November 3, 2022

हिंदी काव्य में दोहे


दोहा हिंदी काव्य विधा की एक पुरातन लोकप्रिय विधा है।दो पंक्तियों में ही बहुत मारक और सटीक बात कहने के लिए हिंदी काव्य में दोहे से अच्छी शायद और कोई विधा हो ही नहीं सकती। दोहे के दो पदों में चार चरण होते हैं।पहले और तीसरे चरण को विषम तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहते हैं।विषम चरणों में १३ तथा सम चरणों में ११ मात्राएं होती हैं।विषम चरण में १-२ पर तथा सम चरण में २-१ पर यति निर्धारित होती है।
अक्सर लोग कह देते हैं कि १३-११ मात्राओं की गणना का ध्यान रखते हुए आसानी से दोहा कहा जा सकता है परंतु यह इतना भी आसान नहीं है। निर्धारित मानकों का पालन करते हुए कम से कम शब्दों में पूरी संप्रेषणीयता के साथ काव्य-अभिव्यक्ति में बहुत अभ्यास की ज़रूरत होती है। गद्य की तरह सपाट बयानी करते हुए सिर्फ़ मात्राएं पूरी कर देने भर से दोहा प्रभावशाली नहीं हो सकता। इसके लिए कुछ कलात्मक और चमत्कारिक कौशल की आवश्यकता होती है।वाक्य विन्यास,शिल्प विधान और व्याकरण आदि का ध्यान रखते हुए चुस्त शब्द संयोजन के साथ मारक दोहा सृजन करने में पसीने छूट जाते हैं।

कबीर, रहीम,बिहारी जैसे प्रसिद्ध कवियों के दोहों को पढ़कर हम दोहों की मारक क्षमता का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ,
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।
           कबीरदास 
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।
           रहीमदास
सतसइया के दोहरे,ज्यों नावक के तीर,
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर।
             बिहारी

इन दिनों ग़ज़लों के सर्जन के साथ मैंने अपने कुछ पहले कहे गए दोहों में संशोधन भी किया । संशोधित दोहे आपकी अदालत में प्रस्तुत कर रहा हूं :
कुछ दोहे 
*******  --ओंकार सिंह विवेक
©️
मिली  कँगूरों  को  भला,यों  ही  कब  पहचान,
दिया  नीव  की  ईंट  ने,पहले  निज  बलिदान।

कलाकार  पर  जब   रहा,प्रतिबंधों  का   भार,
कहाँ कला में आ सका,उसकी तनिक निखार।

महँगाई    को    देखकर, जेबें    हुईं     उदास,
पर्वों   का   जाता   रहा,अब   सारा   उल्लास।

भोजन   करके   सेठ   जी,गए  चैन   से   लेट,
नौकर   धोता    ही   रहा, बर्तन   ख़ाली   पेट।

चल  हिम्मत  को  बाँधकर,जल  में पाँव उतार,
ऐसे   तट   पर   बैठकर,नदी  न   होगी   पार।  
                        ©️ ---ओंकार सिंह विवेक

     (पत्नी तथा बच्चों के साथ वर्ष ,२०१९ में स्वर्ण मंदिर               अमृतसर में लिया गया फोटो)



12 comments:

  1. Replies
    1. अतिशय आभार आदरणीया 🙏🙏🌹🌹

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  2. बहुत अच्छे सामयिक दोहे

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-11-2022) को   "देवों का गुणगान"    (चर्चा अंक-4603)     पर भी होगी।
    --
    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    Replies
    1. आभार आदरणीय 🙏🙏🌹🌹 उपस्थित रहूंगा

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  4. वाह ओंकार सिंह 'विवेक' जी !
    सतसैया के दोहरों की तरह आज की व्यवस्था पर गम्भीर घाव करने वाले बहुत ही चुभते हुए दोहे !

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    1. उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार आपका 🙏🙏🌹🌹

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  5. वाह!बढ़िया कहा 👌

    भोजन करके सेठ जी,गए चैन से लेट,
    नौकर धोता ही रहा, बर्तन ख़ाली पेट... गज़ब कहा 👌

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  6. बेहतरीन रचना।

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