December 31, 2024
सदीनामा अख़बार में इस साल के अंत में छपी ग़ज़ल मुलाहिज़ा फरमाएँ
December 30, 2024
वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को लेकर कुछ दोहे
December 24, 2024
अपने शहर के बहाने कुछ बातें कुछ शे'र
December 20, 2024
आज एक सामयिक नवगीत !
आज एक नवगीत : सर्दी के नाम
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-- ©️ओंकार सिंह विवेक
छत पर आकर बैठ गई है,
अलसाई-सी धूप।
सर्द हवा खिड़की से आकर,
मचा रही है शोर।
काँप रहा थर-थर कुहरे के,
डर से प्रतिपल भोर।
दाँत बजाते घूम रहे हैं,
काका रामसरूप।
अम्मा देखो कितनी जल्दी,
आज गई हैं जाग।
चौके में बैठी सरसों का,
घोट रही हैं साग।
दादी छत पर ले आई हैं,
नाज फटकने सूप।
आए थे पानी पीने को,
चलकर मीलों-मील।
देखा तो जाड़े के मारे,
जमी हुई थी झील।
करते भी क्या,लौट पड़े फिर,
प्यासे वन के भूप।
--- ©️ओंकार सिंह विवेक
December 17, 2024
ग़ज़ल कुंभ,2023 की यादें
December 16, 2024
दोहों के कुछ वीर
December 14, 2024
यादों के झरोखों से -- स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी
यादों के झरोखों से (स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी)
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स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी से मेरा परिचय प्रथमा बैंक(अब प्रथमा यू पी ग्रामीण बैंक) में सेवारत रहते हुए हुआ था। वैसे तो गौरव जी प्रथमा बैंक के रामपुर क्षेत्र की एक ग्रामीण शाखा में भी कार्यरत रहे परंतु मेरा उनसे प्रगाढ़ परिचय बैंक के रामगंगा विहार मुरादाबाद स्थित मुख्य कार्यालय में तैनाती के दौरान ही हुआ। गौरव जी मुख्यालय के वसूली विभाग में कार्यरत थे तथा मैं योजना एवं विकास विभाग में तैनात था। उस दौरान बैंकिंग कार्यों से इतर उनसे लंबी साहित्यिक वार्ताएं भी होती थीं।गौरव जी अपने उपन्यासों से साहित्य की गद्य विधा में जहाँ अपना लोहा मनवा चुके थे वहीं उन्होंने श्रेष्ठ गीतों और कविताओं के माध्यम से काव्य के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई। स्मृतिशेष गौरव जी बहुत सुघड़ व्यक्तित्व के स्वामी थे।मैं उनके ड्रेसिंग सेंस आदि से ख़ासा प्रभावित रहता था। किसी को भी पहली बार में ही अपनी बातचीत से प्रभावित कर लेने का उनमें अद्भुत कौशल था। अपनी-अपनी साहित्यिक अभिरुचियों के कारण हम लोग बैंक की गृह पत्रिका 'बुलंदियाँ' से जुड़े हुए थे। पत्रिका के प्रकाशन से पूर्व आयोजित होने वाली सम्पादक मंडल की बैठकों में उनसे ख़ूब बातचीत होती थी।बात चाहे बैंकिंग कार्यों की हो अथवा साहित्य सृजन की,गौरव जी लीक से हटकर ख़ास अंदाज़ से कार्य संपादन करने में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।
(आनंद कुमार गौरव जी का माल्यार्पण द्वारा स्वागत करते हुए मुरादाबाद के साहित्यकार राजीव प्रखर जी)कुछ दिनों जब मैंने 'बुलंदियाँ' का संपादन किया था तो उनकी एक कविता उनसे आग्रह पूर्वक लेकर पत्रिका में छापी थी जो यहाँ साझा कर रहा हूँ :
कौन लेकर चलेगा
कथित सभ्य समाज की
सभ्यता की लाशें
इस सभ्य समाज से बाहर
जो अब सड़ांध दे रही हैं
जो ख़तरा बन गई हैं
समाज के स्वास्थ्य के लिए
जो छिपाकर रखी हैं
समाज के ठेकेदारों ने
कई आवरणों के पीछे
ये लाशें बोल नहीं पातीं
पर इनकी दुर्गंध
संभवत: यही पूछती है
क्या हमें मिलेगा
चिता में जलने का अधिकार?
