December 31, 2024

सदीनामा अख़बार में इस साल के अंत में छपी ग़ज़ल मुलाहिज़ा फरमाएँ

वर्ष,2024 को अलविदा कहते हुए सभी स्नेही मित्रों को सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏

आशा है आगे भी ब्लॉग को इसी तरह आपका भरपूर प्यार मिलता रहेगा। कोलकता से निकलने वाले प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'सदीनामा' में इस साल के अंत में छपी ग़ज़ल आपकी अदालत में पेश है। प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराएं।मेरे साथ ही जनाब शकूर अनवर साहब की भी ग़ज़ल छपी है।मैं उन्हें भी एक अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद पेश करता हूं 🌹🌹
-- ओंकार सिंह विवेक 


December 30, 2024

वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को लेकर कुछ दोहे


आजकल दिल्ली विधान सभा चुनाव से पहले दिल्ली में जो कुछ चल रहा है उसको लेकर जो मनस्थिति बनी उसमें कुछ दोहों का सृजन हुआ। दोहे आपकी 'अदालत में पेश हैं :

कुछ दोहे वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को लेकर
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©️ 
कहने  को  कहते  रहें,कुछ भी  आप जनाब।
'गठबंधन'  की  गाँठ  है,खुलने  को   बेताब।।

'झाड़ू'  को  खलने   लगा,'पंजे'  का   व्यवहार।
आख़िर कब तक हो नहीं,आपस में तकरार।।

'पंजे'  से   तो   हैं  बहुत, 'दीदी'   भी   नाराज़।
फिर  कैसे  सुर  में  बजे,'गठबंधन' का साज़।।

'झाड़ू', 'पंजे'  में    अगर,नहीं    बनेगी    बात।
चढ़  पाएगी   किस  तरह,दिल्ली  में  बारात।।
                         ©️ ओंकार सिंह विवेक 

(चित्र गूगल से साभार)



December 24, 2024

अपने शहर के बहाने कुछ बातें कुछ शे'र

सुप्रभात मित्रो 🌹🌹🙏🙏

कल शाम को अपने घर से बाहर जब चौराहे की तरफ़ टहलने के लिए निकला तो दूधिया रंग की रौशनी में  नहाए हुए चौराहे की अलग ही शोभा दिखाई दी। इस ख़ुशरंग नज़ारे को देखकर आपके साथ यह पोस्ट साझा करने का लोभ संवरण न कर सका।
हमारे घर से चंद मीटर दूर ही सिविल लाइंस का स्टार चौराहा है।चौराहे से एक सड़क सीधी रोडवेज और रेलवे स्टेशन की तरफ़ दिल्ली-लखनऊ हाइवे से मिल जाती है।दूसरी सड़क एक शॉर्टकट के रास्ते मुरादाबाद की तरफ़ चली जाती है।  तीसरी सड़क ऐतिहासिक गाँधी समाधि होते हुए नगर के भीतर जाती है तथा चौथी सड़क भी डायमंड सिनेमा रोड होते हुए शहर की तरफ़ चली जाती है।
स्टार चौराहे से गाँधी समाधि होते हुए जो सड़क शहर के अंदर जाती है पहले उसे राह-ए-रज़ा (रामपुर रियासत के तत्कालीन नवाब रज़ा अली ख़ान के नाम पर)के नाम से जाना जाता था।अब इसका नाम बदलकर मौलाना मोहम्मद अली जौहर(आज़ादी की लड़ाई में योगदान करने वाले मोहम्मद अली तथा शौकत अली भाईयों में से एक भाई मोहम्मद अली के नाम पर) रोड कर दिया गया है।स्टार चौराहे पर ऊपर दिखाई दे रहा होटल बॉम्बे पैलेस है जो यात्रियों के ठहरने का एक अच्छा स्थान है।स्टार चौराहे पर ही सबसे ऊपर दिखाई दे रहा ईडन पैलेस नाम से एक बड़ा बारात घर है जहाँ आए दिन शादी-पार्टी आदि के आयोजन होते रहते हैं।चौराहे के एक और कुछ और मध्यम स्तर के होटल जैसे होटल डिलाइट तथा होटल लॉर्ड्स आदि स्थित हैं।कुल मिलकर यह एक अच्छा स्थान बन गया है।रात्रि में भव्य रौशनी होने पर यहाँ की शोभा देखते ही बनती है।
कल मैं इवनिंग वॉक के बाद काफ़ी देर तक स्टार चौराहे की शोभा को निहारता रहा और अपने नगर में हो रहे विकास पर गर्व करता रहा।मूड बना तो अपनी ग़ज़ल के कुछ अशआर और बातचीत को मिलाकर फटाफट एक वीडियो भी बनाया जो नीचे साझा कर रहा हूँ।इस वीडियो पर भी चैनल के कॉमेंट बॉक्स में जाकर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए 🙏🙏
वह ग़ज़ल यहाँ भी पेश कर रहा हूँ :
©️ 
जब  घिरा  छल फ़रेबों  के तूफ़ान में,
मैंने  रक्खा  यक़ीं   अपने  ईमान  में।

