May 29, 2026

अपनों से अपनी बात

दोस्तो नमस्कार 🥀🥀🙏🙏

पता नहीं कब कौन सी बात या घटना कवि/शायर के दिल पर गहरा असर करके कविता का रूप ले।कारगिल युद्ध के समय जब चिंतन प्रबल हुआ था तो ग़ज़ल का यह मतला कहा था 

      दुश्मन की चालों से हरगिज़ मात नहीं होती,
       तुम  संजीदा  होते  तो  ये  बात नहीं होती।

बाद में धीरे धीरे इस पर ग़ज़ल भी मुकम्मल हुई।इन दिनों भी कुछ ऐसा ही हुआ। रिश्तों में आई औपचारिकताओं को लेकर मन कुछ खिन्न हुआ तो ग़ज़ल का मतला कहा और माँ सरस्वती की कृपा से दो दिन में ही उस पर भी ग़ज़ल पूरी हो गई जो आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏
                ग़ज़ल 
                 ****
इतने   उलझे    संबंधों     के    ताने-बाने   हैं,
अपने   भी   लगता  है  अब  जैसे  बेगाने  हैं।

करते    हैं    पैरोकारी    तहज़ीब-तमद्दुन   की,
आज भी अपने क़ौल के पक्के लोग पुराने हैं।

लोग सियासत में आते हैं और ही  मक़सद से,
जन-सेवा  के  दा'वे - ना'रे  महज़   बहाने  हैं।

हँसते-हँसते  लाँघ  गए हैं  साहस के  बल पर,
बाधाओं  के पर्वत  को   हम   कब  गर्दाने हैं?

वक़्त की थोड़ी-सी  भी पहले क़द्र नहीं जानी,
वक़्त गँवाने  वालों  के  अब  होश  ठिकाने हैं।

बच्चों  के होठों पर  नित  मुस्कान सजाने  को,
माँ को  तो जीवन भर  अपने अश्क  छुपाने हैं।

सिर्फ़  लतीफ़े  सुनने  के 'आदी  हों लोग  जहाँ,
छोड़ो,ऐसी  महफ़िल  में  क्या  शेर  सुनाने  हैं?

झोपड़ियाँ  ही  ज़द  में   आएँगी  महँगाई   की,
उनका  क्या  बिगड़ेगा   वो   तो  राजघराने  हैं।
            ---- ओंकार सिंह विवेक 
          (सर्वाधिकार सुरक्षित)
और भी कुछ अलग अलग रंग के अशआर नीचे प्रस्तुत हैं 
       

प्रस्तुतकर्ता 
ओंकार सिंह विवेक 

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