January 27, 2026

भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास प्रतियोगिता पुरस्कार विजेता सम्मान समारोह, मुरादाबाद


    है प्रीति जहाँ की रीति सदा मैं गीत वहाँ के गाता हूँ,
    भारत का  रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ।
जब मैं भारतीय सभ्यता,संस्कृति तथा इतिहास पर यह ब्लॉग पोस्ट लिख रहा हूँ तो मुझे अपने देश का गौरव गान करती फ़िल्म 'पूरब पश्चिम' की ये पंक्तियाँ अनायास याद आ रही हैं।
भारतीय सभ्यता,संस्कृति और इतिहास को विश्व की प्राचीनतम और सबसे निरंतर जीवित सभ्यताओं में से एक माना जाता है।प्राप्त सूचनाओं के आधार पर इसका इतिहास लगभग 4,500 से 7,500 वर्ष से भी कहीं अधिक पुराना माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक संस्कृति के साथ यह मिस्र व मेसोपोटामिया की समकालीन है,लेकिन उन सभ्यताओं के विपरीत भारतीय संस्कृति अमरता की विशेषता के साथ आज भी निरंतर जीवंत है।भारतीय सभ्यता और संस्कृति समस्त विश्व को अपना परिवार मानने की अवधारणा पर आधारित है।यह अपनी उदारता, विविधता और प्रेम व सहिष्णुता के लिए जानी जाती है, जिसने ज्ञान और अध्यात्म का प्रचार व प्रसार किया है। 
मगर अफ़सोस की बात है कि वर्तमान युग में हमारी नई पीढ़ी अपने अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति उदासीन होती जा रही है। जीवन जीने की कला सिखाने वाले अपने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों की शिक्षा से हमारा जैसे कोई वास्ता ही नहीं रह गया है।पाश्चात्य माहौल ने हमें दिशाहीन कर दिया है।यही कारण है कि नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का निरंतर क्षरण हो रहा है।
ऐसे में कोई व्यक्ति या संस्था यदि भारतीय नागरिकों में अपनी सभ्यता,संस्कृति और इतिहास के प्रति प्रतियोगिता के माध्यम से रुचि पैदा करने का प्रयास करे तो आशा की एक किरण दिखाई देने लगती है।
जी हाँ,मैं बात कर रहा हूँ मुरादाबाद,उत्तर प्रदेश की SSG फाउंडेशन तथा इसके सर्वेसर्वा आदरणीय सुधीर गुप्ता एडवोकेट जी की जो पिछले दो वर्ष से राष्ट्रीय नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सभ्यता,संस्कृति और इतिहास विषय पर वस्तुनिष्ठ प्रश्नों पर आधारित प्रतियोगिता के माध्यम से अपनी सभ्यता,संस्कृति तथा इतिहास के विषय में जागरूकता फैलाने की दिशा में बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। 
(एडवोकेट सुधीर गुप्ता जी का स्वागत करते हुए MIT के निदेशक प्रोफेसर रोहित गर्ग जी)
(मैं एक कवि/साहित्यकार हूँ तथा अक्सर स्थानीय तथा बाहरी साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता करता रहता हूँ। आदरणीय सुधीर गुप्ता एडवोकेट जी के संरक्षण और सहयोग से आयोजित हुए कई साहित्यिक कार्यक्रमों में मुझे मुरादाबाद में भी सहभागिता का अवसर प्राप्त हुआ है अतः मैं उनके समाज सेवा के भाव तथा रुचियों को जानता हूँ। गुप्ता जी लोगों की प्रतिभा/ क्षमता को परखने तथा प्रोत्साहन देने में सदैव आगे रहते हैं।)
वर्ष, 2025 में इस प्रतियोगिता की series - 2 में मुझे भी प्रतिभाग करने का अवसर प्राप्त हुआ।प्रतिभाग करते समय इस प्रतियोगिता के आयोजन और संरचना के बारे में मुझे नज़दीक़ से जानने का अवसर मिला।प्रतियोगिता में तीन भागों में दस-दस दिन के अंतराल पर ऑनलाइन कुल 200 वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे गए।अंतिम भाग में कुछ सब्जेक्टिव प्रश्न भी पूछे गए। प्रश्नोत्तरी को इस प्रकार तैयार किया गया था कि कोई भी सीधे गूगल या AI की मदद से प्रश्नों के उत्तर तलाश न कर सके। इन प्रश्नों के सही उत्तर वही प्रतिभागी दे सकते थे जिन्होंने भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास तथा प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का गंभीरता से अध्ययन किया हो।
भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास विषय पर आधारित इस प्रतियोगिता में भारत के 19 राज्यों सहित USA,UK,UAE,Sri Lanka, Nepal,Bangladesh आदि देशों के प्रतिभागियों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी की जो भारत के लिए गौरव की बात है।