दूसरों  को  नसीहत  से   पहले  ज़रा,
झांकिए  आप   अपने   गरीबान  में।

इतनी जल्दी तो अहबाब मिलते नहीं,
वक़्त लगता है लोगों  की पहचान में।

चापलूसों  ने  उसको  न  जीने  दिया,
साफ़गोई  का  जज़्बा था  नादान में।

है  बुराई  का  पुतला  ये  माना मगर,
कुछ तो  अच्छाईयां भी  हैं इंसान में।

ये  जो  अशआर  मैंने  सुनाए  अभी,
छप  चुके   हैं  मेरे   एक  दीवान  में।
                  ©️ ओंकार सिंह विवेक 
(मेरे पहले ग़ज़ल संग्रह 'दर्द का एहसास' से)



December 20, 2024

आज एक सामयिक नवगीत !


सुप्रभात आदरणीय मित्रो 🌹 🌹 🙏🙏

धीरे-धीरे सर्दी ने अपने तेवर दिखाने प्रारंभ कर दिए हैं।
मौसम के अनुसार चिंतन ने उड़ान भरी तो एक नवगीत का सृजन हुआ था इन्हीं दिनों पिछले वर्ष।आपकी प्रतिक्रिया हेतु प्रस्तुत है वह गीत :

आज एक नवगीत : सर्दी के नाम

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      --  ©️ओंकार सिंह विवेक

छत पर आकर बैठ गई है,

अलसाई-सी धूप।

सर्द हवा खिड़की से आकर,

मचा रही है शोर।

काँप रहा थर-थर कुहरे के,

डर से प्रतिपल भोर।

दाँत बजाते घूम रहे हैं,

काका रामसरूप।

अम्मा देखो कितनी जल्दी,

आज गई हैं जाग।

चौके में बैठी सरसों का,

घोट रही हैं साग।

दादी छत पर  ले आई हैं,

नाज फटकने सूप।

आए थे पानी पीने को,

चलकर मीलों-मील।

देखा तो जाड़े के मारे,

जमी हुई थी झील।

करते भी क्या,लौट पड़े फिर,

प्यासे वन के भूप।

    ---  ©️ओंकार सिंह विवेक



December 17, 2024

ग़ज़ल कुंभ,2023 की यादें

ग़ज़ल कुंभ 2023 ( हरिद्वार) में प्रस्तुत की गई ग़ज़लों का संकलन प्रतिष्ठित ग़ज़लकार एवं ग़ज़ल कुंभ के संयोजक श्री दीक्षित दनकौरी जी के संपादन में प्रकाशित हुआ है। प्रतिभागी होने के नाते मेरी ग़ज़ल को भी इस संकलन में स्थान मिला है। उल्लेखनीय है कि हर साल श्री दीक्षित दनकौरी जी के संयोजन में दो दिनों के ग़ज़ल कुंभ का आयोजन देश के विभिन्न शहरों में पिछले 17-18 सालों से होता आ रहा है। इसमें देश के तमाम ख्यातिलब्ध एवं उदीयमान ग़ज़लकार ग़ज़ल पाठ करते हैं।प्रस्तुत की गई ग़ज़लों का एक संकलन भी तैयार होता है जो उसके बाद के ग़ज़ल कुंभ में प्रतिभागियों को भेंट किया जाता है।
पुस्तक में छपी अपनी ग़ज़ल आप सुधी जनों के साथ साझा कर रहा हूं :

