April 21, 2026

दो शब्द 'कुछ मीठा कुछ खारा' के बारे में



लीजिए पेश हैं मुंबई निवासी पूर्व बैंक अधिकारी/साहित्यकार/यूट्यूबर/ब्लॉगर/पॉडकास्टर आदरणीय प्रदीप गुप्ता जी द्वारा मेरे दूसरे ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' पर व्यक्त की गई प्रतिक्रिया :👇👇

ज़िंदगी की सचाइयों के बीच सफ़र तय करती ओंकार सिंह विवेक की शायरी 
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रामपुर उत्तर प्रदेश के शायर ओंकार सिंह विवेक सरल हिंदी - उर्दू में ऐसी गहरी बात कह जाते हैं जो सीधे दिल दिमाग़ दोनों को उद्वेलित करने की सामर्थ्य रखती है , मैंने उनकी ग़ज़लें कई साल तक नियमित रूप से पहले तो 'सदीनामा' में पढ़ीं और कल उनका नया ग़ज़ल संग्रह “कुछ मीठा कुछ खारा” मिला , इसमें कई ग़ज़लें ऐसी लगीं जो उन्हें आम शायरों से बहुत अलग ऊँचाई पर स्थापित करने में सक्षम लगती हैं. मैं इस संग्रह से कुछ शेर आपके साथ साझा कर रहा हूँ जो मुझे बहुत अच्छे लगे हैं : 
राजनीति पर तंज़ देखिए : 
लुत्फ़ क्या आएगा शराफ़त में 
आप अब आ गए सियासत में 

और यह मानव मन की सचाई :
चिंता ऐसे है मन के  तहख़ाने में 
जैसे कोई घुन गेहूँ के दाने में 

सामाजिक सरोकार :
मिला दरिया भी प्यासा देखने को 
मिलेगा और क्या क्या देखने को 

बर्बाद होती नई पीढ़ी को लेकर उनकी चिंताएं 
चिपके रहते हों जब सारे बच्चे गूगल ज्ञानी से 
कौन सुने फिर आज कहानी-क़िस्से दादी नानी से 

निराशा के बीच आशा की किरण :
हौसले जिनके जगमगाते हैं 
ग़म कहाँ उनको तोड़ पाते हैं 

जो लोग ख़ामोश से रहते हैं उनकी ताक़त पर उनका ऑब्जरवेशन :
ध्यान सभी का देखा ख़ुद पर तो जाना 
चुप रहकर भी कितना बोला जाता है
हरदम तो ख़ामोशी ओढ़ नहीं सकते 
यार कभी तो मुँह भी खोला जाता है 

मीडिया धर्म से विमुख मीडिया पर उनका तंज़ :
कसौटी पर खरा ख़बरों की जिनको कह नहीं सकते 
भरा ऐसी ही ख़बरों से सदा अख़बार होता है 
ये शेर भी मुझे बहुत अच्छा लगा : 
तोड़ कर सारा गुमाँ मग़रुर मौजों का 'विवेक' 
साहिलों पर लौटती सब कश्तियाँ अच्छी लगीं 

और यह भी :
गुमाँ तोड़ेंगे जल्दी आसमाँ का 
परिंदे हौसला हारे नहीं हैं 

भाई विवेक इसी तरह ज़िन्दगी की सचाइयों को हम आप तक पहुँचाते रहें इसी उम्मीद के साथ …
             -- प्रदीप गुप्ता
 (ख़ाकसार श्री प्रदीप गुप्ता जी को अपना ग़ज़ल संग्रह भेंट करते हुए) 

April 20, 2026

मुलाक़ात के हसीन लम्हे

मुंबई निवासी श्री प्रदीप गुप्ता जी,पूर्व स्टेट बैंक अधिकारी/साहित्यकार/यूट्यूबर/ब्लॉगर/पॉडकास्टर कल शाम चाय पर हमारे ग़रीबखाने पर पधारे।श्री गुप्ता जी मूलतय: मुरादाबाद के निवासी हैं परंतु अब स्थाई रूप से मुंबई में बस गए हैं।आपसे सोशल मीडिया के कई माध्यमों से अक्सर संवाद होता रहता है।परंतु उनसे रूबरू यह मेरी पहली मुलाक़ात थी।

आदरणीय प्रदीप गुप्ता जी की सदाशयता, विनम्रता और सकारात्मक ऊर्जा ने बहुत प्रभावित किया। अनौपचारिक माहौल में काफ़ी देर आपसे तमाम सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर खुलकर बातचीत हुई।आदरणीय गुप्ता जी के अचानक आगमन के कारण अपने सभी साहित्यिक मित्रों को विधिवत आमंत्रण देकर उनके सम्मान में हम कोई बड़ा कार्यक्रम तो नहीं कर पाए परंतु फिर भी कुछ साहित्यिक मित्र एक short notice पर उनकी मेज़बानी के लिए एकत्र हो गए इसके लिए उन सभी दोस्तों का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।


