May 27, 2024

चिंता में घुलने लगे, बाबू जी दिन-रात

प्रणाम मित्रो 🌹🌹🙏🙏


उत्तर भारत में इस समय भयंकर गर्मी और लू का प्रकोप है। पारा आधे सैकड़े की ओर बढ़ रहा है।सभी साथियों से अनुरोध है कि अपना ध्यान रखें और बहुत अधिक आवश्यकता होने पर ही घर से बाहर निकलें। पिछले कुछ सालों से देखने में आ रहा है कि हर बार बहुत अधिक सर्दी और बहुत अधिक गर्मी के सभी रिकॉर्ड टूट जाते हैं। इसके पीछे पर्यावरण असंतुलन और प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ जैसे तमाम कारण हैं जिन पर कभी बाद में विस्तार से चर्चा करेंगे फिलहाल मेरे कुछ दोहों और एक ग़ज़ल का आनंद लीजिए :

आज कुछ दोहे यों भी 
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©️ 
घर   में    होती    देखकर,बँटवारे   की   बात।
चिंता   में   घुलने   लगे,बाबू  जी   दिन-रात।।

लागत    भी     देते    नहीं,वापस    गेहूँ-धान।
आख़िर किस उम्मीद पर,खेती करे किसान।।
 ©️ ओंकार सिंह विवेक 


सदीनामा अख़बार में संपादक मंडल की मेहरबानी से फिर मेरी एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है☝️☝️ उसका भी आनंद लीजिए।मेरे साथ ही श्री विकास सोलंकी साहब की भी शानदार ग़ज़ल छपी है।सोलंकी साहब को भी उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद।

विशेष -- (सबसे ऊपर जो छायाचित्र आप देख रहे हैं वह पल्लव काव्य मंच रामपुर के एक आयोजन के अवसर पर लिया गया था।उस शानदार कार्यक्रम पर शीघ्र ही एक ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा। कृपया ब्लॉग को विजिट करते रहें🙏🙏)

May 16, 2024

नई ग़ज़ल!!! नई ग़ज़ल!!! नई ग़ज़ल!!!

असीम सुप्रभात मित्रो 🌷🌷🙏🙏

🌷🌱🍀🌴🍁🌸🪷🌺🌹🥀🌿🌼🌻🌾☘️💐

मेरी ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए आज फिर "सदीनामा" अख़बार के संपादक मंडल का हृदय की असीम गहराइयों से आभार।
आज मेरी ग़ज़ल के साथ मुंबई,महाराष्ट्र के शायर जनाब ताज मुहम्मद सिद्दीक़ी साहब की भी बेहतरीन ग़ज़ल छपी हैं।इंसानियत और भाई चारे का पैग़ाम देती हुई जनाब ताज मुहम्मद सिद्दीक़ी साहब की उम्दा ग़ज़ल के लिए उन्हें भी बहुत-बहुत मुबारकबाद। यूं तो ताज मुहम्मद सिद्दीक़ी साहब की ग़ज़ल के सभी अशआर अच्छे हैं परंतु यह शे'र मुझे  ख़ास तौर पर बहुत अच्छा लगा :
  इलाही रहें मिलके हिन्दू व मुस्लिम,
  न झगड़े कभी ये अज़ां-आरती पर।
      -- ताज मुहम्मद सिद्दीक़ी 


ऊपर अख़बार में छपी मेरी नई तरही ग़ज़ल
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फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन 
©️ 
लोग   जब    सादगी   से   मिलते   हैं, 
हम भी फिर ख़ुश-दिली से मिलते  हैं।

आदमी    को     क़रीने    जीने     के,
'इल्म   की    रौशनी   से   मिलते  हैं।

ख़ैरियत   लेने   की   ग़रज़   से   नहीं,  
दोस्त  अब  काम  ही   से  मिलते  हैं।

आस   करते   हैं   जिनसे  नरमी  की,
उनके   लहजे    छुरी-से   मिलते   हैं।

राम   जाने    सियाह   दिल     लेकर,
लोग   कैसे   किसी   से   मिलते   हैं।
                 ©️ ओंकार सिंह विवेक

