आजकल पारिवारिक कठिनाइयों से गुज़रना हो रहा है इसलिए लिखना-लिखाना कम ही हो पा रहा है। परंतु साहित्य साधक अपने सृजन हेतु चाहे जैसे भी हो ,वक़्त निकाल ही लेता है। ख़ैर छोड़िए इन बातों को, सुख-दुःख तो इंसान की ज़िंदगी में लगे ही रहते हैं। कठिनाइयाँ जीवन को और मज़बूत बनाती हैं।
लीजिए पेश है मेरी एक ग़ज़ल।इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराइए
ग़ज़ल
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साँस लेते ही मैं निढाल हुआ,
हाय!कैसा हवा का हाल हुआ।
जो गुमाँ में नहीं था मेरे कभी,
उनकी जानिब से वो सवाल हुआ।
बात पहले-सी तो नहीं आई,
उनसे रिश्ता मगर बहाल हुआ।
ख़ुद उतरता गया वो शीशे में,
एक ही पैग में कमाल हुआ।
अच्छी तक़रीर कर गए हज़रत,
शहर में हर तरफ़ वबाल हुआ।
उसको होना ही था धराशायी,
जिस क़दर पुल में गोलमाल हुआ।
--- ओंकार सिंह विवेक
Bahut achhi ghazal
ReplyDeleteआभार
Deleteवाह!! एक से बढ़कर एक अश्यार
ReplyDeleteआभार आदरणीया
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