February 23, 2025
February 15, 2025
कुछ बातें कुछ कविता
नमस्कार मित्रो 🌹🌹🙏🙏
मित्रो एक प्रतिष्ठित साहित्यिक व्हाट्सएप ग्रुप है जिसका नाम है रचनाकार दिल्ली-1,इस ग्रुप के बारे में पहले भी मैं कई बार अपने ब्लॉग पर पोस्ट्स लिख चुका हूँ।बहुत ही व्यवस्थित और अनुशासित साहित्यिक पटल है यह जिससे देश भर के तमाम साहित्यकार जुड़े हुए हैं।मैं भी पिछले कई वर्षों से इस पटल से जुड़ा हुआ हूँ। कभी-कभी ग़ज़ल समीक्षा के दायित्व का निर्वहन भी करता हूँ इस पटल पर।
इस बार ग़ज़ल कहने के लिए जो मिसरा पटल पर दिया गया उस पर मैंने भी ग़ज़ल कही थी। मैं आभारी हूँ सम्मानित मंच का कि निर्णायकों ने मेरी ग़ज़ल को सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान के लिए चयनित किया।
आदरणीय दीपेश दवे जी को भी उनकी ग़ज़ल के चयन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
निर्णायकों तथा पटल प्रशासन द्वारा जारी किए गए परिणाम को हूबहू मंच से साभार लेकर आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
(रचनाकार मंच से साभार 👇)
*रचनाकार दिल्ली 1*
*पंजीयन क्रमांक 2434/2018*
*एक कदम साहित्यिक उत्कृष्टता की ओर*
*संवेदना सृजन सम्मान के साथ*
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*पटल परिणाम*
दिनांक -- 11/2/2025
दिन -- मंगलवार
मिसरा -- मिलेगा क्या जो हम चर्चा करेंगे
विधा -- गजल
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*दैनिक सम्मान*
1- सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान
आ० ओंकार सिंह विवेक जी
आ० दीपेश दवे जी
2- उत्कृष्ट समीक्षा सम्मान
आ० गिरीश पाण्डेय जी
आ० सरफराज हुसैन फराज जी
3 - संचालन कौशल सम्मान
आ० प्रभात पटेल जी
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सभी चयनित साहित्यसाधको को हार्दिक बधाई
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*एक किरण विश्वास की*
*सबके साथ विकास की*
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प्रबंधन मंडल
रचनाकार
(रचनाकार मंच से साभार ☝️)
मेरी उस ग़ज़ल का भी आनंद लीजिए जिसका चयन रचनाकार दिल्ली-1 साहित्यिक पटल द्वारा किया गया :
ग़ज़ल
****
किसी का सहल गर रस्ता करेंगे,
कुछ अपने ही लिए अच्छा करेंगे।
इधर अख़्लाक़ की देंगे दुहाई,
उधर ईमाँ का वो सौदा करेंगे।
अगर पहुँचे नहीं हम शाम को घर,
पिता जी रात भर चिंता करेंगे।
पता है रहनुमाओं की हक़ीक़त,
सदा वा'दे पे बस वा'दा करेंगे।
जहाँ मौसूल होगा माल-पानी,
वहीं बेटे का वो रिश्ता करेंगे।
मिला दी धूल में संसद की गरिमा,
न जाने रहनुमा क्या-क्या करेंगे।
किसी की चाकरी तो चाकरी है,
'विवेक'अब काम कुछ अपना करेंगे।
©️ ओंकार सिंह विवेक
February 8, 2025
एक नई ग़ज़ल
दोस्तो ! लीजिए पेश है मेरे नए ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' से एक ग़ज़ल :
ग़ज़ल
****
©️
लोग जब सादगी से मिलते हैं,
हम भी फिर ख़ुश-दिली से मिलते हैं।