May 9, 2024

बात ग़ज़लों और दोहों की

मित्रो सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏
आजकल ख़ूब ज़ेहन बना हुआ है पढ़ने और लिखने का। पिछले हफ़्ते तक मां शारदे की कृपा से कई नई ग़ज़लें हुई हैं और कुछ दोहे भी कहे हैं।कई साहित्यिक आयोजनों में जाना हुआ।कई नए और वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपनी पुस्तकें भेंट कीं। पिछले दिनों देश के चर्चित ग़ज़लकार श्री दीक्षित दनकौरी जी का ग़ज़ल संग्रह "सब मिट्टी" पूरी तन्मयता के साथ पढ़ा।कुछ शेर तो कई-कई बार पढ़े। जनसरोकारों से जुड़ी श्री दनकौरी जी की सभी ग़ज़ले बहुत धारदार हैं। ग़ज़ल संग्रह को पढ़कर मैंने उसका परिचय देता हुआ विस्तृत वीडियो भी अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया जिसको बहुत पसंद किया गया।
यह ब्लॉग पोस्ट लिखते हुए मुझे श्री दनकौरी जी के दो अशआर याद आ गए :
 शे'र  अच्छा-बुरा  नहीं  होता,
या  तो होता है या नहीं होता।
*
ख़ुलूस-ओ-मुहब्बत की ख़ुश्बू से तर है,
चले  आईए  ये   अदीबों  का   घर  है।
       दीक्षित दनकौरी 
इन अशआर से ही आपको श्री दनकौरी जी के अशआर की गहराई का अंदाज़ा हो जाएगा।
इस दौरान ग़ज़लों के साथ-साथ कुछ दोहे भी कहे मैंने जो आपकी प्रतिक्रिया के लिए प्रस्तुत हैं :
 ©️
करते रहना है उसे,काम काम बस काम।
बेचारे मज़दूर  को,क्या  वर्षा क्या घाम।।

होंगे क्या इससे अधिक,बुरे और  हालात।
चौराहे तक आ गई,अब तो घर की बात।।

हमने दिन को दिन कहा,और रात को रात।
बुरी लगी सरकार को,बस इतनी सी बात।।

घर  में   होती   देखकर,बँटवारे   की  बात।
चिंता में  घुलने   लगे,बाबू  जी  दिन-रात।।
                        ©️ ओंकार सिंह विवेक
बात जब ग़ज़ल की चल ही रही है तो मेरी ग़ज़ल का एक मतला' और एक शेर भी देखिए :
कभी कुछ शादमानी लिख रहा हूं,
कभी मैं  सरगिरानी लिख रहा हूं।

कई तो हैं ख़फ़ा इस पर ही  मुझसे,
कि मैं पानी को पानी लिख रहा हूं।
   ©️ ओंकार सिंह विवेक 





      

May 7, 2024

आज फिर एक नई ग़ज़ल

 एक बार फिर कोलकता के सम्मानित अख़बार/पत्रिका "सदीनामा", ख़ास तौर से शाइर आदरणीय ओमप्रकाश नूर साहब, का बेहद शुक्रिया। सदीनामा निरंतर सामाजिक सरोकारों वाली ग़ज़लें प्रकाशित करके अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर रहा है।इस बार मेरे साथ ही भाई श्री दर्द गढ़वाली साहब की भी बेहतरीन ग़ज़ल छपी है। दर्द साहब को भी बहुत-बहुत मुबारकबाद।दर्द गढ़वाली साहब बहुत अच्छे शेर कहते हैं। अब तक आपके दो ग़ज़ल-संग्रह मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं।

--ओंकार सिंह विवेक 


May 1, 2024

मज़दूर दिवस

आज मज़दूर दिवस है। प्रतीकात्मक रुप से इस दिन दीन-हीन को लेकर ख़ूब वार्ताएं और गोष्ठियां आयोजित की जाएंगी। श्रम  क़ानूनों पर व्याख्यान होंगे। मज़दूरों की दशा पर घड़ियाली आंसू बहाए जाएंगे परंतु बेचारे मज़दूर की दशा में कोई ख़ास अंतर नहीं आना है।
ख़ाली जेब,सिर पर बोझा और पांवों में छाले ,यही
 मुक़द्दर है एक श्रमिक का। गर्मी, वर्षा और जाड़े सहते हुए बिना थके और रुके काम में लगे रहना ही उसकी नियति है। मेहनत करके रूखी-सूखी मिल गई तो खा ली,वरना पानी पीकर खुले आकाश के नीचे सो गए । उसकी पीड़ा को भी काश ! कभी ढंग से समझा जाए।उसे उसकी मेहनत का पूरा दाम मिले, बिना भेद भाव के शासन उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रति गंभीर हो।
मज़दूर वर्ग से काम लेने के नीति और नियमों में आवश्यकतानुसार सुधार किए जाएं तभी इस वर्ग का कल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है।
प्रसंगवश मुझे अपनी अलग-अलग ग़ज़लों के दो शे'र तथा एक पुराना दोहा याद आ गया :

शेर
***
कहां  क़िस्मत  में उसकी  दो घड़ी आराम  करना  है,
मियां ! मज़दूर को तो बस मुसलसल काम करना है।

***
उसे करना ही पड़ता है हर इक दिन काम हफ़्ते में,
किसी मज़दूर की क़िस्मत में कब इतवार होता है।

दोहा 
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करना है दिन भर उसे, काम काम बस काम।
बेचारे  मज़दूर   को, क्या  वर्षा   क्या  घाम।।
               ©️ ओंकार सिंह विवेक 



     

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