July 16, 2021

तो गुज़रेगी क्या सोचिए रौशनी पर


ग़ज़ल--ओंकार सिंह विवेक
मोबाइल 9897214710
©️
सभी   फ़ख़्र   करने   लगें  तीरगी  पर,
तो  गुज़रेगी क्या सोचिए  रौशनी पर।

सर-ए-आम ईमान  जब  बिक रहे हों,
तो कैसे भरोसा  करें  हम  किसी पर।

सुनाते   रहे    मंच    से    बस  लतीफ़े,
न आए वो आख़िर तलक शायरी पर।

अलग  दौर  था  वो,अलग था ज़माना,
सभी  नाज़  करते   थे जब दोस्ती पर।

न  रिश्वत  को  पैसे, न कोई सिफ़ारिश,
रखेगा  तुम्हें   कौन  फिर  नौकरी  पर।

किसी ने कभी उसकी पीड़ा न समझी,
सभी  ज़ुल्म  ढाते   रहे  बस  नदी  पर।

बहुत   लोग  थे  यूँ  तो  पूजा-भवन  में,
मगर ध्यान कितनों का था आरती पर?
          ---- ©️  ओंकार सिंह विवेक

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