December 16, 2024

दोहों के कुछ वीर

भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार और संवर्धन को समर्पित संस्था हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी दिल्ली द्वारा 'हिन्दुस्तानी भाषा काव्य प्रतिभा सम्मान' एवं 'नाविक के तीर' निःशुल्क पुस्तक प्रकाशन योजना में मेरे दोहों का चयन करने के लिए मैं अकादमी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।
यह संस्था प्रतिवर्ष दिल्ली में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करके चयनित रचनाकारों को सम्मानित ( कुछ अन्य संस्थाओं की भांति बिना कोई पंजीकरण राशि वसूले) करने के साथ ही पुस्तक की निःशुल्क प्रति भी प्रदान करती है।आज के दौर में, जब चंद लोगों ने साहित्य को व्यवसाय का रूप दे दिया है, संस्था की यह नि:स्वार्थ साहित्य सेवा प्रणम्य  है 🙏🙏

कह न सका है आज तक,कोई दोहा-वीर।
दोहों में  जो  कह गए, बातें  संत  कबीर।।
                      ©️ ओंकार सिंह विवेक 
प्रस्तुति : ओंकार सिंह विवेक 


December 14, 2024

यादों के झरोखों से -- स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी


यादों के झरोखों से (स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी)

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स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी से मेरा परिचय प्रथमा बैंक(अब प्रथमा यू पी ग्रामीण बैंक) में सेवारत रहते हुए हुआ था। वैसे तो गौरव जी प्रथमा बैंक के रामपुर क्षेत्र की एक ग्रामीण शाखा में भी कार्यरत रहे परंतु मेरा उनसे प्रगाढ़ परिचय बैंक के रामगंगा विहार मुरादाबाद स्थित मुख्य कार्यालय में तैनाती के दौरान ही हुआ। गौरव जी मुख्यालय के वसूली विभाग में कार्यरत थे तथा मैं योजना एवं विकास विभाग में तैनात था। उस दौरान बैंकिंग कार्यों से इतर उनसे लंबी साहित्यिक वार्ताएं भी होती थीं।गौरव जी अपने उपन्यासों से साहित्य की गद्य विधा में जहाँ अपना लोहा मनवा चुके थे वहीं उन्होंने श्रेष्ठ गीतों और कविताओं के माध्यम से काव्य के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई। स्मृतिशेष गौरव जी बहुत सुघड़ व्यक्तित्व के स्वामी थे।मैं उनके ड्रेसिंग सेंस आदि से ख़ासा प्रभावित रहता था। किसी को भी पहली बार में ही अपनी बातचीत से प्रभावित कर लेने का उनमें अद्भुत कौशल था। अपनी-अपनी साहित्यिक अभिरुचियों के कारण हम लोग बैंक की गृह पत्रिका 'बुलंदियाँ' से जुड़े हुए थे। पत्रिका के प्रकाशन से पूर्व आयोजित होने वाली सम्पादक मंडल की बैठकों में उनसे ख़ूब बातचीत होती थी।बात चाहे बैंकिंग कार्यों की हो अथवा साहित्य सृजन की,गौरव जी लीक से हटकर ख़ास अंदाज़ से कार्य संपादन करने में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।

    (आनंद कुमार गौरव जी का माल्यार्पण द्वारा स्वागत करते हुए मुरादाबाद के साहित्यकार राजीव प्रखर जी)

