January 17, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग -1)


सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे,
चले  चलो  के  जहाँ  तक   ये  आसमान  रहे।

ये क्या उठाये क़दम और  आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
        ---- राहत इंदौरी

सफ़र और उसकी थकान सहन करने का मंज़िल की राह में कितना महत्व है,शायर के ऊपर कोट किए गए शेरों से बख़ूबी समझा जा सकता है।सो इसी रौ में हम चार साथी भी सपरिवार कड़कड़ाती ठंड में कोई मक़सद लिए सफ़र पर निकल पड़े।सफ़र भी कोई मामूली नहीं बल्कि सनातन के गौरव,धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी का।
ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी जी द्वारा प्रतिवर्ष 'ग़ज़ल कुंभ' के नाम से एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कराया जाता है।इस साहित्यिक कार्यक्रम में उपस्थित होकर देश भर के कवि/ग़ज़लकार ग़ज़ल पाठ करते हैं।रामपुर से हम चार साथी(मैं ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़) पिछले कई वर्षों से इस कार्यक्रम में सहभागिता करते आ रहे हैं।
इस बार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी (बनारस-वाराणसी)में 10/11जनवरी,2026 को हुआ।इस बार इस कार्यक्रम में हम सभी साथियों ने ग़ज़ल पाठ तो किया ही साथ ही अपने परिजनों के संग पावन नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ सारनाथ जैसे ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के भ्रमण का आनंद भी लिया।
लीजिए पेश है तीन दिन की इस साहित्यिक-सह-पर्यटन यात्रा की सिलसिलेवार पहली कड़ी :
पहला दिन (Day-1)
****************
9 जनवरी को दोपहर बाद हम लोग अपने-अपने परिवार सहित रामपुर से काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुए। रास्ते भर जो मस्ती हुई सफ़र में उसका बयान करना मुश्किल है। सभी ने गीत,कविता चुटकुले आदि सुनाकर रास्ते भर एक दूसरे का ख़ूब मनोरंजन किया।ट्रेन में साहित्यिक वार्तालाप तथा काव्य पाठ भी हुआ। आसपास की सीटों पर जो यात्री विराजमान थे उन्होंने भी हमारे साथ मस्ती में सहभागिता की।एक महिला यात्री ने तो सबको एक साथ यात्रा करने का अवसर प्रदान करने के लिए अपनी बर्थ भी हमें दे दी और हमारी दूसरे कूपे में निर्धारित सीट सहर्ष स्वीकार कर ली।ग्रुप के सभी साथियों ने उनका बार-बार हृदय से आभार व्यक्त किया।ट्रेन में ग्रुप ने जो डिनर किया उसके तो कहने ही क्या हैं।सभी अपने-अपने घर से कुछ न कुछ अलग डिश बनाकर लाए थे। रोटियों की बात करूँ तो पूरी,पराठे, बथुआ के पराठे तथा फ्राइडराइस आदि--आदि। सब्ज़ियों में आलू,मिक्सड वैज,पंजाबी चने,शिमला मिर्च तथा पनीर,चटनी आदि, क्या क्या नहीं था खाने में।जब 
दस्तर-ख़्वान बिछा तो ऐसा लगा मानो वह छप्पन भोग से सज गया हो।इतनी varities के पकवान खाकर आत्मा तृप्त हो गई।आपके मुँह में भी इतने पकवानों का नाम सुनकर पानी तो आ ही गया होगा। 😀😀
परस्पर बतियाते और मस्ती करते हुए 10 जनवरी को प्रातःकाल हम लोग बनारस पहुँचे।
बनारस में कैंट रेलवे स्टेशन के पास होटल प्लाज़ा इन पहले से ही बुक कराया हुआ था।ग्रुप में वयस्कों के साथ बच्चे और किशोर सभी मौजूद थे। जिससे यह ग्रुप एक perfect tourist ग्रुप सा लग रहा था। जैसा कि सर्वविदित है बच्चे technolgy में बड़ों से आगे होते हैं सो बच्चों ने बड़ों के साथ मिलकर फटाफट मोबाइल पर कैब बुक करने का काम शुरू कर दिया।थोड़ी देर में निगोशिएशन के बाद कुछ ऑटो हायर किए और Hotel plaza inn पहुँच गए।

