आपके स्नेह-आशीष की अभिलाषा के साथ आज अपने जन्मदिन के अवसर पर एक ग़ज़ल के साथ आपसे मुखातिब हूँ :
ग़ज़ल
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कुओं-तालों में अब पानी नहीं है,
नदी में भी वो तुग़्यानी नहीं है।
सभी के ज़ख्मों पर रखना है मरहम,
किसी को चोट पहुँचानी नहीं है।
दुखों में भी ये कहते थे पिता जी,
मुझे कुछ दुख-परेशानी नहीं है।
करे जो ज्ञान पर अभिमान अपने,
वो कुछ भी हो मगर ज्ञानी नहीं है।
ख़ुदा-रा ख़त्म हो ये दौर इसमें,
उसूलों की निगहबानी नहीं है।
चुनावी घोषणा ठहरी चुनावी,
'अमल में वो कभी आनी नहीं है।
समझते हो तुम इसको जितना आसाँ,
ग़ज़ल में उतनी आसानी नहीं है।
---- ओंकार सिंह विवेक