कुछ दिनों जब मैंने 'बुलंदियाँ' का संपादन किया था तो उनकी एक कविता उनसे आग्रह पूर्वक लेकर पत्रिका में छापी थी जो यहाँ साझा कर रहा हूँ : 

कौन लेकर चलेगा

कथित सभ्य समाज की

सभ्यता की लाशें 

इस सभ्य समाज से बाहर 

जो अब सड़ांध दे रही हैं 

जो ख़तरा बन गई हैं 

समाज के स्वास्थ्य के लिए 

जो छिपाकर रखी हैं 

समाज के ठेकेदारों ने 

कई आवरणों के पीछे 

ये लाशें बोल नहीं पातीं

पर इनकी दुर्गंध 

संभवत: यही पूछती है

क्या हमें मिलेगा 

चिता में जलने का अधिकार?

आनंद कुमार गौरव जी का जन्म ज़िला बिजनौर के ग्राम भगवानपुर में हुआ था। गौरव जी का निधन लंबी बीमारी के उपरांत 18 अप्रैल,2024 को मुरादाबाद में हुआ।उनका पहला गीत-संग्रह ‘मेरा हिन्दुस्तान कहां है’ काफ़ी चर्चित रहा था।वर्ष 2008 में उनका कविता-संग्रह ‘शून्य के मुखौटे’ और वर्ष 2015 में दूसरा गीत-संग्रह ‘सांझी-सांझ’ आया। उनकी इन कृतियों को भी साहित्य जगत में ख़ूब मान मिला।

उनके एक गीत की यह मार्मिक पंक्तियां देखिए :

पते पर नहीं जो पहुँची, उस चिट्ठी जैसा मन है, 

रिक्त अंजुरी-सा मन है।

उनके भाव विभोर करने वाले एक और गीत की पंक्तियाँ देखें :

आज प्रिय आलिंगन को यूं, मृदुतम अनुबंधों के स्वर दो,

 निज आँसू अवसाद पीर सब, मेरे रोम-रोम में भर दो।

उनके उपन्यास ‘आंसुओं के उस पार’ व ‘थका-हारा सुख’ भी साहित्य-जगत में बहुत चर्चित हुए।

आज स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव जी की कमी बहुत खल रही है।मैं दिल की गहराईयों से उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ

🌹 🌹 🙏🙏


-- साहित्यकार ओंकार सिंह विवेक 

रामपुर (उत्तर प्रदेश) 


December 11, 2024

ज्ञान 'गीता' का


अगर व्यक्ति को हताशा, निराशा और आत्मबल में कमी का आभास हो तो पवित्र ग्रंथ 'गीता' का पाठ अवश्य करना चाहिए। गीता में जीवन में आने वाली तमाम परेशानियों और दुविधाओं का हल बहुत ही व्यवहारिक ढंग से समझाया गया है। इसमें सत्य मार्ग पर चलते हुए बिना फल की इच्छा किए कर्म करते रहने की शिक्षा दी गई है। सांसारिक बंधनों में जकड़ा व्यक्ति जब दुविधाओं के भंवर में फंसता है तो यह पवित्र ग्रंथ उसे रास्ता दिखाता है।गीता हमें अधर्म और अनीति छोड़कर सत्य के साथ नीति मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।हम सब जानते हैं कि कुरुक्षेत्र के मैदान में अपनों को सामने देखकर अर्जुन को युद्ध से विरक्ति उत्पन्न हुई थी तो योगेश्वर श्री कृष्ण के गीता में दिए गए दिव्य ज्ञान ने ही उन्हें कर्तव्य का बोध कराया था। प्रसंगवश मुझे अपनी एक ग़ज़ल का यह शेर याद आ गया :
   'गीता'  के उपदेशों  ने वो  संशय  दूर किया,
   रोक रहा था जो अर्जुन को वाण चलाने से।
                           ©️ ओंकार सिंह विवेक 
हाल ही में मेरी एक ताज़ा ग़ज़ल कोलकता से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' में छपी।आप भी उसका आनंद लीजिए।मेरे साथ ही आदरणीय गिरीश अश्क साहब की भी उम्दा ग़ज़ल छपी है। मैं उनको भी एक अच्छी ग़ज़ल के लिए तहे दिल से मुबारकबाद देता हूं।