होटल ऑनलाइन बुक किया था सो आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि साइट पर जितना अच्छा दिखाया गया है होटल उससे कहीं कमतर हो।परंतु होटल देखने के बाद यह धारणा निर्मूल साबित हुई क्योंकि होटल का अनुभव लगभग ठीक ही रहा।
फ्रेश होकर कुछ देर आराम करने के बाद हम चार लोग तो वहां से लगभग 500 मीटर दूर सरदार पटेल धर्मशाला में ग़ज़ल कुंभ कार्यक्रम में सहभागिता हेतु चले गए।परिजन होटल में लंच लेकर फिर से मस्ती के मूड में आए और एक दूसरे से आत्मीयता बढ़ाते हुए बातों में मशग़ूल  हो गए। ऐसे अवसर एक दूसरे की रुचियाँ जानने,परिचय बढ़ाने तथा भविष्य की योजनाएँ बनाने में बहुत मददगार साबित होते हैं सो सबने अवसर का भरपूर लाभ उठाया।बाद में कुछ परिजन आराम करने लगे तथा कुछ काल भैरव के दर्शन करने चले गए।
बनारस में ही हमारे समधी साहब भी रहते हैं।उनसे कई दिन पहले चर्चा हो चुकी थी कि हम 5 परिवार एक साहित्यिक कार्यक्रम तथा पर्यटन भ्रमण हेतु तीन दिन के लिए बनारस आ रहे हैं।उन्होंने घर आने का आग्रह किया लेकिन हमारे ग्रुप का तीन दिन का बहुत व्यस्त कार्यक्रम था सो उनसे अपनी विवशता बता दी थी।हमारी व्यस्तता को देखते हुए वे स्वयं ही अपने मित्र के साथ हम लोगों से मिलने होटल पहुँच गए।सभी से उनका गर्मजोशी से परिचय कराया और काफ़ी देर तक चाय-नाश्ते पर उनसे और उनके मित्र से गपशप भी हुई।
        (होटल में नाश्ते/खाने पर ग्रुप के कुछ सदस्य) 
सभी ने समधी साहब एवं उनके मित्र के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाकर उन मधुर पलों को हमेशा के लिए सुरक्षित किया।
 (चित्र में बाएं से दाएं मेरी धर्म पत्नी,मैं तथा हमारे समधी जी एवं उनके मित्र)
(चित्र में ग्रुप के साथ हमारे समधी जी एवं उनके मित्र)

 उसी दिन शाम को ग़ज़ल कुंभ स्थल पर देश भर से आए कई ग़ज़लकारों से आत्मीय मुलाक़ात हुई।उनके क्षेत्रों में चल रही साहित्यिक गतिविधियों पर सार्थक चर्चा भी हुई। 
जिन साहित्यकारों से संवाद हुआ उनमें आयोजक दीक्षित दनकौरी जी के अलावा मीना भट्ट सिद्धार्थ,हीरा लाल हीरा,अभिषेक अग्निहोत्री,मनोज फगवाड़ी तथा खुर्रम नूर,संतोष कुमार प्रीत आदि प्रमुख हैं। 
ऊपर के चित्र में दिखाई दे रहे साहित्यकार संतोष कुमार प्रीत जी से पहली बार मिलना हुआ।आपकी विनम्रता और सदाशयता ने बहुत प्रभावित किया।कविता और शायरी को लेकर उनसे काफ़ी बातें हुईं।हमारा अगले दिन परिवार के साथ बनारस घूमने का पहले से कार्यक्रम तय था अत: प्रीत जी का मंच से काव्य पाठ न सुन पाने का हमें अफ़सोस रहा।
शाम के सत्र में हम चारों साथियों(ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़ )ने ग़ज़ल पाठ किया जिसके लिए सदन का भरपूर समर्थन मिला।
      पाँव दबाकर पहले लाला जी को रोज़ सुलाता है,
       अपने  सोने को  फिर गंगू टूटी खाट बिछाता है।
                        -- ओंकार सिंह विवेक 
       इक ज़रा सी बात पर हँसने लगे,
       ग़म मेरे  हालात  पर हँसने लगे।
                    सुरेन्द्र अश्क रामपुरी 
       इक अजब सी  बेक़रारी हो रही है,
       मैं ग़ज़ल कह दूँ ख़ुमारी हो रही है।
               -- राजवीर सिंह राज़ 
        
