March 28, 2025

'सदीनामा' अख़बार की मुहब्बतों का शुक्रिया

हमेशा की तरह एक बार फिर कोलकता के प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' के संपादक मंडल, ख़ास तौर पर श्री ओमप्रकाश नूर साहब' का दिल की गहराईयों से शुक्रिया 🙏🙏कि उन्होंने मेरी ग़ज़ल को अख़बार में स्थान दिया।प्रसिद्ध शायर आदरणीय ओमप्रकाश नदीम साहब को भी उनकी बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद 🌹🌹
    -- ओंकार सिंह विवेक 

March 26, 2025

हर दिन कुछ नया सृजन

अभी दो दिन पहले एक छोटी  बहर की ग़ज़ल प्रस्तुत की थी।आप सभी का बहुत स्नेह प्राप्त हुआ उस पर,उसके लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी एक बहर पर ज़ेहन बन जाता है तो उस पर लगातार कई ग़ज़लें हो जाती हैं। सो उसी बहर और रदीफ़- क़ाफ़ियों में चंद अशआर और हो गए जो आपकी ख़िदमत में पेश हैं :
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
***************** 
दिल ग़म  का आभारी है,
इसने  ज़ीस्त  निखारी है।

ऊँचे  लाभ  की   सोचेगा,
आख़िर  वो  व्यापारी  है।

दो  पद, दो  सौ  आवेदन,
किस  दर्जा   बे-कारी  है।

स्वाद  बताता  है  इसका,
माँ   ने   दाल  बघारी  है।

काहे   के   वो    संन्यासी, 
मन    पूरा    संसारी    है।

चख  लेता है  मीट  कभी,
वैसे       शाकाहारी     है।

उससे कुछ बचकर रहना,
वो    जो   खद्दरधारी   है।
©️ ओंकार सिंह विवेक

March 25, 2025

फिर एक नई ------

एक छोटी बहर की हल्की-फुल्की ग़ज़ल जो 
 पिछले कई दिनों से ज़ेहन में चल रही थी :
*********************************

मिलने    में    दुश्वारी   है,
वैसे     आपसदारी     है।

इसकी  टोपी उसके  सर,
क्या उसकी फ़नकारी है।

दुश्मन  दाना  है  तो क्या,
अपनी   भी   तैयारी   है।

तनहा है  सच्चा  लेकिन,
सब झूठों  पर  भारी  है।

'आलीजाह के पाँव  पड़े,
कुटिया  धन्य  हमारी  है।

पहले  क्या  थे, ये छोड़ो,
अब  उनकी  सरदारी है।

ध्यान  यक़ीनन  खींचेगा,
शे'र   अगर   मे'यारी  है।
 ©️ओंकार सिंह विवेक 

March 22, 2025

विश्व जल दिवस विशेष

नमस्कार मित्रो 🌹🌹🙏🙏

आज विश्व जल दिवस पर प्रस्तुत है मेरा एक कुंडलिया छंद। आशा है अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य ही अवगत कराएंगे :

विश्व जल दिवस पर एक कुंडलिया छंद 
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  पानी   जीवन   के   लिए, है  अनुपम  वरदान।
  व्यर्थ न  इसकी बूँद  हो,रखना  है  यह ध्यान।।
  रखना  है  यह ध्यान,करें सब संचय  जल का।
  संकट हो विकराल,पता क्या है कुछ कल का।
  करता  विनय  'विवेक',छोड़ दें अब  मनमानी।
  मिलकर  करें   उपाय , बचाएँ  घटता   पानी।।   
                             ©️ ओंकार सिंह विवेक

#viralpost #trendingpost #WorldWaterDay #विश्वजलदिवस 
(चित्र:गूगल से साभार)

