January 21, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग-2)


(बनारस यात्रा भाग - 1 में अभी तक आपने पढ़ा ग्रुप के बनारस पहुंचने, ग़ज़ल कुंभ में ग़ज़ल पाठ करने तथा कुछ सदस्यों द्वारा काल भैरव के दर्शन करने का रोचक वृतांत।अब आगे पढ़िए 👇👇)

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर  कहाँ,
ज़िंदगी  गर  कुछ  रही  तो  ये जवानी फिर कहाँ।
           -- ख़्वाजा मीर दर्द
पता नहीं कब और किस मोड़ पर ज़िंदगी साथ छोड़ दे, जीवन की इसी अनिश्चितता को बयान करता यह शेर समय निकालकर घूमने-फिरने को प्रोत्साहित करता है। तो आइए हमारे भ्रमण दल द्वारा बनारस के सैर सपाटे में दूसरे दिन जिन स्थलों का भ्रमण किया गया उनसे रूबरू कराएँ :
दूसरा दिन (Day-2)
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बनारस (वाराणसी) में काल भैरव को "काशी का कोतवाल" (शहर का रक्षक/पुलिस प्रमुख) माना जाता है और यह मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी काशी में नहीं रह सकता या यात्रा संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन करना भी आवश्यक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि काल भैरव जी को शहर के नागरिकों को दंड देने और समस्याओं से बचाने का अधिकार प्राप्त है और उनकी पूजा से भय,रोग तथा शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है।सो अगले दिन ग्रुप के शेष साथियों(कुछ साथी एक दिन पहले ही दर्शन कर चुके थे) ने भी काल भैरव के दर्शन करने का निश्चय किया।

बनारस की गलियों के बारे में हम लोगों ने बहुत सुन रखा था।काल भैरव के दर्शन को जाते समय उन तंग गलियों से भी वास्ता पड़ ही गया जिनकी अब तक केवल चर्चा ही सुनते आए थे। काल भैरव के दर्शन से पहले व्यवस्था में लगे लोगों ने जिन तंग गलियों के हमसे आवश्यक और अनावश्यक चक्कर लगवाए उसे याद करके शरीर में सिहरन सी होने लगती है। हमें अपने रामपुर की पुरानी बस्तियों की जिन बेहद तंग गलियों पर नाज़ होता था बनारस की उन तंग गलियों के सामने उसका गुमान धराशाई होता दिखाई दिया।ऐसी तंग गलियाँ न हमने पहले कभी देखी थीं और न ही शायद भविष्य में देखने को मिलेंगी। सचमुच ये भूल-भुलैया जैसी घुमावदार गलियाँ बनारस को एक विशिष्ट पहचान देती हैं।

बनारस की तंग गलियों से निकलकर आइए अब कुछ खुले इलाक़े में आते हैं। जी हाँ,मैं बात कर रहा हूँ नमो घाट की। सुब्ह-ए-बनारस का लुत्फ़ उठाने के लिए ग्रुप के कुछ साथियों ने नमो घाट का रुख़ किया।

  (कुछ साथी नमो घाट पर सुखद अनुभूतियों के साथ) 
प्राचीनता और आधुनिकता के साथ तालमेल करता यह बनारस का नया घाट है।नमो घाट की अपनी ख़ास बनावट और अंतरराष्ट्रीय सुविधाएँ तथा नमस्ते का स्कल्पचर पर्यटकों को ख़ूब आकर्षित करता है।यहाँ हेलीकॉप्टर भी उतारा जा सकता है।फ्लोटिंग सीएनजी स्टेशन,ओपन एयर थियेटर, कुंड, फ्लोटिंग जेटी पर बाथिंग कुंड और चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएँ भी यहाँ उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं योग स्थल, वाटर स्पोर्ट्स, चिल्ड्रन प्ले एरिया, कैफेटेरिया के अलावा कई अन्य सुविधाएं भी इसकी शोभा में चार चाँद लगाती हैं।यह वाराणसी का पहला घाट है जो दिव्यांगजनों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाया गया है। हमारे ग्रुप के कुछ साथियों ने यहाँ भरपूर मस्ती की।
हमारे दूसरे दिन के भ्रमण कार्यक्रम में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती का नज़ारा करना अभी शेष था सो सब लोग बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए गेट नंबर 4 पर एकत्र हुए।

काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों तथा भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। हजारों सालों पुराना यह मंदिर वाराणसी में पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।विश्वनाथ का शाब्दिक अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान।इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य,सन्त एकनाथ,गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।विश्वनाथ मंदिर को इतिहास में कई मुस्लिम शासकों द्वारा बार-बार तोड़ा गया। मुगल शासक औरंगज़ेब इस मंदिर को गिराने वाला अंतिम मुस्लिम शासक था जिसने मंदिर के स्थान पर वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया।मंदिर की वर्तमान संरचना 1780 में इंदौर के मराठा शासक अहिल्याबाई होल्कर द्वारा तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह के सहयोग से निकटवर्ती स्थान पर बनाई गई थी।वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मंदिर को भव्य विस्तार देकर बहुत बड़े गलियारे का निर्माण कराया गया है जिससे भक्तजनों को बाबा के दर्शन करने में बहुत सुविधा हो गई है।ऐसी मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन किए बिना बनारस की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।ग्रुप के सभी साथियों ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके आत्मिक शांति का अनुभव किया।


बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद लंच का समय हो चुका था। सबके पेट में चूहे दौड़ने लगे तो किसी ऐसी होटल की तलाश शुरू की गई जहाँ घर जैसा शुद्ध शाकाहारी और सादा खाना मिल सके। ग्रुप के युवा सदस्यों ने हमेशा की तरह बनारस के मशहूर खानों को नेट पर सर्च करना शुरू कर दिया।कुछ देर सर्च करने के बाद तय हुआ कि ठठेरी बाज़ार में 'दी राम भंडार' की कचौरी/पूरी सब्ज़ी और जलेबी का आनंद लिया जाएगा।सो सब लोग ठठेरी बाज़ार की तंग गलियों में निकल पड़े।
 लोगों से सुन रखा था कि यदि बनारस गए और राम भंडार की पूरी/कचौरी, सब्ज़ी, जलेबी और प्रसिद्ध मलैया डिश नहीं खाई तो कुछ नहीं खाया।
 काफ़ी दूर तक ठठेरी बाज़ार की तंग गली/बाज़ार में उस दुकान का पता पुछते हुए चलते रहे। काफ़ी दूर जाकर किसी ने बताया कि जिन चीज़ों की तलाश में आप जा रहे हैं उनके मिलने का समय तो समाप्त हो चुका है और अब दुकान भी बंद हो चुकी होगी।सो निराश मन से वापस लौटना शुरू किया।

लोगों ने बताया कि हमेशा ही कुछ इस तरह की भीड़☝️ रहती है 'दी राम भंडार' पर।
अब तक भूख बेक़ाबू हो चुकी थी।गली से बाहर आकर एक साफ़ सुथरे से होटल पर सादा खाना खाया और बनारस की प्रसिद्ध मलइयो स्वीट डिश का आनंद लिया।

बनारसी मलइयो को बनाने का तरीका बहुत आसान है। इसे बनाने के लिए कच्चे दूध को पहले इतना खौलाया जाता है कि  इसका रंग पीला पड़ने लगे।फिर रात में इसे खुले आसमान में ओस के संपर्क में रखा जाता है वो भी खुला करके।सुबह इसे मथा जाता है और मलाई ऊपर आ जाती है।इसी मलाई को केसर,छोटी इलायची और चीनी डालकर फेंटा जाता है।
-इसके झाग को परोसा जाता है जिसे मलइयो कहते हैं।

अब बारी थी अगले पड़ाव यानी दशाश्वमेध घाट की सायंकालीन विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती देखने की।वैसे तो गंगा की हरिद्वार और ऋषिकेश सहित कई जगह आरती होती हैं लेकिन काशी की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। देश के कोने-कोने और विदेश से भी लोग बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने आते हैं।
       (दशाश्वमेध घाट की ओर जाती भीड़) 
दशाश्वमेध घाट पर आरती के समय मेले जैसा माहौल होता है।गंगा के तट पर शाम होते होते माहौल भक्तिमय होने लगता है। पुजारी एक ख़ास वेशभूषा में शंखनाद,घंटी,डमरू की ध्वनि के साथ मां गंगा के जयकारे लगाते हुए आरती संपन्न कराते हैं।
बताते चलें कि वाराणसी में सबसे पहले गंगा आरती की शुरुआत साल 1991 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर हुई थी।तब से ही लगातार शाम के समय सूर्यास्त के बाद आरती की जाती है। यह आरती लगभग 45 मिनट तक चलती है।गंगा आरती के समय गंगा के पानी में दीपक की लौ अलौकिक दृश्य पैदा करती है।गंगा आरती को लेकर मान्यता है कि इससे मन की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

कुछ लोग घाट पर रहकर गंगा आरती का आनंद लेते हैं जबकि बहुत से लोग बोट्स तथा स्टीमर्स तथा क्रूज़ आदि में बैठकर गंगा आरती के भव्य दृश्य का अवलोकन करते हैं।हमारे ग्रुप के लोगों ने भी बोट/स्टीमर में बैठकर काफ़ी नज़दीक़ से गंगा आरती की शोभा को निहारा।


देर रात तक गंगा आरती का आंखों को चौंधियां देने वाला मोहक नज़ारा देखा।उस मोहक नज़ारे का शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन है। आरती का असली आनंद तो यहाँ आकर ही उठा सकते हैं।अतः आपसे आग्रह रहेगा कि कभी बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने अवश्य आएँ।
दिन भर की भागदौड़ से ग्रुप के सभी लोगों के तन तो थककर चूर हो चुके थे परंतु मन कहाँ थकने वाले थे।अब हमारे पास घूमने के लिए सिर्फ़ एक दिन ही शेष था सो सबने जल्दी होटल पहुंचकर आराम करने का निश्चय किया। अगले दिन बनारस से थोड़ी दूर स्थित विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बौद्ध धर्म स्थल सारनाथ का भ्रमण करके शाम को हमें वापसी की ट्रेन में भी बैठना था।
बनारस-भ्रमण  की यह कड़ी यहीं समाप्त करते हैं।
ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

क्रमशः (बनारस यात्रा संस्मरण भाग - 3 यानी अंतिम कड़ी लेकर शीघ्र ही हाज़िर होंगे तब तक के लिए सादर प्रणाम 🙏🙏)

प्रस्तुति 
ओंकार सिंह विवेक 








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