आदमी को क़रीने जीने के,
'इल्म की रौशनी से मिलते हैं।
ख़ैरियत लेने की ग़रज़ से नहीं,
दोस्त अब काम ही से मिलते हैं।
आस करते हैं जिनसे नरमी की,
उनके लहजे छुरी-से मिलते हैं।
राम जाने सियाह दिल लेकर,
लोग कैसे किसी से मिलते हैं।
वो रिटायर हैं नौकरी से मगर,
आज भी अफ़सरी से मिलते हैं।
दिल को नाकामियों के बोझ 'विवेक',
हौसलों की कमी से मिलते हैं।
©️ ओंकार सिंह विवेक
February 4, 2025
वसंत पंचमी पर पल्लव काव्य मंच की काव्य गोष्ठी संपन्न
पल्लव काव्य मंच की ओर से वसंत पंचमी के अवसर पर एकता विहार स्थित राजीव कुमार शर्मा के आवास पर काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी की अध्यक्षता शिवकुमार चंदन ने की,मुख्य अतिथि जावेद रहीम,विशिष्ट अतिथि कविवर ओंकार सिंह विवेक रहे।संचालन मंच के महासचिव प्रदीप राजपूत माहिर ने किया।
माँ शारदे के सम्मुख दीप जलाकर ,पुष्प और मालाओं से अर्चना की गई ।कवयित्री डाॅ०प्रीति अग्रवाल की सरस्वती वंदना से काव्य गोष्ठी का शुभारम्भ हुआ।
कविवर पतराम सिंह ने काव्य पाठ करते हुए कहा
हे ऋतुराज वसंत सभागत सुषमा का संचार लिए ।
पीताम्बर धारण धरा , नव सृजन का सार लिए ।।
पल्लव काव्य मंच के उपाध्यक्ष ओंकार सिंह विवेक ने दोहा छंद मे माँ सरस्वती से विनय करते हुए कहा ---
हो मेरा चिन्तन प्रखर , बढ़े निरन्तर ज्ञान ।
है माँ वीणा वादिनी , दो ऐसा वरदान ।।
युवा कवि गौरव कुमार नायक ने काव्य पाठ करते हुए कहा ,
मैं हिज्र और विशाल से आगे की चीज हूँ ।
यानी किसी ख्याल से आगे की चीज हूँ ।।
कविवर विनोद कुमार शर्मा ने माँ शारदे की मनुहार करते हुए दोहा छंद में काव्य पाठ करते हुए कहा ।
कृपा करो माँ शारदे , दे दो मुझको ज्ञान ।
चले सदा यह लेखनी , ऐसा दो वरदान ।।
इसी क्रम में कविवर सुमित सिंह ने कहा ,
घर का आँगन है छोटा मगर,रहने वालों का दिल है बड़ा ।
खुश्बुऐं प्यार की हैं यहाँ , नफरतों का बसेरा नहीं ।।
कवयित्री डाॅ० प्रीति अग्रवाल ने सनातन धर्म का आधार वेदों को बताते हुए दोहा छंद में काव्य पाठ कुछ यों किया --
वेद सनातन धर्म के , शाश्वत हैं आधार ।
इनमें ही हमको मिला ,सारे जग का सार ।।
कविवर सुधाकर सिंह ने काव्य पाठ करते हुए कहा ।
इस जम्हूरियत का एक दरम्यानी इन्सान हूँ ।
जो दिखता नहीं तुम्हें , वो मैं हिन्दुस्तान हूँ ।।
शायर अश्फाक ज़ैदी ने कुछ इस तरह कहा ।
हमसे मत पूछिए , अरमान हमारा क्या है ।
और कुछ दिन के हैं ,मेहमान हमारा क्या है ।।
कवि जावेद रहीम ने कहा ,
ग़मों का हिसाब अब जात पात से होगा
किस धर्म के हो , इस बात से होगा
दुख और सुख अपने पराये होने लगे
इन्तेखाबे मुहब्बत अब अदावत से होगा
कविवर राजीव कुमार शर्मा ने कहा ,
चमन दर चमन रहगुजर है हमारी
कभी खार ने अपना पीछा न छोड़ा
मुहब्बत तो की हमसे सच है उन्होने
मगर बन्दिशों ने कहीं का न छोड़ा
कवि प्रदीप राजपूत ने कहा --
आगे मत लाचारी रख
कुछ तो बात हमारी रख
अध्यक्षता कर रहे शिव कुमार चंदन ने अपना काव्य पाठ करते हुए कहा ।