 इस प्रतियोगिता का परिणाम घोषित हुआ तो 159 विजेताओं की सूची में संयोग से मैं भी अपना नाम दर्ज कराने में सफल रहा।इस सन्दर्भ में सावित्री देवी शिव नारायण गुप्ता फाउंडेशन ने एमआईटी सभागार में विजेताओं के सम्मान में 17 जनवरी ,2026 को एक भव्य समारोह आयोजित करके उपस्थित 70 प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. विशेष गुप्ता और अन्य अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप जलाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉक्टर विशेष गुप्ता,पूर्व अध्यक्ष राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अपने उद्वोधन में भारतीय सभ्यता,संस्कृति और इतिहास की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए माता पिता से अपने बच्चों को संस्कारवान बनाने की अपील की। उन्होंने एडवोकेट सुधीर गुप्ता जी के इन सदप्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
इस प्रतियोगिता के आयोजन में महत्वपूर्ण तकनीकी भूमिका निभाने वाले डॉक्टर नीलाक्ष शील,प्रोफेसर कंप्यूटर साइंस ने बताया कि कैसे उन्होंने इस प्रतियोगिता के ऑनलाइन संयोजन को सुगम और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया है।इस के ऑनलाइन संचालन में उन्हें किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है तथा भविष्य वे कैसे इसे और अधिक पारदर्शी ,विस्तृत तथा सुग्राही बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।
इस प्रतियोगिता के सूत्रधार,SSG तथा MIT group के संस्थापक अध्यक्ष,समाजसेवी एडवोकेट सुधीर गुप्ता जी ने सभी का स्वागत करते हुए बताया कि कैसे निरंतर नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों के क्षरण को देखकर उनके मन में इस तरह की प्रतियोगिताओं के आयोजन का विचार आया।उन्होंने कहा कि भारत की नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाने और सनातन के गौरव को संरक्षित और संवर्धित करने के लिए उनसे जो कुछ भी बन पड़ेगा वे करते रहेंगे।
कार्यक्रम में उपस्थित विजेताओं को मंचासीन अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया तो उनके चेहरे खिल उठे।कई विजेताओं द्वारा मंच से प्रतियोगिता के संबंध में अपने विचार साझा करते हुए इसे और अधिक पारदर्शी बनाने तथा विस्तारित करने के सुझाव भी दिए।
(विजेता के रूप में मुझ नाचीज़ को भी प्रोत्साहन प्रतिसाद प्राप्त हुआ)
विजेताओं के साथ अतिथियों द्वारा अंत में ग्रुप फोटो भी कराए गए।ऐसी अविस्मरणीय यादें भविष्य के लिए बहुत प्रेरणादाई सिद्ध होती हैं।
आमंत्रित अतिथियों ने कार्यक्रम में उपस्थित महिला शक्ति का उत्साहवर्धन करते हुए उनके साथ भी फोटो खिंचवाए।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों द्वारा सभी को प्रेम से सुस्वादु जलपान कराया गया।इस दौरान कार्यक्रम में आए हुए गणमान्य व्यक्तियों के साथ बहुत सार्थक विचार विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम का सुंदर संचालन MIT की डॉo सुगंधा अग्रवाल द्वारा किया गया।उपरोक्त के अतिरिक्त कार्यक्रम में वाई पी गुप्ता, वाई एस कोठीवाल,आनंद मोहन गुप्ता, काव्य सौरभ रस्तौगी, महेश अग्रवाल, अनुभव गुप्ता, राहुल गुप्ता, मुकेश छावड़ा, सरदार गुरविंदर सिंह, डॉक्टर ए के गोयल तथा प्रकाश अग्रवाल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद शर्मा जी आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।
मेरा अनुभव 
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मैंने इस प्रतियोगिता में पहली बार हिस्सेदारी की थी और अनुभव लगभग ठीक-ठाक ही रहा।अपने अनुभव के आधार पर आयोजकों के विचारार्थ कुछ सुझाव देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ :
1. प्रश्नावली को अधिक कॉम्प्लेक्स बनाने के लक्ष्य निर्धारण के कारण level -1 में कई प्रश्न repeated दिखाई दिए।उन सवालों के जो options दिए गए थे उनमें से कोई भी उत्तर सही नहीं था। मैंने WhatsApp group पर इस और ध्यान दिलाया था।उसे स्वीकार करके संशोधन भी किया गया। अत: प्रतियोगिता को भविष्य में और fullproof बनाने की आवश्यकता है।
2. कई बार बताई गई तारीख़ पर लिंक ही नहीं खुल रहा था।इससे प्रतियोगिता की smoothness प्रभावित हुई।
3. उत्तर प्रेषित करने की तारीखों को कई बार बढ़ाया गया। इससे प्रतिभागियों के मन में प्रतियोगिता की पारदर्शिता के प्रति संशय उत्पन्न हुआ।
आशा है भविष्य में प्रतियोगिता का आयोजन करते समय आयोजकों द्वारा इन बिंदुओं का भी संज्ञान लिया जाएगा।
     सादर 🙏🙏
--ओंकार सिंह विवेक 
साहित्यकार एवं समीक्षक