March 17, 2025

'अपनी कॉलोनी' का होली के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न

फागुन का मस्त महीना है।खेतों में सरसों फूली हुई है। बाग़ों में ख़ुशबूदार पुष्प किलोल कर रहे हैं।आम के पेड़ सुगंधित बौर से लदे हुए हैं।कहने का अर्थ यह है कि प्रकृति का यौवन पूरे शबाब पर है। ऐसे में होली के मस्त त्योहार के आगमन से सभी का मन प्रफुल्लित है और रंग खेलने को उतावला है। रंग-गुलाल की इसी ख़ुमारी में  'अपनी कॉलोनी' (निकट किड्जी स्कूल) रामपुर का होली के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय रंग उत्सव तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम धूमधाम के साथ संपन्न हुआ।
रंग वाले दिन (14मार्च,2025)प्रात: 9 बजे से 'अपनी कॉलोनी' वासियों द्वारा एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभ कामनाएं दी गईं।होली के मस्त गानों पर जमकर धमाल मचाया गया।
  इस समय मुझे प्रसिद्ध कवि नीरज गोस्वामी की यह पंक्तियाँ याद आ रही हैं :
         करें जब पांव ख़ुद नर्तन, समझ लेना कि होली है,
         हिलोरें  ले रहा हो मन, समझ लेना  कि  होली है।
                                       -- नीरज गोस्वामी 
 कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर ठंडाई तथा गुझिया, खस्ता कचौड़ी आदि लज़ीज़ व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया गया।
अगले दिन यानि 15 मार्च ,2025 को होली कार्यक्रमों के दूसरे चरण का शुभारंभ कॉलोनी की वरिष्ठ सदस्या श्रीमती दर्शन  रस्तौगी ने मां शारदे के समक्ष पुष्प अर्चन तथा दीप प्रज्ज्वलन  के द्वारा किया।
दीप प्रज्ज्वलन के पश्चात कॉलोनी की महिला शक्ति द्वारा इतनी "शक्ति हमें देना दाता,मन का विश्वास कमज़ोर हो ना" ईश वंदना प्रस्तुत की गई।
.    (ईश वंदना प्रस्तुत करते हुए श्रीमती आशा भांडा,           श्रीमती पूनम गुप्ता, श्रीमती सपना अग्रवाल तथा           श्रीमती रेखा सैनी जी)

बच्चों के मन निर्विकार होते हैं यही सोचकर शायद निदा फ़ाज़ली साहब ने उनके लिए यह शेर कहा होगा-- 
          बच्चों  के छोटे  हाथों  को चाँद सितारे छूने दो,
          चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।
                                         -- निदा फ़ाज़ली 
बच्चों से ही घर-परिवार में रौनक़ होती है यही सोचकर कार्यक्रम का शुभारंभ बच्चों की प्रस्तुतियाँ से कराया गया। उन्होंने गीत, संगीत,नृत्य, कविता तथा चुटकुलों आदि से उपस्थित दर्शकों/अभिभावकों का भरपूर मनोरंजन करके अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

 (कॉलोनी के प्रस्तुति देने वाले बच्चे आयुषी अग्रवाल, हर्षित दिवाकर, वान्या,भव्या, अवनि, इशिका तथा ग्रंथ भांडा)
बच्चों की शानदार परफॉर्मेंस की करतल ध्वनि से प्रशंसा करते हुए उन्हें गिफ्ट्स आदि देकर प्रोत्साहित किया गया। बच्चों के प्रति इस प्रकार का gesture उन्हें भविष्य में अच्छे कलाकार बनने में मददगार हो सकता है।
नारियां ही सृष्टि और घर परिवार का आधार होती हैं। दुःख दर्द और पीड़ा सहकर घरों को जोड़े रखने वाली नारियों के लिए कवयित्री गरिमा अंजुल ने ठीक ही कहा है --- 
        सूना    है   नारी    बिना,यह   सारा  संसार।
        वह मकान को घर करे, देकर अपना प्यार।।
                               --- गरिमा अंजुल
अपनी कॉलोनी की महिला सदस्य भी कहाँ पीछे रहने वाली थीं। उन्होंने भी अपनी-अपनी धमाकेदार 
प्रस्तुतियों से कार्यक्रम की भव्यता और सफलता में चार चांद लगाए। कार्यक्रम को गति देने के लिए श्रीमती आशा भांडा ने हाऊजी कार्यक्रम का संयोजन किया जिसमें लोगों ने ख़ूब रुचि दिखाई।
श्रीमती सपना अग्रवाल तथा श्रीमती पूनम गुप्ता जी ने क्रमशः पति पत्नी के रोल करते हुए एक शानदार शानदार प्रहसन/चुटिला संवाद प्रस्तुत करके सबकी तालियां बटोरीं। श्रीमती सपना अग्रवाल ने बीच बीच में चटपटे सवाल पूछकर माहौल को ख़ुशगवार बनाए रखने में भी सहयोग किया।
श्रीमती रेखा सैनी ने भी फिल्मी गीत "इक प्यार का नग़्मा है, मौजों की रवानी है" प्रस्तुत करके दर्शकों का ध्यान खींचा :