ममतामयी हे नेहमयी माँ ! कृपा दृष्टि डारो
ज्योतिर्मय होवें घर - आँगन दिव्य दीप बारो
झंकारो वीणा मनभावन , बृन्दावन कर दो
गहन तमसमय जन जीवन में ,उजियारा भर दो
इस अवसर पर गोविन्द शर्मा,अशोक सक्सेना ,सीताराम शर्मा,आभा कमल सक्सेना ,डाॅ० सरोजनी शर्मा,अशोक सक्सैना आदि उपस्थित रहे ।
अन्त में काव्य गोष्ठी के आयोजक राजीव कुमार शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया ।
February 1, 2025
ग़ज़ल कुंभ के बहाने अच्छे लोगों से मुलाक़ात
श्री दीक्षित दनकौरी जी के संयोजन में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले ग़ज़ल कुंभ कार्यक्रम में पिछले कई सालों से मैं सहभागिता करता आ रहा हूं।इस कार्यक्रम में देश भर के बहुत अच्छे ग़ज़लकार ग़ज़ल पाठ हेतु उपस्थित होते हैं।इस बार के ग़ज़ल कुंभ हरिद्वार में भी हमेशा की तरह ग़ज़ल पाठ करना बहुत सुखद अनुभव रहा।तमाम ग़ज़लकारों का बेहतरीन कलाम सुनने मिला। कई अच्छे लोगों से मुलाक़ात हुई।उनसे उनके क्षेत्रों में चल रही साहित्यिक गतिविधियों के बारे में सार्थक बातचीत हुई।यों तो तमाम साहित्यकारों से मुलाक़ात और बातचीत हुई उस अवसर पर लेकिन कुछ लोगों से मुलाक़ात ख़ास रही।
नीचे की तस्वीर में साथियों प्रदीप माहिर, राजवीर सिंह राज़ और मेरे साथ दाएं से बाएं दूसरे नंबर पर टोपी लगाए जो सज्जन दिखाई दे रहे हैं वह हैं फगवाड़ा, पंजाब से साहित्यकार मनोज फगवाड़वी जी।बहुत विनम्र प्रकृति के इंसान हैं।उनसे साहित्यिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात के साथ-साथ कभी-कभार फ़ोन पर भी बात होती रहती है।
आपने स्वयं द्वारा संपादित काव्य संग्रह 'डाल-डाल के पंछी' की प्रति भी मुझे भेंट की।इस संकलन में कई वरिष्ठ और नवोदित रचनाकारों की रचनाएँ संकलित की गई हैं।
'डाल डाल के पंछी' में समसामयिक विषयों पर भावना प्रधान काफ़ी रचनाएँ देखने में आईं जो नव रचनकारों में छिपी काव्य प्रतिभा की ओर संकेत करती हैं। श्री मनोज फगवाड़वी जी का यह प्रयास प्रशंसनीय है।इस संकलन में मनोज फगवाड़वी जी अपनी एक ग़ज़ल में कहते हैं :
शिकवा भुला के प्यार जताना भी चाहिए,
रूठा हो गर सनम तो मनाना भी चाहिए।
मौला ने गर किया है तेरा मर्तबा बुलंद,
गिरता हुआ ग़रीब उठाना भी चाहिए।
--- मनोज फगवाड़वी
नीचे के चित्र में हम तीनों साथियों के साथ दाएं से बाईं तरफ़ को दूसरे साहित्यकार श्री हीरा लाल यादव जी हैं जो मुंबई में रहते हैं। सोशल मीडिया पर कई साहित्यिक ग्रुप्स में आपकी अच्छी ग़ज़लों के माध्यम से आपसे काफ़ी पहले से परिचय रहा है परंतु रूबरू मुलाक़ात का यह पहला अवसर था। यादव जी बहुत विनम्र व्यक्ति हैं।पहली ही मुलाक़ात में हम लोग उनसे बहुत प्रभावित हुए। श्री हीरा लाल यादव जी के कुछ अशआर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि आपको उनके श्रेष्ठ सृजन की जानकारी हो सके --
बिन तेरे कुछ मेरी ज़िन्दगानी नहीं,
ये हक़ीक़त है, कोई कहानी नहीं।