January 24, 2026

वसंत पंचमी/सरस्वती प्राकट्य दिवस पर काव्य गोष्ठी संपन्न


ऋतुराज वसंत के स्वागत में राजीव कुमार शर्मा के निवास पर हुई काव्य गोष्ठी 

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सूरज की बढ़ती चमक तथा प्रकृति के खिले रूप के संग दस्तक दे रहे ऋतुराज वसंत के आगमन तथा ज्ञान,कला और संगीत की देवी माँ शारदे के प्राकट्य दिवस के अवसर पर एकता विहार कॉलोनी में राजीव कुमार शर्मा जी के आवास पर  एक शानदार काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

बताते चलें कि राजीव कुमार शर्मा जी साहित्य प्रेमी होने के साथ एक अच्छे रचनाकार भी हैं तथा प्रतिवर्ष वसंत पंचमी के दिन अपने आवास पर कवि गोष्ठी का आयोजन कराते हैं।कवियों को सम्मान सहित जलपान आदि कराकर परिजनों के साथ कविताओं का रसास्वादन करते हैं।

 (मेज़बान राजीव कुमार शर्मा जी अपने पुत्र उत्कर्ष सारस्वत के साथ)

कवियों ने वसंत के स्वागत,माँ शारदे की स्तुति तथा अन्य समसामयिक विषयों पर अपनी शानदार रचनाएँ सुनाकर आमंत्रित श्रोताओं को आनंदित किया। गोष्ठी की अध्यक्षता अशोक सक्सैना जी ने की।गोविंद शर्मा तथा राजीव कुमार शर्मा जी क्रमशः मुख्य अतिथि तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्यमान रहे।

मां शारदे के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत  विनोद कुमार शर्मा जी की सरस्वती वंदना से गोष्ठी का शुभारंभ हुआ।गोष्ठी का संचालन कर रहे प्रदीप राजपूत माहिर ने काव्य पाठ हेतु पतराम सिंह जी को आमंत्रित किया तो उन्होंने शारदेय का आह्वान करते हुए कहा :


   वीणा की झंकार  बिखेरो मां  अक्षर अक्षर  दीप जले,

   मेरी लेखनी को गति दो माँ नव विचार के फूल खिलें।

गोष्ठी के मेज़बान राजीव कुमार शर्मा ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में प्रभावशाली अभिव्यक्ति देते हुए कहा 