आनंद कुमार गौरव जी का जन्म ज़िला बिजनौर के ग्राम भगवानपुर में हुआ था। गौरव जी का निधन लंबी बीमारी के उपरांत 18 अप्रैल,2024 को मुरादाबाद में हुआ।उनका पहला गीत-संग्रह ‘मेरा हिन्दुस्तान कहां है’ काफ़ी चर्चित रहा था।वर्ष 2008 में उनका कविता-संग्रह ‘शून्य के मुखौटे’ और वर्ष 2015 में दूसरा गीत-संग्रह ‘सांझी-सांझ’ आया। उनकी इन कृतियों को भी साहित्य जगत में ख़ूब मान मिला।
उनके एक गीत की यह मार्मिक पंक्तियां देखिए :
पते पर नहीं जो पहुँची, उस चिट्ठी जैसा मन है,
रिक्त अंजुरी-सा मन है।
उनके भाव विभोर करने वाले एक और गीत की पंक्तियाँ देखें :
आज प्रिय आलिंगन को यूं, मृदुतम अनुबंधों के स्वर दो,
निज आँसू अवसाद पीर सब, मेरे रोम-रोम में भर दो।
उनके उपन्यास ‘आंसुओं के उस पार’ व ‘थका-हारा सुख’ भी साहित्य-जगत में बहुत चर्चित हुए।
आज स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी की कमी बहुत खल रही है।मैं दिल की गहराईयों से उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ
🌹 🌹 🙏🙏
-- साहित्यकार ओंकार सिंह विवेक
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
December 11, 2024
ज्ञान 'गीता' का
December 7, 2024
हाज़िरी नई ग़ज़ल के साथ
पुत्री कोआशीर्वाद देने हेतु रामपुर नगर (उत्तर प्रदेश) के कई प्रसिद्ध कविगण तथा शा'इर उपस्थित हुए।सभी का मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं 🌹🌹🙏🙏
लीजिए पेश है मेरी नई ग़ज़ल
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©️
जो मुखौटा कहीं उतर जाए,
आज का शख़्स ख़ुद से डर जाए।
उसका जीना भी कोई जीना है,
जिस बशर का ज़मीर मर जाए।
पाए मोहन भी रोज़गार यहाँ,
और अहमद भी काम पर जाए।
ये जो मुझ पर है शा'इरी का नशा,
कोई सूरत नहीं, उतर जाए।
सब में कमियाँ निकालने वाले,
तेरी ख़ुद पर भी तो नज़र जाए।
कितनों की आज भी ये ख़्वाहिश है,
तीरगी से चराग़ डर जाए।
भीड़ हर सू है चालबाज़ों की,
साफ़-दिल आदमी किधर जाए।
©️ ओंकार सिंह विवेक
लड़ेगा हवा से दिया जानते हैं 🌹🌹👈👈
December 5, 2024
अपनों के बहाने !
कुंडलिया छंद
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©️
आहत कैसे हो नहीं, यह दिल बारंबार।
अपने ही जब नित करें,घातक शब्द-प्रहार।।
घातक शब्द-प्रहार, हुआ है मुश्किल जीना।
जीवन का सुख-चैन,आज अपनों ने छीना।
करो कृपा हे ईश! तनिक हो जाए राहत।
अपनों के कटु शब्द,करें अब और न आहत।।
©️ ओंकार सिंह विवेक
Foundation year celebration of Rampur Raza Library and Museum 👈👈
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शुभ प्रभात मित्रो 🌹🌹🙏🙏 संगठन में ही शक्ति निहित होती है यह बात हम बाल्यकाल से ही एक नीति कथा के माध्यम से जानते-पढ़ते और सीखते आ रहे हैं...