लीजिए पेश हैं मुंबई निवासी पूर्व बैंक अधिकारी/साहित्यकार/यूट्यूबर/ब्लॉगर/पॉडकास्टर आदरणीय प्रदीप गुप्ता जी द्वारा मेरे दूसरे ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' पर व्यक्त की गई प्रतिक्रिया :👇👇
ज़िंदगी की सचाइयों के बीच सफ़र तय करती ओंकार सिंह विवेक की शायरी
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रामपुर उत्तर प्रदेश के शायर ओंकार सिंह विवेक सरल हिंदी - उर्दू में ऐसी गहरी बात कह जाते हैं जो सीधे दिल दिमाग़ दोनों को उद्वेलित करने की सामर्थ्य रखती है , मैंने उनकी ग़ज़लें कई साल तक नियमित रूप से पहले तो 'सदीनामा' में पढ़ीं और कल उनका नया ग़ज़ल संग्रह “कुछ मीठा कुछ खारा” मिला , इसमें कई ग़ज़लें ऐसी लगीं जो उन्हें आम शायरों से बहुत अलग ऊँचाई पर स्थापित करने में सक्षम लगती हैं. मैं इस संग्रह से कुछ शेर आपके साथ साझा कर रहा हूँ जो मुझे बहुत अच्छे लगे हैं :
राजनीति पर तंज़ देखिए :
लुत्फ़ क्या आएगा शराफ़त में
आप अब आ गए सियासत में
और यह मानव मन की सचाई :
चिंता ऐसे है मन के तहख़ाने में
जैसे कोई घुन गेहूँ के दाने में
सामाजिक सरोकार :
मिला दरिया भी प्यासा देखने को
मिलेगा और क्या क्या देखने को
बर्बाद होती नई पीढ़ी को लेकर उनकी चिंताएं
चिपके रहते हों जब सारे बच्चे गूगल ज्ञानी से
कौन सुने फिर आज कहानी-क़िस्से दादी नानी से
निराशा के बीच आशा की किरण :
हौसले जिनके जगमगाते हैं
ग़म कहाँ उनको तोड़ पाते हैं
जो लोग ख़ामोश से रहते हैं उनकी ताक़त पर उनका ऑब्जरवेशन :
ध्यान सभी का देखा ख़ुद पर तो जाना
चुप रहकर भी कितना बोला जाता है
हरदम तो ख़ामोशी ओढ़ नहीं सकते
यार कभी तो मुँह भी खोला जाता है
मीडिया धर्म से विमुख मीडिया पर उनका तंज़ :
कसौटी पर खरा ख़बरों की जिनको कह नहीं सकते
भरा ऐसी ही ख़बरों से सदा अख़बार होता है
ये शेर भी मुझे बहुत अच्छा लगा :
तोड़ कर सारा गुमाँ मग़रुर मौजों का 'विवेक'
साहिलों पर लौटती सब कश्तियाँ अच्छी लगीं
और यह भी :
गुमाँ तोड़ेंगे जल्दी आसमाँ का
परिंदे हौसला हारे नहीं हैं
भाई विवेक इसी तरह ज़िन्दगी की सचाइयों को हम आप तक पहुँचाते रहें इसी उम्मीद के साथ …
-- प्रदीप गुप्ता
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