साथियो कुछ पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते इन दिनों ब्लॉग पर कभी-कभार ही कुछ पोस्ट कर पा रहा हूँ।फिर भी आप लोगों का प्रोत्साहन प्रतिसाद निरंतर कुछ नया कहने का उत्साह और ऊर्जा दे रहा है।जब आसपास का परिवेश या दुनिया का बदलता घटना क्रम हृदय को उद्वेलित करता है तो चिंतन की उड़ान स्वत: होने लगती है।इन दिनों middle east की जंग ज़हन पर हावी रही सो एक मतला हुआ और दो दिन में सामाजिक सरोकार और जीवन के दीगर पहलुओं को समेटती हुई आख़िरकार एक ग़ज़ल मुकम्मल हुई।
प्रतिक्रियाओं हेतु ग़ज़ल आपकी अदालत में पेश है 👇
ग़ज़ल
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चार-सू आग जंग की देखी,
अम्न की आँख में नमी देखी।
टूटना ही था बाँध अश्कों का,
मुद्दतों बाद तो ख़ुशी देखी।
साथ जब दोस्तों के बैठ गए,
हमने हरगिज़ न फिर घड़ी देखी।
सब समुंदर लहू-लहू देखे,
हर नदी भी कराहती देखी।
दूसरों के न 'ऐब गिनवाए,
देखी जब ख़ुद में ही कमी देखी।
रात-दिन ख़्वाहिशों का बोझ लिए,
ज़िंदगी हमने दौड़ती देखी।
साथ देने का दम जो भरते थे,
वक़्त पर उनकी बात भी देखी।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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