June 24, 2026

जंगल,नदी,पहाड़


कुछ विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों के कारण काफ़ी दिन से ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं लिखी थी।इधर पर्यावरण प्रदूषण के भयंकर दुष्परिणामों और मानवीय असंवेदनशीलता से हृदय उद्वेलित हुआ तो ये दोहे सृजित हुए जो आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए प्रस्तुत हैं 

जंगल  नदी  पहाड़  को, करता   रहा  निढाल।

ले  अब  तू  भी  देख  ले,मानव  अपना हाल।।


रोने   की   हो  बात   तो,हँस   पड़ते  हैं  लोग।

किस सीमा तक बढ़ गए,आज मानसिक रोग।।

         --- ओंकार सिंह विवेक 


     सारनाथ 👇




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