मंज़िल  बहुत   क़रीब  है    रस्ता  सपाट  है,
लेकिन अब इस सफ़र से मेरा मन उचाट है।
                   --- प्रदीप राजपूत माहिर 

क्रमशः(बनारस यात्रा का भाग-2 तथा 3 शीघ्र ही अगली ब्लॉग पोस्ट में) 
प्रस्तुति : ओंकार सिंह विवेक 


























January 15, 2026

हाय रे सर्दी !


आजकल ठंड ने सबको जमाकर रख दिया है।क्या 
पशु-पक्षी, क्या नर-नारी सभी ठंड से बेहाल हो रहे हैं। यों तो प्राकृतिक संतुलन के लिए सभी ऋतुओं का अपना-अपना महत्व है,परंतु किसी भी मौसम या ऋतु की अप्रत्याशित आक्रामकता जब सबको प्रभावित करती है तो असुविधा तो होती ही है। सभी मौसमों के तेवर और चक्र बदलने के पीछे बहुत से कारण हैं जिन पर फिर कभी चर्चा करेंगे। फ़िलहाल निष्ठुर सर्दी के नाम मेरा एक कुंडलिया छंद आपकी प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा के साथ यहाँ प्रस्तुत है :

आज एक कुंडलिया छंद ज़ालिम सर्दी के नाम
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सर्दी   से   यह  ज़िंदगी , जंग  रही  है  हार।
हे भगवन!अब धूप का,खोलो  थोड़ा द्वार।।
खोलो    थोड़ा   द्वार, ठिठुरते  हैं  नर-नारी।
जाने  कैसी   ठंड , जमी   हैं  नदियाँ  सारी।
बैठे   हैं  सब  लोग ,पहन  कर  ऊनी   वर्दी।
फिर भी रही न छोड़,बदन को निष्ठुर सर्दी।।
                           ---ओंकार सिंह विवेक
             (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

January 8, 2026

महफ़िले सजती रहें शेर-ओ-सुख़न की


दो सम्मानित अख़बारों 'अरवल टाइम्स' जहानाबाद, बिहार तथा 'सदीनामा', कोलकता में प्रकाशित मेरी दो ग़ज़लों का आनंद लीजिए 🌹🌹🙏🙏
सहयोग हेतु आदरणीय रमेश कँवल साहब तथा आदरणीय ओमप्रकाश नूर साहब का आभार प्रकट करता हूँ।
        ग़ज़ल 1
        *******

महफ़िलें   सजती   रहें    शेर-ओ-सुख़न    की,

मश्क़ हो ही जाएगी ख़ुद  फ़िक्र-ओ-फ़न  की।


कैसे   मुमकिन  है   बिना   कुछ   सोचे-समझे,

बात   हम   करते  रहें   बस  उनके  मन   की।


है   मुसलसल  ख़ास   लोगों   के   असर    में, 

क्या  सुनेगा   बात   हाकिम  आम   जन  की।


आओ  कर लें    पहले   भूमंडल   की   चिंता,

नाप   ली   जाएगी   दूरी   फिर    गगन   की।

                

