है गम छुपाने की

सभा के सह सचिव सुमित सिंह मीत ने अपने धारदार अशआर पढ़ते हुए कहा 

चलो माना कि इंग्लिश जानते हो 

तो क्या हिंदी को भी पहचानते हो? 

तुम्हें बच्चों की ग़लती दिख रही है 

कहा तुम कब बड़ों का मानते हो

स्थानीय इकाई के संयोजक सुरेंद्र अश्क रामपुरी ने अपने इन जदीद शेरों से सबका ध्यान खींचा 

आँधियों का दम निकाला जाएगा

अब दिये में खून डाला जाएगा

कब सियासत को समझ पाएंगे हम 

कब इन आँखों से ये जाला जायेगा

जनगणना के दौरान आम जनता द्वारा किए जा रहे सवालों  पर आधारित गीत पेश करते हुए सचिन सार्थक ने कहा 

बेटा पढ़ा लिखा है , क्या 

कोई काम लगा सकते हो ?

बियाह रचाना है बेटी का 

कुछ मदद दिला सकते हो?  

जन - बच्चा सब गिने

 हमारे घर - दीवारें जाने 

एक ईंट भी लगवा दो 

तो तुम्हें काम का मानें 

अगर नहीं तो क्यों छूते हो 

टूटा दिल , अंगार से ?

सभा के संरक्षक शायर नईम नज्मी साहब ने अपने ये बेहतरीन अशआर तरन्नुम में पेश करके भरपूर दाद पाई 

मेरी उड़ान पे कोई असर हुआ ही नहीं 

मुनाफिकों ने परों को कतर के देख लिया 

सिवाए मेरे कोई आँख नम हुई ही नहीं

ऐ जिन्दगी तुझे सौ बार मर के देख लिया 

उल्लिखित कवि शायरों के अलावा गौरव नायक, इफ्तेख़ार साहिल,ज़ीशान मुराद, शिव कुमार चन्दन, पतराम सिंह, जसप्रीत कौर जस्सी तथा नवीन पाण्डेय -----     आदि ने भी गोष्ठी में अपना शानदार कलाम पेश किया। लाइब्रेरी के सद्र जनाब डॉo महमूद अली ख़ान साहब ने काव्य पाठ करने वाले सभी कवियों/शायरों को प्रतीक चिह्न प्रदान करके उनके प्रति सम्मान प्रकट किया।

अपने उद्बोधन में जनाब डॉo महमूद अली ख़ान साहब ने गोष्ठी को कामयाब बताते हुए सभी को मुबारकबाद पेश की।

(साहित्यकारों/अदीबों को संबोधित करते हुए लाइब्रेरी के सद्र जनाब डॉo महमूद अली ख़ान साहब)

 उन्होंने भविष्य में भी पारस्परिक मेलजोल तथा सौहार्द बढ़ाने वाले ऐसे कार्यक्रमों के आयोजनों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। सूक्ष्म जलपान के बाद गोष्ठी/निशस्त के समापन की घोषणा की गई।कार्यक्रम का सफल संचालन सचिव राजवीर सिंह राज़ द्वारा किया गया।

हम सौलत पब्लिक लाइब्रेरी के सद्र डॉo महमूद अली ख़ान साहब तथा अन्य पदाधिकारियों सहित श्री नईम नज्मी साहब का इस सुंदर आयोजन में मन से सहयोग करने के लिए दिल की गहराईयों से आभार व्यक्त करते हैं 🌹🌹🙏🙏

प्रस्तुतकर्ता 
ओंकार सिंह विवेक 
अध्यक्ष,उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई 

गंगा-जमुनी तहज़ीब को फ़रोग़ देने के मक़सद से आयोजित किए गए इस कार्यक्रम की समाचार पत्रों द्वारा शानदार कवरेज करने के लिए हम उनका हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं 🙏
       



June 9, 2026

चिंतन प्रवाह

नमस्कार मित्रो🌹🌹🙏🙏

आजकल पारिवारिक कठिनाइयों से गुज़रना हो रहा है इसलिए लिखना-लिखाना कम ही हो पा रहा है। परंतु साहित्य साधक अपने सृजन हेतु चाहे जैसे भी हो ,वक़्त निकाल ही लेता है। ख़ैर छोड़िए इन बातों को, सुख-दुःख तो इंसान की ज़िंदगी में लगे ही रहते हैं। कठिनाइयाँ जीवन को और मज़बूत बनाती हैं।
लीजिए पेश है मेरी एक ग़ज़ल।इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराइए 

                            ग़ज़ल 
                            *****
              साँस लेते   ही   मैं  निढाल हुआ,
             हाय!कैसा हवा  का  हाल  हुआ।  

             जो  गुमाँ  में  नहीं  था  मेरे  कभी,
             उनकी जानिब से वो सवाल हुआ।

             बात   पहले-सी   तो   नहीं  आई,
             उनसे  रिश्ता  मगर  बहाल  हुआ।

             ख़ुद  उतरता   गया   वो  शीशे  में,  
             एक   ही  पैग   में   कमाल  हुआ।

             अच्छी  तक़रीर  कर  गए  हज़रत,
              शहर  में हर तरफ़  वबाल  हुआ।

             उसको  होना   ही    था    धराशायी,
              जिस क़दर पुल में  गोलमाल हुआ।
                         --- ओंकार सिंह विवेक 


June 1, 2026

दिल की बात ग़ज़ल के साथ


आपके स्नेह-आशीष की अभिलाषा के साथ आज अपने जन्मदिन के अवसर पर एक ग़ज़ल के साथ आपसे मुखातिब हूँ :
                    ग़ज़ल 
                    *****
            कुओं-तालों में  अब पानी   नहीं  है,
            नदी   में  भी   वो  तुग़्यानी  नहीं  है।

           सभी के ज़ख्मों पर रखना है मरहम,
            किसी को  चोट  पहुँचानी  नहीं  है।

            दुखों  में  भी  ये  कहते  थे पिता जी,
            मुझे   कुछ   दुख-परेशानी  नहीं  है।   

            करे  जो ज्ञान  पर  अभिमान  अपने,
            वो कुछ भी हो  मगर ज्ञानी  नहीं  है।

            ख़ुदा-रा  ख़त्म  हो   ये   दौर    इसमें,
            उसूलों   की   निगहबानी   नहीं    है।

            चुनावी    घोषणा     ठहरी     चुनावी,
            'अमल  में  वो  कभी  आनी  नहीं  है।

            समझते हो तुम इसको जितना आसाँ, 
             ग़ज़ल  में  उतनी  आसानी  नहीं   है।
                       ---- ओंकार सिंह विवेक 





         




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