कार्यक्रम में श्रीमती पूनम जी (Mrs Dr Vijay kumar) ने भी poetry recital  करके सबकी वाही वाही लूटी।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में सहभागिता करने वालों से तालमेल बनाकर अंतिम रूपरेखा के लिए बैठकों का आयोजन करने तथा संचालन में श्रीमती पूनम गुप्ता जी तथा श्रीमती आशा भांडा जी का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम को मूर्त रूप देने में आप दोनों का विशेष रूप से आभार प्रकट करते हैं।
पुरुष वर्ग के तो क्या ही कहने उन्होंने अपनी अपनी अभिव्यक्तियों से जहां एक और अपनी पत्नियों को प्रभावित किया वहीं पंडाल में उपस्थित लोगों को भी तालियां बजाने के लिए विवश किया।

 (ऊपर के चित्र में ☝️:प्रस्तुति देने वाले पुरुष वर्ग के सदस्य प्रवीण भांडा, ओंकार सिंह विवेक, वीर सिंह, राजीव अग्रवाल,निखिल भांडा तथा अतर सिंह जी)

कार्यक्रम का आनंद लेते हुए कॉलोनी का युवा वर्ग👇👇
कार्यक्रम में उपस्थित पुरुष वर्ग की यादगार/शानदार तस्वीर 👇👇
डॉक्टर विजय कुमार और राजीव अग्रवाल ने तो अपने दिल फ़रेब डांस से समां ही बांध दिया 

कार्यक्रम के अंतिम चरण में सबने मिलकर फूलों की होली खेली।
आर के गुप्ता जी ने बड़ी सादगी के साथ सभी का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कार्यक्रम समापन की घोषणा की।
सुस्वादु सहभोज के पश्चात अगले वर्ष दूने उत्साह से मिलने के प्रण के साथ सबने अपने अपने घर की राह ली।
यों तो सभी कॉलोनी वासियों के तन-मन तथा धन के सहयोग के चलते ही ऐसा शानदार कार्यक्रम हो पाया।परंतु फिर भी इस कार्यक्रम को लीड करने में प्रवीण भांडा,अंकुर रस्तौगी,के के अग्रवाल एडवोकेट तथा आर के गुप्ता जी की विशेष भूमिका के चलते उनके प्रति अतिरिक्त आभार प्रकट करना हम सबका दायित्व बनता है। इस अवसर पर कॉलोनी की सफ़ाई व्यवस्था में अपेक्षा से अधिक सहयोग करने के लिए वार्ड मेंबर अशोक सैनी की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए उन्हें सम्मानित करने का भी निश्चय किया गया।
सम्मानित मीडिया/अख़बार (दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान तथा अमृत विचार)वाले सम्मानित बंधुओं का 'अपनी कॉलोनी' रामपुर के कार्यक्रम की शानदार कवरेज करने के लिए हम दिल की गहराईयों से आभार प्रकट करते हैं :