सुनके   आँखों   में    न   आते    कैसे   आँसू, 

थी  कथा  वो  राम  जी   के  वन   गमन  की।


कामयाबी      की       बुलंदी       चूमने     में,

भूमिका   होती   है   सब   मेहनत-लगन  की।


होती  है  माँ-बाप  की   बस इतनी   ख़्वाहिश,

बात   समझें   काश! बच्चे   उनके  मन   की।


           ग़ज़ल 2

           ********

फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन


ज्यूँ ही रथ पर चढ़के सूरज आ  गया,

देखकर   कुहरा   उसे    थर्रा    गया।      


आदमी मिलते थे जब दिल खोलकर,

दोस्तो  वो  दौर  तो  कब   का  गया।


बस गए  हम शहर  में  आकर  मगर,

गाँव  से  रिश्ता   नहीं   तोड़ा   गया।   


कोठियों  में   बँट  गई   सब  रौशनी,

झुग्गियों का फिर से हक़  मारा गया।


देखते  हैं  क्या  नतीजा  आए   अब,

पर्चा  तो  इस  बार भी अच्छा  गया।


देखा कितनों  को ही बग़लें  झाँकते,

आईना महफ़िल में जब रक्खा गया।


हो गए महफ़िल में सब उसके मुरीद,

अपने शे'रों  से  ग़ज़ब  वो ढा  गया।

       --- ओंकार सिंह विवेक 

   (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

प्रोत्साहन प्रतिसाद हेतु मैं प्रतिष्ठित साहित्यिक पटक राष्ट्रीय तूलिका मंच का आभार प्रकट करता हूँ।
इसी तरह प्रोत्साहन प्रतिसाद हेतु मैं साहित्यिक मंच रचनाकार का भी हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।


January 4, 2026

पर्चा तो इस बार भी अच्छा गया

दोस्तो नमस्कार 🌹🌹

नए साल के शुरू में आप सब की ख़िदमत में एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ। ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

              ग़ज़ल 
              *****

ज्यूँ ही रथ पर चढ़के सूरज आ  गया,
देखकर   कुहरा   उसे    थर्रा    गया।      

आदमी मिलते थे जब दिल खोलकर,
दोस्तो  वो  दौर  तो  कब   का  गया।

बस गए  हम शहर  में  आकर  मगर,
गाँव  से  रिश्ता   नहीं   तोड़ा   गया।   

कोठियों  में   बँट  गई   सब  रौशनी,
झुग्गियों का फिर से हक़  मारा गया।

देखते  हैं  क्या  नतीजा  आए   अब,
पर्चा  तो  इस  बार भी अच्छा  गया।

देखा कितनों  को ही बग़लें  झाँकते,
आईना महफ़िल में जब रक्खा गया।

हो गए महफ़िल में सब उसके मुरीद,
अपने शे'रों  से  ग़ज़ब  वो ढा  गया।
               -- ओंकार सिंह विवेक 
       (सर्वाधिकार सुरक्षित)
 


January 2, 2026

नए साल की मुबारकबाद के साथ

सभी साथियों और शुभचिंतकों को नूतन वर्ष की अशेष मंगलकामनाएं 🥀🥀🌹🌹
ईश्वर से कामना है कि सभी को स्वस्थ्य और मस्त रखें। विश्व में प्यार,शांति और उजाले का राज रहे।

        नया साल 
        *******

बस  इतनी  है  प्रार्थना, तुझसे   नूतन  साल।
ख़ुशियों से हर व्यक्ति को,कर दे मालामाल।।

अँधियारा  नव   वर्ष  में,करे  न  और  बवाल।
मार  मार  कर  रौशनी,कर  दे  उसे  निढाल।।
                           -- ओंकार सिंह विवेक 

#navvarsh #happynewyear2026
 #onkarsinghvivek

December 29, 2025

उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई की 11 वीं काव्य गोष्ठी/निशस्त