      माँ से करुणा स्नेह दया,

     ममता शुचि और सद्ज्ञान लिए 

    दुधमुंहा धरा पर आया था

     कोमल निश्चल मन साथ लिए।

ओंकार सिंह विवेक ने ऋतुराज वसंत के स्वागत में अपना मुक्तक पढ़ते हुए कहा :

फूलों ने  उपवन को महकाया तो है,

राग  सुरीला कोयल ने  गाया तो है।

होता  है ज़ाहिर  सूरज  के  तेवर से,

ऋतुओं का राजा वसंत आया तो है।

सोहन लाल भारती ने अपनी भाव पूर्ण प्रस्तुति में नेक सलाह देते हुए कहा कहा :


 ख़ुद को सुधारो जग ख़ुद सुधर जाएगा 

ईर्ष्या द्वेष व लोभ त्यागो, आपका स्वास्थ्य भी सुधरेगा 

सब ख़ुद ही ठीक हो जाएगा।

प्रदीप राजपूत माहिर जी  ने अपने इस  मार्मिक शेर से  सबकी वाही वाही लूटी :


      क्या निराले खेल हैं तक़दीर के,

      श्वान भी हक़दार हैं अब खीर के।

विनोद कुमार शर्मा ने अपने मधुर कंठ से शारदे माँ का आशीष मांगते हुए भावपूर्ण प्रस्तुति दी :


 अंतर्मन तमस भरा है माँ,निज कृपा रश्मि की वृष्टि करो।

पावन कर दो निज आशिष से,दे दो जग को अविरल वाणी।

सुमित सिंह मीत ने अपना यह शानदार शेर पढ़ा :


 घर का आंगन है छोटा मगर रहने वालों का दिल है बड़ा,

  खुशबुएं प्यार  की हैं  यहां नफरतों  का  बसेरा नहीं।

गौरव नायक ने अपनी दमदार प्रस्तुति देते हुए कहा 


     समुंदर ग़म का भी कितना बड़ा है,

       जिसे देखो वही डूबा हुआ है।

उत्कर्ष सारस्वत ने अपनी भाव अभिव्यक्ति देते हुए कहा :

      जब आता चुनाव रोज़ दीवाली होती,

      वोटर के घर रोज़ नई एक टोली होती।

सचिन सिंह सार्थक ने अपनी सार्थक प्रस्तुति देते हुए कहा 


    तेजस्वी नायक ओजस्वी प्रखर हमारे नेता जी,

    बरसों बीते मगर दिलों में अमर हमारे नेता जी।




उपरोक्त के अतिरिक्त गोष्ठी में सीताराम शर्मा,सुनील कुमार वैश्य, दीपक गुप्ता एडवोकेट तथा करुणा शर्मा----  आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। अंत में सुस्वादु जलपान के बाद आयोजक राजीव कुमार शर्मा जी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम समापन की घोषणा की।

गोष्ठी की शानदार कवरेज के लिए हम सम्मानित समाचार पत्रों हिन्दुस्तान, अमर उजाला तथा अमृत विचार के प्रतिनिधियों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं 🙏🙏


January 23, 2026

वसंत पंचमी तथा शारदे प्राकट्य दिवस विशेष



आज वसंत पंचमी तथा शारदे माँ के प्राकट्य दिवस के पावन अवसर पर आप सभी साथियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।ज्ञान,कला तथा संगीत की देवी सभी पर अपनी कृपा बनाकर रखें इसी कामना के साथ मेरी कुछ सामयिक/प्रासंगिक रचनाएँ आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं।अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं से ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