December 7, 2024

हाज़िरी नई ग़ज़ल के साथ

मित्रो ! सादर प्रणाम 🙏🙏 

आज काफ़ी दिनों बाद आप सुधी साथियों के साथ अपनी ताज़ा ग़ज़ल साझा कर रहा हूं।उम्मीद है अपना स्नेह यथावत बनाए रखेंगे तथा मेरे ब्लॉग को follow करके उत्साहवर्धन भी करेंगे --

(यह छाया चित्र हमारी पुत्री के हाल ही में संपन्न हुए विवाह संस्कार के उपरांत आयोजित अभिनंदन समारोह का है)

पुत्री कोआशीर्वाद देने हेतु रामपुर नगर (उत्तर प्रदेश) के कई प्रसिद्ध कविगण तथा शा'इर उपस्थित हुए।सभी का मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं 🌹🌹🙏🙏


लीजिए पेश है मेरी नई ग़ज़ल 

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©️ 

 जो मुखौटा     कहीं   उतर   जाए,

आज का शख़्स ख़ुद  से डर जाए।


उसका  जीना  भी  कोई  जीना  है,

जिस  बशर  का ज़मीर  मर  जाए।


पाए   मोहन  भी    रोज़गार   यहाँ,

और  अहमद भी  काम  पर  जाए।


ये जो  मुझ पर है शा'इरी का नशा,

कोई    सूरत    नहीं, उतर    जाए।


सब  में  कमियाँ   निकालने   वाले,

तेरी  ख़ुद पर  भी  तो  नज़र जाए।


कितनों की आज भी ये ख़्वाहिश है,

तीरगी    से     चराग़    डर    जाए।


भीड़    हर   सू   है  चालबाज़ों  की,

साफ़-दिल   आदमी   किधर  जाए।

              ©️ ओंकार सिंह विवेक 


लड़ेगा हवा से दिया जानते हैं 🌹🌹👈👈


December 5, 2024

अपनों के बहाने !

शुभ संध्या मित्रो 🌹 🌹 🙏🙏

आज अपनों के मध्य जिस तरह कटुता बढ़ रही है, उसे देखकर मन बहुत दुखी होता है।पहले संयुक्त परिवारों में कैसे लोग मिल-जुलकर रहते थे।परिवार की एकता की शक्ति सामने वाले पर बहुत भारी पड़ती थी। परंतु आज स्थिति भिन्न हो गई है।संयुक्त परिवारों की अवधारणा ही जैसे समाप्त सी हो गई है। सगे भाइयों के बीच भी झूठे अहम, ईगो और स्वार्थ के कारण मन मुटाव देखने को मिल रहे हैं। अपने ही अपनों पर व्यंग्य वाण चलाने से नहीं चूकते।

   (रामपुर के विश्व विख्यात शायर ताहिर फ़राज़ तथा नईम नज्मी जी के साथ)
 
यह देखकर मन में जो विचार उमड़े उसे कुंडलिया छंद के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।आप अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएंगे तो हार्दिक प्रसन्नता होगी! 🙏🙏

कुंडलिया छंद 

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©️ 

आहत   कैसे    हो   नहीं, यह   दिल   बारंबार।

अपने ही  जब  नित करें,घातक  शब्द-प्रहार।।

घातक  शब्द-प्रहार, हुआ  है  मुश्किल  जीना।

जीवन  का  सुख-चैन,आज अपनों  ने  छीना।  

करो  कृपा  हे  ईश! तनिक  हो   जाए   राहत।

अपनों के कटु शब्द,करें अब और न आहत।।

     ©️ ओंकार सिंह विवेक 


Foundation year celebration of Rampur Raza Library and Museum 👈👈

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