सरस्वती वंदना--दोहे🌷
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हो मेरा चिंतन प्रखर , बढ़े निरंतर ज्ञान।
हे माँ वीणावादिनी , दो ऐसा वरदान।।
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मातु शारदे आपका , रहे कंठ में वास।
वाणी में मेरी सदा , घुलती रहे मिठास।।
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यदि मिल जाए आपकी,दया-दृष्टि का दान।
माता मेरी लेखनी , पाए जग में मान।।
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किया आपने शारदे , जब आशीष प्रदान।
रामचरित रचकर हुए , तुलसीदास महान।।
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हाथ जोड़कर बस यही, विनती करे 'विवेक'।
नैतिक बल दो माँ मुझे,काम करूँ नित नेक।।
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वसंत के आगमन पर कुछ चौपाई छंद
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मुस्काई फूलों की डाली।
झूमी गेहूँ की हर बाली।।
धरती का क्या रूप सँवारा।
हे वसंत ! आभार तुम्हारा।।
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सरसों झूम- झूम कर गाती।
खेतों को नव राग सुनाती।।
भौंरे फूलों पर मँडराते।
उनको मादक गान सुनाते।।
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मधुऋतु हर्षित होकर बोली।
आने वाली है अब होली।।
ढोल , मँजीरे , झांझ बजेंगे।
नाच-गान के सदन सजेंगे।
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चिंतन होता रहे घनेरा।
बढ़ता रहे ज्ञान नित मेरा।।
हंसवाहिनी दया दिखाओ।
आकर जिह्वा पर बस जाओ।।
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--ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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