और भी जलने का उसमें हौसला कुछ बढ़ गया,
इक दिये को आँधियों की धमकियाँ अच्छी लगीं।
मालूम है कि होगा हवाओं से सामना,
फिर किस लिए चराग़ इसे मसअला कहें।
गुमाँ तोड़ेंगे जल्दी आसमाँ का,
परिंदे हौसला हारे नहीं हैं।
तोड़कर सारा गुमां मग़रूर मौजों का 'विवेक',
साहिलों पर लौटती सब कश्तियां अच्छी लगीं।
हँसते - हँसते तय रस्ते पथरीले करने हैं,
हमको बाधाओं के तेवर ढीले करने हैं।
अगर कुछ सरगिरानी दे रही है,
ख़ुशी भी ज़िंदगानी दे रही है।
चलो मस्ती करें, ख़ुशियाँ मनाएँ,
सदा ये ऋतु सुहानी दे रही है।
हो गया गुफ़्तगू से अंदाज़ा,
कौन रहता है कैसी सुहबत में।
--- ओंकार सिंह विवेक
काव्य गोष्ठी 🌹🌹👈