      सूरज दादा की कुहरे से रोज़ लड़ाई है

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 साल 2025 को विदाई देते हुए और आने वाले साल में शुभ की कामना के साथ उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई की एक काव्य गोष्ठी/निशस्त सभा के सक्रिय सदस्य सोहन लाल भारती के कृष्णाविहार आवास पर संपन्न हुई।गोष्ठी में कविजनों ने समसामयिक विषयों पर रचनाएँ सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध किया।गोष्ठी की अध्यक्षता शिवकुमार चन्दन ने की तथा ओंकार सिंह विवेक एवं सोहन लाल भारती क्रमशः मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।मेज़बान सोहन लाल भारती जी के परिजनों ने पुष्प गुच्छ भेंट करके कवियों का स्वागत किया।

डॉo प्रीति अग्रवाल द्वारा सरस्वती वंदना प्रस्तुत करने के उपरांत मंच पर आए कवि पतराम सिंह ने सामयिक प्रस्तुति देते हुए कहा 

       साल आख़िर में दिल कुछ उदास सा हुआ,

       हर बीता लम्हा आज बहुत पास सा हुआ।

ओंकार सिंह विवेक ने कड़क सर्दी की अपनी ग़ज़ल  में कुछ इस तरह तस्वीर खींची 

         जब से हाड़ कंपाती निष्ठुर  सर्दी आई है,

         सूरज दादा  की  कुहरे से रोज़ लड़ाई है।

         जाड़े  कैसे  कटते होंगे  आप  ज़रा सोचें,

         कंबल ही है पास न उसके कोई रज़ाई है।


शिव कुमार चन्दन ने ठंड से दूभर हो रहे जीवन  पर अपना यह दोहा पढ़कर सबका ध्यान आकृष्ट किया 

         पाला कुहरा साथ ले, जाड़ा करे कमाल।

         तीव्र हवा की मार से,जीना हुआ मुहाल।।

राजवीर सिंह राज़ ने पतित पावनी गंगा की महत्ता का

 बख़ान करते हुए कहा 

       निर्मल शीतल पावन कल कल बहता नीर तुम्हारा,

       हे  माँ  गंगे  पाप  सभी  के   हरता  नीर  तुम्हारा।

अपने अच्छे तरन्नुम के लिए जाने जाने वाले शायर अशफ़ाक़ रामपुरी ने इस शेर पर सबकी वाही वाही लूटी

        याद  बेवफ़ा  को  तुम  बेशुमार  मत  करना,

        दिल को आज इतना भी बेक़रार मत करना।

डॉo प्रीति अग्रवाल ने देश के वीरों के सम्मान में  पढ़ा 

       मातृभूमि  की रक्षा  में ही  अपने  प्राण गंवाते हैं,

       नमन करूं मैं उन वीरों को जो शहीद हो जाते हैं।

अपनी रचना में सशक्त भाव भरते हुए सुधाकर सिंह परिहार ने कहा 

       मंज़िल तक न सही कुछ दूर तलक तो जा पाते,

      हम ये दीवार हटा पाते,जो कहा सुनी थी आपस की

       उसका कुछ रंज मिटा पाते।

मेज़बान सोहन लाल भारती ने अपने हृदय के भाव व्यक्त करते हुए कहा 

         फ़ुर्सत से तू आ जाना हम तेरी राह में खड़े,

         भटक न जाए ये मनवा नैन बिछा बैठे बैठे।

नए साल के संदर्भ में कहे गए अपने इन शेरों पर प्रदीप राजपूत माहिर को भी श्रोताओं की भरपूर दाद मिली

          फ़क़त  कलैंडर  में साल  बदले,

          थी मेरी कोशिश कि हाल बदले।

           तभी  तो  बदलेगा  वक़्त  मेरा,

           अगर  सितारों  की चाल बदले।

पूनम दीक्षित ने गुरु गोविंद सिंह जी के नौनिहालों की वीरता पर अपनी ये पंक्तियां पढ़ीं 

      मेरे देश के नौनिहालों सुनो,

      सुनकर अपने हृदय में गुनो।

      यह बात है दो बाल वीरों की,

      शेर दिल थे जो ऐसे धीरों की।

देर रात तक चली इस कवि गोष्ठी में अन्य लोगों में मनोहर लाल, अनूप कुमार सिंह, शारदा देवी, पूनम सिंह, अरुण कुमार सिंह,स्पर्श तथा अंशु आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। गोष्ठी का सफल संचालन सभा के सचिव राजवीर सिंह राज़ द्वारा किया गया।समापन पर सभा की स्थानीय इकाई के अध्यक्ष ओंकार सिंह विवेक ने सभी का आभार प्रकट किया।