मुझे अपनी कॉलोनी के इस शानदार कार्यक्रम के संचालन का दायित्व निर्वहन करके हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। 
काश ! सब लोग पूर्वाग्रहों से दूर रहते हुए भविष्य में भी यों ही एक दूसरे के प्रति आत्मीयता प्रदर्शित करते रहें इसी कामना के साथ इस लंबी blog post को बशीर बद्र साहब के इस शेर के साथ विराम देता हूं :
         मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
          किसी  मोड़  पर  फिर  मुलाक़ात  होगी।

प्रस्तुतकर्ता 
ओंकार सिंह विवेक 
--- साहित्यकार/समीक्षक/कंटेंट राइटर/टैक्सट ब्लॉगर 
                
        

March 15, 2025

रंगोत्सव होली पर शानदार काव्य गोष्ठी


 सैंया   जी    ने    घेरकर, डारो   ऐसो   रंग

   *******************************

फागुन का मस्त महीना है।खेतों में सरसों फूली हुई है। बाग़ों में ख़ुशबूदार पुष्प किलोल कर रहे हैं।आम के पेड़ सुगंधित बौर से लदे हुए हैं।कहने का अर्थ यह है कि प्रकृति का यौवन पूरे शबाब पर है। ऐसे में होली के मस्त त्योहार के आगमन से सभी का मन प्रफुल्लित है और रंग खेलने को उतावला है। रंग-गुलाल की इसी ख़ुमारी में होली की पूर्व संध्या पर उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई तथा पल्लव काव्य मंच रामपुर के संयुक्त तत्वावधान में  रंगारंग काव्य गोष्ठी का आयोजन कवि शिव कुमार चन्दन जी के आवास पर किया गया।

काव्य गोष्ठी में कवियों ने रंगों से सराबोर रचनाएँ सुनाकर समां बांध दिया।

कवि ओंकार सिंह विवेक की सरस्वती वंदना से काव्य गोष्ठी का शुभारंभ हुआ --

     हो मेरा चिंतन प्रखर, बढ़े निरंतर ज्ञान।

     हे माँ वीणा वादिनि, दो ऐसा वरदान।।

सरस्वती वंदना के पश्चात काव्य पाठ के लिए आमंत्रित करने पर कवि सोहन लाल भारती ने अपनी काव्य अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार दी :

        माह फागुन का है त्यौहार,

        इसे मनाओ सब मिलकर।

        रंग लगें सबके चेहरों पर,

         सब हो जाएं गुल खिलकर।

कवि सुधाकर सिंह ने अपनी मार्मिक रचना पढ़ी :

         एक चिड़िया मेरे घर के बरामदे में,

          हर वर्ष एक घोंसला बनाती है।

          पता नहीं तिनके कहां से लाती है ?

          सूखी लकड़ियां वह कैसे ढूंढ पाती है।


युवा कवि राजवीर सिंह राज़ ने होली पर अपना माहिया प्रस्तुत करते हुए कहा 

         भंग पीकर आया हूँ,

          खेलन को होरी।

           रँग लेकर आया हूँ।

ओंकार सिंह विवेक ने होली के रंगों की मस्ती में डूबे अपने दोहे प्रस्तुत करते हुए कहा 

          सैंया   जी    ने    घेरकर, डारो   ऐसो   रंग।

          नस नस में सिहरन हुई,भीग गयो हर अंग।।


         कर में पिचकारी लिए, पीकर थोड़ी भंग।

         देवर  जी  डारन  चले, भौजाई  पर रंग।।

कवि शिव कुमार चन्दन ने रचना पाठ करते हुए कहा :

         होरी खेलें नंद लाल,

         संग लिए ग्वाल बाल।

          मारे पिचकारी मले मुख पर गुलाल है।

           बृज युवतिन की है सुधि बिसराय गई,

            प्रेम रंग रँग रयो जसुदा का लाल है।

इनके अतिरिक्त पतराम सिंह,प्रदीप माहिर, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी तथा नवीन पांडे आदि ने भी अपनी समसामयिक रचनाओं से मंत्रमुग्ध किया।