सरस्वती वंदना--दोहे🌷

🌷

 हो   मेरा   चिंतन   प्रखर , बढ़े  निरंतर  ज्ञान।

 हे   माँ   वीणावादिनी   ,  दो   ऐसा  वरदान।।

🌷

 मातु   शारदे  आपका ,  रहे   कंठ   में   वास।

 वाणी  में   मेरी   सदा , घुलती  रहे  मिठास।।

🌷

 यदि  मिल जाए आपकी,दया-दृष्टि  का  दान।

 माता   मेरी   लेखनी , पाए  जग   में   मान।।

🌷

किया  आपने  शारदे ,  जब  आशीष  प्रदान।

रामचरित  रचकर  हुए , तुलसीदास  महान।।

🌷

हाथ जोड़कर  बस यही, विनती करे 'विवेक'।

नैतिक बल दो माँ मुझे,काम करूँ नित नेक।।

🌷

वसंत के आगमन पर कुछ चौपाई छंद

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मुस्काई   फूलों   की     डाली।

झूमी   गेहूँ   की    हर  बाली।।

धरती  का  क्या  रूप सँवारा।

हे   वसंत ! आभार  तुम्हारा।। 

          🌹

सरसों  झूम- झूम  कर गाती।

खेतों  को  नव  राग सुनाती।।

भौंरे     फूलों    पर    मँडराते।

उनको  मादक  गान सुनाते।।

            🌹

मधुऋतु  हर्षित  होकर  बोली।

आने   वाली   है  अब  होली।।

ढोल , मँजीरे  ,  झांझ  बजेंगे।

नाच-गान   के  सदन  सजेंगे।

            🌹

चिंतन     होता     रहे     घनेरा।

बढ़ता  रहे  ज्ञान   नित   मेरा।।

हंसवाहिनी    दया    दिखाओ।

आकर जिह्वा पर बस जाओ।।

             🌹

         --ओंकार सिंह विवेक

       (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

                    

        

January 21, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग-2)


(बनारस यात्रा भाग - 1 में अभी तक आपने पढ़ा ग्रुप के बनारस पहुंचने, ग़ज़ल कुंभ में ग़ज़ल पाठ करने तथा कुछ सदस्यों द्वारा काल भैरव के दर्शन करने का रोचक वृतांत।अब आगे पढ़िए 👇👇)

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर  कहाँ,
ज़िंदगी  गर  कुछ  रही  तो  ये जवानी फिर कहाँ।
           -- ख़्वाजा मीर दर्द
पता नहीं कब और किस मोड़ पर ज़िंदगी साथ छोड़ दे, जीवन की इसी अनिश्चितता को बयान करता यह शेर समय निकालकर घूमने-फिरने को प्रोत्साहित करता है। तो आइए हमारे भ्रमण दल द्वारा बनारस के सैर सपाटे में दूसरे दिन जिन स्थलों का भ्रमण किया गया उनसे रूबरू कराएँ :
दूसरा दिन (Day-2)
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बनारस (वाराणसी) में काल भैरव को "काशी का कोतवाल" (शहर का रक्षक/पुलिस प्रमुख) माना जाता है और यह मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी काशी में नहीं रह सकता या यात्रा संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन करना भी आवश्यक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि काल भैरव जी को शहर के नागरिकों को दंड देने और समस्याओं से बचाने का अधिकार प्राप्त है और उनकी पूजा से भय,रोग तथा शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है।सो अगले दिन ग्रुप के शेष साथियों(कुछ साथी एक दिन पहले ही दर्शन कर चुके थे) ने भी काल भैरव के दर्शन करने का निश्चय किया।

बनारस की गलियों के बारे में हम लोगों ने बहुत सुन रखा था।काल भैरव के दर्शन को जाते समय उन तंग गलियों से भी वास्ता पड़ ही गया जिनकी अब तक केवल चर्चा ही सुनते आए थे। काल भैरव के दर्शन से पहले व्यवस्था में लगे लोगों ने जिन तंग गलियों के हमसे आवश्यक और अनावश्यक चक्कर लगवाए उसे याद करके शरीर में सिहरन सी होने लगती है। हमें अपने रामपुर की पुरानी बस्तियों की जिन बेहद तंग गलियों पर नाज़ होता था बनारस की उन तंग गलियों के सामने उसका गुमान धराशाई होता दिखाई दिया।ऐसी तंग गलियाँ न हमने पहले कभी देखी थीं और न ही शायद भविष्य में देखने को मिलेंगी। सचमुच ये भूल-भुलैया जैसी घुमावदार गलियाँ बनारस को एक विशिष्ट पहचान देती हैं।

