पुस्तक समीक्षा
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कृति-- 'हाइकु-सरिता'
कृतिकार-- निहाल चन्द्र शिवहरे
प्रकाशन वर्ष : 2026 पृष्ठ -128 मूल्य- ₹200/
प्रकाशक--निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स
आगरा,उत्तर प्रदेश
समीक्षक-- ओंकार सिंह 'विवेक'
'हाइकु-सरिता' सामाजिक और मानवीय सरोकारों से युक्त एक उत्तम हाइकु-संग्रह
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कविता दिल के भावों और संवेदनाओं को लयबद्ध रूप में अभिव्यक्त करने का नाम है।कवि अपने परिवेश में हर चीज़ को एक विशिष्ट दृष्टि से देखता है तथा उसे भाव और शिल्प की ख़ास सजावट के साथ काव्य रूप में अभिव्यक्त करता है।काव्य की विभिन्न विधाएँ हैं यथा- गीत,मुक्तक,दोहा,रोला,सवैया,घनाक्षरी कुंडलिया,त्रिपदी तथा हाइकु आदि।कवि को जो विधा रुचिकर लगती है वह उसमें काव्य रूप में अपने भावों को अभिव्यक्त करता है।
हाइकु को यों तो जापानी काव्य विधा कहा जाता है परंतु ऐसा माना जाता है कि इसकी जड़ें मूल रूप से भारतीय ही हैं। ऋग्वेद में वर्णित संस्कृत गायत्री छन्द (त्रिपदी) सर्वाधिक प्राचीन वार्णिक त्रिपदा छन्द है। हाइकु विधा भी उसी से प्रेरित प्रतीत होती है।इसमें तीन पंक्तियों में 17 वर्ण 5-7-5 के क्रम में होते हैं। हाइकु में तीन पंक्तियों में बहुत कम शब्दों में कोई ऐसी मारक बात कह दी जाती है जिसको पढ़/सुनकर पाठक/श्रोता आह या वाह करने को विवश हो जाता है।हाइकु को एक छोटी लोकप्रिय कविता कहा जा सकता है।
मेरे हाथ में झाँसी,उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व बैंकर श्री निहाल चन्द्र शिवहरे जी का काव्य-संग्रह 'हाइकु-सरिता' है।इस संग्रह को पढ़कर कवि के चिंतन की गहराई का अंदाज़ा होता है।कवि ने पारिवारिक,सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ प्रकृति चित्रण और प्रेम आदि की अनुभूतियों को अपनी हाइकु रचनाओं में ख़ूबसूरती के साथ ढाला है।
तथाकथित बुलंदी पाने की अंधी दौड़ ने आज बच्चों को उनके पालनकर्ता माँ-बाप से कैसे दूर कर दिया है,संग्रह का यह हाइकु देखें--
खजूर जैसे
शिखर की चाह में
त्यागे माँ-बाप
एक भारतीय पत्नी की पूरी दुनिया उसके पति के इर्द गिर्द ही सिमटी होती है।वही उसका संबल और जीने का आधार होता है। घर और समाज में पति के मृत्यु के बाद पत्नी का तो जैसे जीवन ही बिखर जाता है --
पति की मौत
बिखरा आशियाना
नहीं ठिकाना
कवि अपनी मातृ भाषा के प्रचार-प्रसार को लेकर कितना सजग और प्रतिबद्ध है इस हाइकु से पता चलता है --
हिन्दी को हम
घर-घर जाने दें
मुस्कुराने दें
मौसम की प्रतिकूलता कैसे दैनिक आवागमन के साधनों को प्रभावित करती है देखिए --
रेल की चाल
कोहरे का कमाल
यात्री बेहाल
प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और पर्यावरण को लेकर सहृदय कवि की चिंताएँ इन पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देती हैं --
सूखी नदियाँ
बंजर हुए खेत
मानव चेत
मेघा रे मेघा
अब न इतराओ
प्यास बुझाओ
दूषित जल
हो रही हलचल
है कोई हल
हमारे यहाँ मनुष्य के जीवन में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा बताया गया है क्योंकि गुरु ही शिष्य को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सुझाते हैं,कवि का यह हाइकु देखिए--
गुरु है देता
सफलता का ज्ञान
जो है महान
त्योहारों की उमंग हो या फिर प्रकृति के मनोहारी दृश्य कवि की सभी पर सूक्ष्म दृष्टि पड़ी है --
होली आई रे
महके अंग-अंग
पलाश संग
टेसू के रंग
फागुन में उमंग
पिया के संग
सौंधी मिट्टी
चंदन-सी महके
पक्षी चहके
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम युगों-युगों से हमारे आराध्य रहे हैं। उनकी छवि के दर्शन मात्र से प्राणी का कल्याण हो जाता है, ये हाइकु देखिए --
शोभा है न्यारी
रघुवर धाम की
जय राम की
पंचवटी में
हैं नयनाभिराम
अपने राम
आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में आदमी हँसना और मुस्कुराना तो जैसे भूल ही गया है।शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हास्य-व्यंग्य कितना ज़रूरी है कवि ने अपने इस हाइकु में बताया है--
हास्य-व्यंग्य ही
जीवन का है सार
हँसो तो यार
आदमी अपनी आवश्यकताओं के चलते दुनिया में कहीं भी चला जाए परंतु उसका अपने मूल से जुड़ाव कभी ख़त्म नहीं हो सकता,इस हाइकु में यही रेखांकित किया गया है--
याद आई रे
बूढ़े नीम की छाँव
अपने गाँव
जीवन और प्रकृति से जुड़ा कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसे कवि ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति न दी हो।सार रूप में यह काव्य-संग्रह हाइकु रचनाओं की ऐसी सरिता है जिसमें पाठक का बार-बार ग़ोते लगाने का मन करता है।
हाइकु-संग्रह की भाषा सहज तथा बोधगम्य है।पुस्तक की प्रिंटिंग तथा साज-सज्जा आकर्षित करती है।प्रूफ रीडिंग पर भी काफ़ी ध्यान दिया गया है।
इस हाइकु-संग्रह को पढ़ने से पहले श्री निहाल चन्द्र शिवहरे जी का 'भावों के पंख' नाम से प्रकाशित एक और कविताओं का संग्रह पढ़ने का मुझे अवसर प्राप्त हो चुका है,जिसमें उनके चिंतन की सार्थक उड़ान को मैं पहले भी देख चुका हूं।निःसंदेह उनका यह हाइकु-संग्रह भी उन्हें साहित्य जगत में भरपूर मान-सम्मान दिलाएगा।भविष्य में हमें उनके और अच्छे काव्य-संग्रह पढ़ने को मिलेंगे इसी आशा के साथ मैं कवि के दीर्घायु होने की कामना करता हूँ।
ओंकार सिंह 'विवेक'
पूर्व बैंकर,साहित्यकार,समीक्षक स्वतंत्र विचारक एवं टैक्स्ट ब्लॉगर
रामपुर,उत्तर प्रदेश
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