आशना ख़ुद से हूँ इसलिए साथियो,
बात करता कभी आसमानी नहीं।
-- हीरा लाल यादव हीरा
आइए एक और उम्दा शख़्सियत से आपकी मुलाक़ात कराते हैं।नीचे तस्वीर में दाईं ओर से बाएं तरफ़ तीसरे नंबर पर हैं जनाब रविन्द्र शर्मा रवि जी जो अंबाला, हरियाणा से आते हैं। शिक्षा विभाग में अच्छे पद पर कार्यरत हैं।अच्छे साहित्यकार और अभिनेता/कलाकार होने के साथ-साथ बहुत मृदु व्यवहार के स्वामी हैं।बहुत अच्छे शेर कहते हैं और अक्सर ही आपसे मेरी फ़ोन पर भी बात होती रहती है।आपके सृजन की बानगी यहाँ प्रस्तुत है :
इक ज़ंग खाई हाथ में तलवार देखकर,
हैरां हूं दुश्मन का ये मेयार देखकर।
वो अगले मोड़ पे मिला औंधा पड़ा हुआ,
मैं दंग था जिस शख्स की रफ़्तार देखकर।
रविन्द्र "रवि"
नीचे तस्वीर में मेरे साथ आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक जनाब ख़ुर्रम नूर साहब हैं।आप नेवी से रिटायर्ड ऑफ़िसर तथा बहुत अच्छे शायर हैं।आपसे भी अक्सर ही साहित्यिक कार्यक्रमों में मुलाक़ात होती रहती है। आप जब भी मिलते हैं बहुत आत्मीयता और ज़िंदादिली के साथ मिलते हैं।हम लोगों ने कई बार एक साथ साहित्यिक मंच साझा किए हैं।
ख़ुर्रम साहब कितने अच्छे शायर हैं इस बात का अंदाज़ा आपको उनके नीचे कोट किए इन चार मिसरों से हो जाएगा जो उन्होंने अपने विभाग नेवी से अपने प्यार को दर्शाते हुए कहे हैं :
झुलसते हैं जो गर्मी में तो सर्दी याद आती है।
जवानी सरज़मीं के नाम करदी, याद आती है ।
वो कहते हैं, मेरे ऊपर तो सारे रंग फबते हैं,
मगर मुझको मेरी नेवी की वर्दी याद आती है!
--- ख़ुर्रम नूर
इतना सहमा-सहमा क्यूं है,
बात मेरी झुठलाता क्यूं है।
घटता जाता है कद उसका,
मुझको ऐसा लगता क्यूं है।
--- दर्द गढ़वाली
इस बार के ग़ज़ल कुंभ में रचनाकार साहित्यिक समूह से जुड़ी हुई एक अच्छी रचनाकार डॉo उषा झा रेणु से मुलाक़ात भी उल्लेखनीय रही।
उषा जी उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं और साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन करती हैं। यद्यपि आप एक शिक्षक हैं परंतु ग़ज़ल विधा को लगन पूर्वक सीखने का आपका विद्यार्थी भाव भी सराहनीय है। उषा जी ने अपने ग़ज़ल संग्रह 'नदी की प्यास' की प्रति भी मुझे भेंट की, जिस पर समय निकालकर में शीघ्र ही कुछ लिखूंगा।
ऐसे उम्दा लोगों से मिलकर दिल को बहुत ख़ुशी हासिल हुई। ईश्वर इन सबको दीर्घायु प्रदान करें ताकि ये लोग यों ही अपने श्रेष्ठ सृजन से समाज को जागरूक करते रहें। अपनी पुरानी ग़ज़ल के एक शेर के साथ बात ख़त्म करता हूं :
अच्छे लोगों में जो उठना-बैठना हो जाएगा,
फिर कुशादा सोच का भी दायरा हो जाएगा।
-- ओंकार सिंह विवेक
Presented by -- Onkar Singh 'Vivek'
Poet/Content writer/Critic/Text blogger
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शुभ प्रभात मित्रो 🌹🌹🙏🙏 संगठन में ही शक्ति निहित होती है यह बात हम बाल्यकाल से ही एक नीति कथा के माध्यम से जानते-पढ़ते और सीखते आ रहे हैं...