बनारस की तंग गलियों से निकलकर आइए अब कुछ खुले इलाक़े में आते हैं। जी हाँ,मैं बात कर रहा हूँ नमो घाट की। सुब्ह-ए-बनारस का लुत्फ़ उठाने के लिए ग्रुप के कुछ साथियों ने नमो घाट का रुख़ किया।

  (कुछ साथी नमो घाट पर सुखद अनुभूतियों के साथ) 
प्राचीनता और आधुनिकता के साथ तालमेल करता यह बनारस का नया घाट है।नमो घाट की अपनी ख़ास बनावट और अंतरराष्ट्रीय सुविधाएँ तथा नमस्ते का स्कल्पचर पर्यटकों को ख़ूब आकर्षित करता है।यहाँ हेलीकॉप्टर भी उतारा जा सकता है।फ्लोटिंग सीएनजी स्टेशन,ओपन एयर थियेटर, कुंड, फ्लोटिंग जेटी पर बाथिंग कुंड और चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएँ भी यहाँ उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं योग स्थल, वाटर स्पोर्ट्स, चिल्ड्रन प्ले एरिया, कैफेटेरिया के अलावा कई अन्य सुविधाएं भी इसकी शोभा में चार चाँद लगाती हैं।यह वाराणसी का पहला घाट है जो दिव्यांगजनों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाया गया है। हमारे ग्रुप के कुछ साथियों ने यहाँ भरपूर मस्ती की।
हमारे दूसरे दिन के भ्रमण कार्यक्रम में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती का नज़ारा करना अभी शेष था सो सब लोग बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए गेट नंबर 4 पर एकत्र हुए।

काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों तथा भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। हजारों सालों पुराना यह मंदिर वाराणसी में पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।विश्वनाथ का शाब्दिक अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान।इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य,सन्त एकनाथ,गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।विश्वनाथ मंदिर को इतिहास में कई मुस्लिम शासकों द्वारा बार-बार तोड़ा गया। मुगल शासक औरंगज़ेब इस मंदिर को गिराने वाला अंतिम मुस्लिम शासक था जिसने मंदिर के स्थान पर वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया।मंदिर की वर्तमान संरचना 1780 में इंदौर के मराठा शासक अहिल्याबाई होल्कर द्वारा तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह के सहयोग से निकटवर्ती स्थान पर बनाई गई थी।वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मंदिर को भव्य विस्तार देकर बहुत बड़े गलियारे का निर्माण कराया गया है जिससे भक्तजनों को बाबा के दर्शन करने में बहुत सुविधा हो गई है।ऐसी मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन किए बिना बनारस की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।ग्रुप के सभी साथियों ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके आत्मिक शांति का अनुभव किया।


बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद लंच का समय हो चुका था। सबके पेट में चूहे दौड़ने लगे तो किसी ऐसी होटल की तलाश शुरू की गई जहाँ घर जैसा शुद्ध शाकाहारी और सादा खाना मिल सके। ग्रुप के युवा सदस्यों ने हमेशा की तरह बनारस के मशहूर खानों को नेट पर सर्च करना शुरू कर दिया।कुछ देर सर्च करने के बाद तय हुआ कि ठठेरी बाज़ार में 'दी राम भंडार' की कचौरी/पूरी सब्ज़ी और जलेबी का आनंद लिया जाएगा।सो सब लोग ठठेरी बाज़ार की तंग गलियों में निकल पड़े।
 लोगों से सुन रखा था कि यदि बनारस गए और राम भंडार की पूरी/कचौरी, सब्ज़ी, जलेबी और प्रसिद्ध मलैया डिश नहीं खाई तो कुछ नहीं खाया।
 काफ़ी दूर तक ठठेरी बाज़ार की तंग गली/बाज़ार में उस दुकान का पता पुछते हुए चलते रहे। काफ़ी दूर जाकर किसी ने बताया कि जिन चीज़ों की तलाश में आप जा रहे हैं उनके मिलने का समय तो समाप्त हो चुका है और अब दुकान भी बंद हो चुकी होगी।सो निराश मन से वापस लौटना शुरू किया।