गोष्ठी की अध्यक्षता शिव कुमार चन्दन ने तथा संचालन राजवीर सिंह राज़ ने किया।


----साहित्यकार ओंकार सिंह विवेक 

अध्यक्ष उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई

उपाध्यक्ष पल्लव काव्य मंच रामपुर 


होली है भाई होली है, रंग बिरंगी होली है 🎈🎈👈👈


March 13, 2025

🎈🎈 रंग होली के🎈🎈

नमस्कार दोस्तो 🙏🙏
            (चित्र : गूगल से साभार)
होली की ख़ुमारी अपने शबाब पर है। रंग,गुलाल और पकवानों की बहार है। मौसम में भी एक अजब सा नशा है। ऐसे माहौल में मेरे कुछ दोहों का आनंद लीजिए --

होली पर कुछ दोहे 

 *************

सैयाँ   जी    ने    घेरकर, डारो   ऐसो    रंग।

नस नस में सिहरन हुई,भीज गयो हर अंग।।


कर में  पिचकारी  लिए,पीकर  थोड़ी  भंग।

देवर   जी   डारन   चले,भौजाई  पर  रंग।।


भाये   फिर  कैसे  उसे,होली  का  त्योहार।

गोरी  के  साजन  गए,सात  समुंदर  पार।।


महँगाई   की   मार  से,टूट  गई  हर  आस।

निर्धन की  इस बार भी, होली रही उदास।।


होली पर समझें तनिक,उनके भी जज़्बात।

जिन माँओं  के  लाल हैं,सीमा पर  तैनात।।


रही  न   वह  अपनत्व  के,रंगों   की  बौछार।

डिजिटल होकर रह गया,होली का  त्योहार।।


                        ©️ ओंकार सिंह विवेक 

🎁🎁🎇🎇🙋🙋🍰🍰🎁🎁🎉🎉🎈🎈


     हमारे संस्कार/फ़िक्र-ओ-फ़न 💐💐👈👈


     होली है !!! Happy Holi !!! 🎈🎈



March 6, 2025

ग़ज़ल के हवाले

नमस्कार मित्रो 🙏🙏

कई दिन बाद आपकी अदालत में पेश है मेरी एक ताज़ा ग़ज़ल---
नई ग़ज़ल 
********
शिकारे को  ख़ुशी क्या फ़ील  होगी?
जमी जब  ठंड  से डल  झील होगी।

तभी  तो  होगी शेरों  की  भी आमद,
जली  जब  फ़िक्र की  क़िंदील होगी।

अभी  संगीन    है    हालत नगर की,
अभी  कर्फ़्यू  में   कैसे   ढील  होगी।  

हमेशा  बस   वही  नफ़रत  उगलना,
तुम्हारी  फ़िक्र  कब   तब्दील  होगी।

करेगा   माल   में   कोई    मिलावट,
दुकाँ लेकिन किसी  की  सील होगी।
   
घटेगी   जुर्म     की    रफ़्तार    कैसे,
सिपाही-चोर  की  जब   डील  होगी।

सभी   फॉलो  करेंगे   फेसबुक   पर,
हमारी  वायरल  जब   रील    होगी। 
               ©️ ओंकार सिंह विवेक 


February 15, 2025

कुछ बातें कुछ कविता

नमस्कार मित्रो 🌹🌹🙏🙏
मित्रो एक प्रतिष्ठित साहित्यिक व्हाट्सएप ग्रुप है जिसका नाम है रचनाकार दिल्ली-1,इस ग्रुप के बारे में पहले भी मैं कई बार अपने ब्लॉग पर पोस्ट्स लिख चुका हूँ।बहुत ही व्यवस्थित और अनुशासित साहित्यिक पटल है यह जिससे देश भर के तमाम साहित्यकार जुड़े हुए हैं।मैं भी पिछले कई वर्षों से इस पटल से जुड़ा हुआ हूँ। कभी-कभी ग़ज़ल समीक्षा के दायित्व का निर्वहन भी करता हूँ इस पटल पर।
इस बार ग़ज़ल कहने के लिए जो मिसरा पटल पर दिया गया उस पर मैंने भी ग़ज़ल कही थी। मैं आभारी हूँ  सम्मानित मंच का कि निर्णायकों ने मेरी ग़ज़ल को सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान के लिए चयनित किया।
आदरणीय दीपेश दवे जी को भी उनकी ग़ज़ल के चयन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
निर्णायकों तथा पटल प्रशासन द्वारा जारी किए गए परिणाम को हूबहू मंच से साभार लेकर आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
(रचनाकार मंच से साभार 👇)
*रचनाकार दिल्ली 1*

