May 13, 2026

चंद शेर मुलाहिज़ा फरमाएँ

दोस्तो नमस्कार 🌹🌹🙏🙏

आपकी अदालत में ताज़ा ग़ज़ल के कुछ शेर पेश हैं। मुलाहिज़ा फरमाएँ : 

             ग़ज़ल 
             *****
कहीं  उम्मीद   से   कम  हो  रही  है,
कहीं  बारिश  झमाझम  हो  रही है।

 नहीं  है  मुद्द'आ  जो  बह्स  लाइक़,
 उसी  पर  बह्स  हरदम  हो  रही है।

 ग़ज़ल   पूरी   नहीं   होने   में  आती,
 ये  कैसी  फ़िक्र  बरहम  हो  रही  है।

 नहीं  है  ग़म  सबब इन आँसुओं का,
 ख़ुशी  में  आँख  ये  नम  हो  रही है।         

है कुछ तनख़्वाह भी हज़रत की मोटी,
फिर ऊपर  की  भी इनकम हो रही है।
                 -- ओंकार सिंह विवेक
          (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

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