लोगों ने बताया कि हमेशा ही कुछ इस तरह की भीड़☝️ रहती है 'दी राम भंडार' पर।
अब तक भूख बेक़ाबू हो चुकी थी।गली से बाहर आकर एक साफ़ सुथरे से होटल पर सादा खाना खाया और बनारस की प्रसिद्ध मलइयो स्वीट डिश का आनंद लिया।

बनारसी मलइयो को बनाने का तरीका बहुत आसान है। इसे बनाने के लिए कच्चे दूध को पहले इतना खौलाया जाता है कि  इसका रंग पीला पड़ने लगे।फिर रात में इसे खुले आसमान में ओस के संपर्क में रखा जाता है वो भी खुला करके।सुबह इसे मथा जाता है और मलाई ऊपर आ जाती है।इसी मलाई को केसर,छोटी इलायची और चीनी डालकर फेंटा जाता है।
-इसके झाग को परोसा जाता है जिसे मलइयो कहते हैं।

अब बारी थी अगले पड़ाव यानी दशाश्वमेध घाट की सायंकालीन विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती देखने की।वैसे तो गंगा की हरिद्वार और ऋषिकेश सहित कई जगह आरती होती हैं लेकिन काशी की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। देश के कोने-कोने और विदेश से भी लोग बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने आते हैं।
       (दशाश्वमेध घाट की ओर जाती भीड़) 
दशाश्वमेध घाट पर आरती के समय मेले जैसा माहौल होता है।गंगा के तट पर शाम होते होते माहौल भक्तिमय होने लगता है। पुजारी एक ख़ास वेशभूषा में शंखनाद,घंटी,डमरू की ध्वनि के साथ मां गंगा के जयकारे लगाते हुए आरती संपन्न कराते हैं।
बताते चलें कि वाराणसी में सबसे पहले गंगा आरती की शुरुआत साल 1991 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर हुई थी।तब से ही लगातार शाम के समय सूर्यास्त के बाद आरती की जाती है। यह आरती लगभग 45 मिनट तक चलती है।गंगा आरती के समय गंगा के पानी में दीपक की लौ अलौकिक दृश्य पैदा करती है।गंगा आरती को लेकर मान्यता है कि इससे मन की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

कुछ लोग घाट पर रहकर गंगा आरती का आनंद लेते हैं जबकि बहुत से लोग बोट्स तथा स्टीमर्स तथा क्रूज़ आदि में बैठकर गंगा आरती के भव्य दृश्य का अवलोकन करते हैं।हमारे ग्रुप के लोगों ने भी बोट/स्टीमर में बैठकर काफ़ी नज़दीक़ से गंगा आरती की शोभा को निहारा।


देर रात तक गंगा आरती का आंखों को चौंधियां देने वाला मोहक नज़ारा देखा।उस मोहक नज़ारे का शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन है। आरती का असली आनंद तो यहाँ आकर ही उठा सकते हैं।अतः आपसे आग्रह रहेगा कि कभी बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने अवश्य आएँ।
दिन भर की भागदौड़ से ग्रुप के सभी लोगों के तन तो थककर चूर हो चुके थे परंतु मन कहाँ थकने वाले थे।अब हमारे पास घूमने के लिए सिर्फ़ एक दिन ही शेष था सो सबने जल्दी होटल पहुंचकर आराम करने का निश्चय किया। अगले दिन बनारस से थोड़ी दूर स्थित विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बौद्ध धर्म स्थल सारनाथ का भ्रमण करके शाम को हमें वापसी की ट्रेन में भी बैठना था।
बनारस-भ्रमण  की यह कड़ी यहीं समाप्त करते हैं।
ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

क्रमशः (बनारस यात्रा संस्मरण भाग - 3 यानी अंतिम कड़ी लेकर शीघ्र ही हाज़िर होंगे तब तक के लिए सादर प्रणाम 🙏🙏)

प्रस्तुति 
ओंकार सिंह विवेक 








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