गोष्ठी की कवरेज के लिए सम्मानित समाचार पत्रों 'हिंदुस्तान' तथा 'अमर उजाला' का हृदय से आभार।
प्रस्तुति : ओंकार सिंह विवेक 
साहित्यकार/समीक्षक/कंटेंट राइटर 

December 25, 2025

अटल जयंती विशेष


आज अटल जयंती पर कहे गए कुछ दोहे आप साथियों के समक्ष प्रस्तुत हैं :

अटल जी की स्मृति में कहे गए कुछ दोहे

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🌷

 नैतिक  मूल्यों  का  किया,सदा मान-सम्मान।

 दिया अटल जी ने नहीं ,ओछा कभी बयान।।

🌷

  विश्व मंच  पर  शान  से, अपना  सीना  तान।

  अटल बिहारी ने  किया, हिंदी  का यशगान।।

🌷

 राजनीति  के  मंच  पर , छोड़ अनोखी  छाप।

 सब के दिल में बस गए,अटल बिहारी आप।।

🌷

चलकर पथ पर सत्य के,किया जगत में नाम।

अटल बिहारी आपको,शत-शत बार प्रणाम।।

🌷.  ------©️  ओंकार सिंह विवेक


पूर्व प्रधान मंत्री तथा भारत रत्न अटल जयंती पर विशेष 🌹🌹👈👈पर विशेष



December 15, 2025

सर्दी वाले दोहे 🪨🪨

दोस्तो नमस्कार 🌹🌹🙏🙏

आधा दिसंबर गुज़र चुका है। ठंड धीरे-धीरे अपने तेवर दिखाने लगी है। कुहरे और सूरज दादा में जंग जारी है। कुछ लोग बर्फबारी का आनंद लेने के लिए पहाड़ी स्थानों की ओर रुख़ कर रहे हैं। पूरे NCR को प्रदूषण ने अपनी चपेट में ले रखा है। कुल मिलाकर शीत ऋतु का प्रभाव अलग-अलग ढंग से सबको प्रभावित कर रहा है।ठंड में अपना और अपनों का ध्यान रखते हुए आइए सर्दी वाले कुछ दोहों का आनंद लिया जाए 👇👇
दोहे सर्दी वाले 
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माह  दिसंबर  आ   गया,ठंड  हुई    विकराल।
ऊपर   से   करने  लगा,सूरज  भी   हड़ताल।।

हाड़   कँपाती   ठंड   से,करके   दो-दो   हाथ।
स्वार्थ  बिना   देती  रही,नित्य  रजाई   साथ।।

चौराहे    के   मोड़   पर,जलता  हुआ  अलाव।
नित्य विफल  करता रहा,सर्दी  का  हर  दाव।।

खाँसी और  ज़ुकाम  का,करके   काम  तमाम।
अदरक  वाली  चाय   ने, ख़ूब  कमाया  नाम।।

कल  कुहरे  का देखकर,दिन-भर घातक  रूप।
कुछ पल ही छत पर टिकी,सहमी-सहमी धूप।।
                          @ओंकार सिंह विवेक


