दोस्तो नई ग़ज़ल का आनंद लीजिए 👇👇
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किसी की बंद मुट्ठी खुल गई है,
बची थी साख जो कुछ,धुल गई है।
अगर सब ठीक है तो ये बताओ,
चमन को छोड़ क्यों बुलबुल गई है?
पनपते भाई-चारे के शजर को,
सियासत काटने पर तुल गई है।
यक़ीनन कोई तो मक़सद है उनका,
जो यूँ मिसरी ज़बाँ पर घुल गई है।
नज़र मासूम कितने आ रहे हैं,
वो जिनकी पोल-पट्टी खुल गई है।
बहुत आभार है सद्भावना का,
त'अस्सुब का वो ढाकर पुल गई है।
किसी की याद की पुरवा सुहानी,
हमें करके बहुत व्याकुल गई है।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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