July 13, 2026

ताना-बाना

नई ग़ज़ल का आनंद लीजिए साथियो 🥀🥀🙏🙏

                ग़ज़ल 
                 ****
इतने   उलझे    संबंधों     के    ताने-बाने   हैं,
अपने   भी   लगता  है  अब  जैसे  बेगाने  हैं।

करते    हैं    पैरोकारी    तहज़ीब-तमद्दुन   की,
आज भी अपने क़ौल के पक्के लोग पुराने हैं।

लोग सियासत में आते हैं और ही  मक़सद से,
जन-सेवा  के  दा'वे - ना'रे  महज़   बहाने  हैं।

हँसते-हँसते  लाँघ  गए हैं  साहस के  बल पर,
बाधाओं  के पर्वत  को   हम   कब  गर्दाने हैं?

वक़्त की थोड़ी-सी  भी पहले क़द्र नहीं जानी,
वक़्त गँवाने  वालों  के अब  होश  ठिकाने हैं।

बच्चों  के होठों पर  नित  मुस्कान सजाने को,
अम्मा-बापू को जीवन भर  अश्क  छुपाने  हैं।

सिर्फ़ लतीफ़े  सुनने  के 'आदी  हों लोग जहाँ,
छोड़ो,ऐसी महफ़िल  में  क्या  शेर  सुनाने  हैं?

झोपड़ियाँ  ही  ज़द  में   आएँगी  महँगाई  की,
उनका  क्या  बिगड़ेगा   वो   तो  राजघराने हैं।
            ---- ओंकार सिंह विवेक 


टिप्पणियाँ

Post a Comment

Featured Post

ताना-बाना

नई ग़ज़ल का आनंद लीजिए साथियो 🥀🥀🙏🙏                 ग़ज़ल                   **** इतने   उलझे    संबंधों     के    ताने-बाने   हैं, अपने  ...