December 10, 2025

भारत विकास परिषद मुख्य शाखा रामपुर का रजत जयंती वर्ष समारोह


भारत विकास परिषद एक ग़ैर-राजनीतिक,सामाजिक-सांस्कृतिक स्वयंसेवी संस्था है जिसकी स्थापना 1963 में हुई थी। परिषद का उद्देश्य "स्वस्थ, समर्थ, संस्कृत भारत" का निर्माण करना है।यह स्वामी विवेकानंद के आदर्शों से प्रेरित होकर सेवा और संस्कार के माध्यम से भारत के सर्वांगीण विकास के लिए काम करती है।संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, विकलांगजनों का पुनर्वास तथा राष्ट्रीय एकता जैसे विभिन्न सामाजिक कार्यों में निरंतर अपना सार्थक योगदान देती आ रही है।
भारत विकास परिषद की मुख्य शाखा रामपुर (उत्तर प्रदेश) की स्थापना को पच्चीस वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।इस उपलक्ष्य में शाखा का रजत जयंती वर्ष समारोह इसके युवा एवं उत्साही अध्यक्ष विकास पांडे के नेतृत्व में उत्सव पैलेस रामपुर में धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम बहुत संतुलित तथा व्यवस्थित ढंग से भारतीय संस्कारों की झलक प्रदर्शित करते हुए प्रारंभ हुआ।सभा हॉल में पधारने वाले सम्माननीय जनों का तिलक तथा बैज लगाकर स्वागत किया गया।
इस अवसर पर कार्यक्रमों की श्रृंखला में स्कूली बच्चों द्वारा देश भक्ति से ओतप्रोत कई प्रभावशाली सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए।बच्चों की जीवंत प्रस्तुतियाँ देखकर आमंत्रित अतिथियों एवं सभागार में उपस्थित सम्मानित जनों ने बार-बार करतल ध्वनि से छात्रों का उत्साहवर्धन किया।
समारोह में बाहर से आए मेहमानों सहित समाज के प्रतिष्ठित नागरिक, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, चिकित्सक,शिक्षाविद् तथा परिषद परिवार के सदस्य सपरिवार मौजूद रहे।
शाखा की स्थापना के पच्चीस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शाखा द्वारा 'रजत किरण' के नाम से एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई है।मंच पर उपस्थित अतिथियों द्वारा स्मारिका का भव्य विमोचन हुआ।
परिषद के उद्देश्यों एवं उसके द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों को समाहित करते हुए मैंने भी एक गीत की रचना की थी।मुझे ख़ुशी है कि परिषद पदाधिकारियों द्वारा उसे सम्मानित स्मारिका में प्रकाशित किया गया।मैं इसके लिए संस्था का आभार ज्ञापित करता हूँ।
भारत विकास परिषद की सेवा यात्रा को इस समारोह में एक वीडियो प्रस्तुति द्वारा विस्तार से दर्शाया गया जो बहुत ही सुंदर और प्रभावशाली रही।पदाधिकारियों/दायित्वधारियों ने परिषद की भविष्य की गतिविधियों तथा योजनाओं की भी जानकारी सदन को दी।कार्यक्रम में भारत विकास परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक गजेंद्र सिंह संधू जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि किसी संगठन की शक्ति उसके सक्रिय, समर्पित तथा अनुशासित कार्यकर्ताओं में निहित होती है और परिषद के सदस्य इन मानकों पर सदैव ही खरे उतरते हैं।
कार्यक्रम में रज़ा लाइब्रेरी एवं संग्रहालय के निदेशक डॉक्टर पुष्कर मिश्र जी मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान रहे। मिश्र जी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए सभी से धर्म परायण होने आग्रह किया।उन्होंने सेवा,संस्कार और राष्ट्रीयता की भावना के प्रचार-प्रसार हेतु भारत विकास परिषद रामपुर द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
मुख्य शाखा रामपुर के अध्यक्ष विकास पांडे ने कहा कि रामपुर शाखा गत पच्चीस वर्षों से अपने प्रयासों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में प्रयासरत है और काफ़ी हद तक इसमें सफल भी हो रही है।
कार्यक्रम के अंत में मुख्य संयोजक माधव गुप्ता द्वारा सभी का आभार प्रकट किया गया।कार्यक्रम का सफल संचालन रविन्द्र गुप्ता, विनोद कुमार तथा शालिनी चावला पांडे द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
             ---- ओंकार सिंह विवेक 
स्थानीय समाचार पत्रों द्वारा इस भव्य कार्यक्रम की भरपूर कवरेज की गई। बानगी प्रस्तुत है👇
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