*पंजीयन क्रमांक 2434/2018*

*एक कदम साहित्यिक उत्कृष्टता की ओर*

*संवेदना सृजन सम्मान के साथ*

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*पटल परिणाम*

दिनांक -- 11/2/2025

दिन -- मंगलवार

मिसरा  -- मिलेगा क्या जो हम चर्चा करेंगे 

विधा -- गजल

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
*दैनिक सम्मान*
1- सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान
आ० ओंकार सिंह विवेक जी
आ० दीपेश दवे जी
 
2- उत्कृष्ट समीक्षा सम्मान
आ० गिरीश पाण्डेय जी
आ० सरफराज हुसैन फराज जी

3 - संचालन कौशल सम्मान
आ० प्रभात पटेल जी

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
सभी चयनित साहित्यसाधको को हार्दिक बधाई 
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

*एक किरण विश्वास की*
*सबके साथ विकास की* 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
प्रबंधन मंडल
रचनाकार
(रचनाकार मंच से साभार ☝️)

मेरी उस ग़ज़ल का भी आनंद लीजिए जिसका चयन रचनाकार दिल्ली-1 साहित्यिक पटल द्वारा किया गया :

                  ग़ज़ल 
                  ****
किसी का  सहल गर  रस्ता करेंगे,
कुछ अपने ही लिए अच्छा करेंगे।

इधर  अख़्लाक़   की  देंगे  दुहाई,
उधर  ईमाँ  का  वो  सौदा  करेंगे।

अगर पहुँचे नहीं हम शाम को घर,
पिता जी  रात  भर  चिंता  करेंगे।

पता  है  रहनुमाओं की  हक़ीक़त,
सदा  वा'दे  पे  बस  वा'दा  करेंगे।

जहाँ   मौसूल    होगा   माल-पानी,
वहीं  बेटे   का   वो   रिश्ता  करेंगे।

मिला दी धूल में  संसद की  गरिमा,
न जाने  रहनुमा   क्या-क्या  करेंगे।

किसी  की   चाकरी   तो  चाकरी है,
'विवेक'अब काम कुछ अपना करेंगे।
            ©️ ओंकार सिंह विवेक 


February 8, 2025

एक नई ग़ज़ल

दोस्तो ! लीजिए पेश है मेरे नए ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' से एक ग़ज़ल :

                         ग़ज़ल 
                          ****
              ©️ 
             लोग   जब  सादगी   से    मिलते   हैं,
             हम भी फिर ख़ुश-दिली से मिलते हैं।

             आदमी    को     क़रीने    जीने     के,
             'इल्म   की   रौशनी   से   मिलते  हैं।

             ख़ैरियत  लेने   की   ग़रज़   से   नहीं,  
             दोस्त  अब  काम  ही   से  मिलते  हैं।

             आस   करते   हैं   जिनसे नरमी  की,
             उनके   लहजे   छुरी-से   मिलते   हैं।

             राम   जाने   सियाह   दिल     लेकर,
             लोग   कैसे   किसी   से   मिलते  हैं।

             वो   रिटायर   हैं   नौकरी   से   मगर,
             आज   भी   अफ़सरी  से  मिलते  हैं।

             दिल को नाकामियों के बोझ 'विवेक',
             हौसलों   की   कमी   से   मिलते   हैं।   
                               ©️ ओंकार सिंह विवेक

(ग़ज़ल कुंभ,2025 हरिद्वार में साथी साहित्यकारों के साथ लिया गया फ़ोटो)



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