चाय पर चर्चा के दौरान अच्छी ख़ासी कविता/शायरी भी हो गई। श्री गुप्ता जी को मैंने अपने दूसरे ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' की प्रति भी भेंट की।

श्री प्रदीप गुप्ता जी की मेज़बानी का अवसर पाकर प्रसंगवश मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का यह शेर याद आ रहा है :

 वो  आए  घर  में  हमारे  ख़ुदा  की  क़ुदरत है,

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।

इस अवसर पर अपने साहित्यिक मित्रों को भी अपने ग़ज़ल संग्रह की प्रतियाँ भेंट कीं :


निःसंदेह ऐसे अवसर जीवन को एक नई आशा,ऊर्जा और उत्साह से भर देते हैं।

          --- ओंकार सिंह विवेक 


          पैग़ाम-ए-मुहब्बत 🌹🌹🥀🥀👈👈

April 16, 2026

हँसते-हँसते कट जाएँ रस्ते

सभी शुभचिंतकों और स्नेही जनों को सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏
साथियो कुछ पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते इन दिनों ब्लॉग पर कभी-कभार ही कुछ पोस्ट कर पा रहा हूँ।फिर भी आप लोगों का प्रोत्साहन प्रतिसाद निरंतर कुछ नया कहने का उत्साह और ऊर्जा दे रहा है।जब आसपास का परिवेश या दुनिया का बदलता घटना क्रम हृदय को उद्वेलित करता है तो चिंतन की उड़ान स्वत: होने लगती है।इन दिनों middle east की जंग ज़हन पर हावी रही सो एक मतला हुआ और दो दिन में सामाजिक सरोकार और जीवन के दीगर पहलुओं को समेटती हुई आख़िरकार एक ग़ज़ल मुकम्मल हुई।
प्रतिक्रियाओं हेतु ग़ज़ल आपकी अदालत में पेश है 👇

                 ग़ज़ल 
                 *****
चार-सू    आग   जंग   की   देखी,
अम्न   की  आँख  में  नमी  देखी।

टूटना  ही  था   बाँध  अश्कों  का,
मुद्दतों   बाद    तो    ख़ुशी  देखी।

साथ   जब   दोस्तों  के   बैठ  गए,
हमने हरगिज़  न फिर घड़ी  देखी।

सब     समुंदर      लहू-लहू    देखे,
हर    नदी    भी   कराहती   देखी।

दूसरों     के    न   'ऐब     गिनवाए, 
देखी  जब ख़ुद  में  ही  कमी देखी।

रात-दिन  ख़्वाहिशों का  बोझ लिए,   
ज़िंदगी     हमने      दौड़ती    देखी।

साथ  देने  का   दम   जो  भरते  थे,
वक़्त  पर   उनकी  बात  भी  देखी।
          --- ओंकार सिंह विवेक 
              (सर्वाधिकार सुरक्षित)



April 6, 2026

अपनी बात ग़ज़ल के साथ



साहित्यिक मंच रचनाकार के सातवें स्थापना दिवस पर प्रकाशित पत्रिका 'रचनाकार' में हमारी ग़ज़ल को भी स्थान मिला।इस प्रतिष्ठित मंच से पिछले कई वर्ष से समीक्षक के रूप में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त रहा है।पत्रिका में रचना को स्थान देने के लिए संपादक मंडल का आभार व्यक्त करते हुए मैं संस्था के निरंतर पल्लवित और पुष्पित होने की कामना करता हूँ।
आप भी इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए :

                         ग़ज़ल 
                         *****
             कभी  कुछ  शादमानी  लिख  रहा  हूँ,  
             कभी  मैं   सरगिरानी  लिख  रहा   हूँ।

             हवाओं  के  सितम   की  हर  कहानी,
             चराग़ों   की  ज़ुबानी  लिख  रहा   हूँ।

             बहुत दिन तक न चल पाएगी जग में,
             बुरों  की   हुक्मरानी, लिख   रहा  हूँ।

             मैं  सरगम  लिख  रहा हूँ गीत की भी,
             ग़ज़ल  की  भी  रवानी  लिख रहा हूँ।

             कई  तो  हैं  ख़फा़ इस  पर ही मुझसे,
             कि  मैं  पानी  को  पानी लिख रहा हूँ।

             पिता  को  लिख  रहा  हूँ  एक  राजा,
             मैं अपनी  माँ को रानी  लिख  रहा हूँ।

             समझ लो  कैसे   फिर  किरदार होंगे,
             सियासत  की  कहानी  लिख  रहा हूँ।
                           -- ओंकार सिंह विवेक
                (सर्वाधिकार सुरक्षित) 


  

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