मित्रो सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏 ,,
ग़ज़ल
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इक मुकम्मल बयान तक पहुँची,
ख़ामुशी आसमान तक पहुँची।
ऊँट के मुँह में रख दिया जीरा,
ख़ाक राहत किसान तक पहुँची।
जब गुज़ारी गई उसूलों पर,
ज़िंदगी आन-बान तक पहुँची।
आदमी-आदमी का ख़ूँ चाहे,
बेहिसी किस निशान तक पहुँची।
झूठा दा'वा है आपका साहिब,
रौशनी हर मकान तक पहुँची।
जिस्म भी कितना साथ दे आख़िर,
उम्र ही जब ढलान तक पहुँची।
चेतना उसकी हो गई निर्मल,
साधना जिसकी ध्यान तक पहुँची।
--- ओंकार सिंह विवेक
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