February 23, 2026

लीजिए पेश है नई ग़ज़ल

दोस्तो कुछ रोज़ पहले एक मतला हुआ था।लीजिए ग़ज़ल मुकम्मल हो गई :
       
ढूँढिए  मत   उनमें   कुछ  मे'यार  अब,
इनके-उनके  हो   गए  अख़बार  अब।

खो  गया  रिश्तों  का  वो  संसार  अब,
हो  गए   छोटे   बहुत   परिवार   अब।

कब  तलक उलझेंगे  मज़हब-ज़ात  में,
करिए  थोड़ा  सोच  में   विस्तार  अब।

कौन  फिर  परचम   उठाए  अम्न  का, 
सबके  हाथों  में  तो  हैं  हथियार अब।

पहले   जैसी   गर्म-जोशी    कब   रही,
मिलते  हैं  रस्मन  ही   रिश्तेदार  अब।

कौन  आसानी  से   करता   है   मियाँ, 
अपनी कमियों को यहाँ स्वीकार अब।

साधुओं  जैसा  नहीं   लगता  'विवेक',
साधुओं  का  हमको तो  आचार अब। 
           --- ओंकार सिंह विवेक 
       (सर्वाधिकार सुरक्षित) 


February 20, 2026

प्रसंगवश


नमस्कार मित्रो 🌹🌹🙏🙏

आज यात्रा के दौरान एक जंगल से गुज़रना हुआ। हरियाली और फलों से लदे हुए वृक्षों को देखकर दिल बहुत ख़ुश हुआ।
उसी समय कई ऐसी घटनाएँ भी स्मृति में कौंध गईं जब हमने लोगों को बेरहमी से फलों से लदे हुए वृक्षों को काटते हुए देखा था। ऐसे तमाम दृश्य हृदय को अक्सर झकझोरते रहते हैं। मुझे अपनी काफ़ी समय पहले कही गई ग़ज़ल का मतला और एक शेर याद आ रहा है :

            शीशम  साखू   महुआ   चंदन  पीपल   देते  हैं,

            कैसी-कैसी  ने'मत   हमको   जंगल   देते   हैं।


           आज बना  है मानव  उनकी ही जाँ का दुश्मन,

           जीवन  भर  जो  पेड़  उसे  मीठे  फल  देते हैं।

                                      --- ओंकार सिंह विवेक 

                  (सर्वाधिकार सुरक्षित) 


काव्य संसार 🌹🌹🌱🌿👈

February 15, 2026

उनके हिस्से चुपड़ी रोटी ------

         मित्रो नमस्कार 🙏
लीजिए पेश है मेरी नई ग़ज़ल 


         उनके  हिस्से   चुपड़ी  रोटी  बिसलेरी  का पानी है,

         और हमारी  क़िस्मत,हमको रूखी-सूखी खानी है।


        जनता की आवाज़ दबाने वालो  इतना  ध्यान रहे,

       कल पैदल भी हो सकते हो आज अगर सुल्तानी है।


        प्यार लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,

        ऐसे   ही   थोड़ी  धरती  की  चूनर  धानी-धानी  है।


        फ़स्ल हुई चौपट बारिश से और धेला भी पास नहीं,

        कैसे क़र्ज़  चुके बनिये  का  मुश्किल में रमज़ानी है।


        खिलने को घर के गमलों में चाहे जितने फूल खिलें,

        जंगल  के फूलों-सी  लेकिन  बात न उनमें आनी है।

 

        एक झलक पाना भी अब तो सूरज की दुश्वार हुआ,

        जाने  ज़ालिम कुहरे  ने  ये  कैसी  चादर  तानी  है।


        बात न सोची जाए किसी की राह में  काँटे बोने की,

        ये  सोचें  फूलों  से  कैसे  सबकी  राह  सजानी  है।

                                         --- ओंकार सिंह विवेक 

               (सर्वाधिकार सुरक्षित)

 


February 8, 2026

भावों की अभिव्यक्ति

साथियो सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏

कविता भावनाओं को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है।कवि अपने घर परिवार,समाज और देश विदेश में जो महसूस करता है, उसे आधार बनाकर  मंथन के उपरांत अपने काव्य में अभिव्यक्त कर देता है।वह दोनों ही पहलुओं पर रौशनी डालता है अपनी कविता में,जो समाज में घटित हो रहा होता है उसके बारे में और एक ऐसे आदर्श समाज के बारे में भी जिसकी शिद्दत से आवश्यकता है।उसका काव्य सृजन लोगों को चिंतन के लिए प्रेरित करता है तो कवि स्वयं को धन्य समझता है।
 मेरी एक ग़ज़ल का आनंद लीजिए :
ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' कोलकता के संपादक मंडल का हार्दिक आभार 🙏

मुँह  पर तो  कितना रस घोला जाता है,
पीछे  जाने  क्या-क्या  बोला  जाता  है।

होता था  पहले  मे'यार   कभी   उनका,
अब  रिश्तों को  धन से  तोला जाता है।

मिल  जाती  है   एक  नई  इच्छा  उसमें,
मन  को  जितनी  बार  टटोला जाता है।

मिल जाते  हैं  सुख-दुख  दोनों ही उसमें,
जब  यादों  का  बक्सा  खोला  जाता है।

आप  सियासत-दाँ  ये  ख़ूब  समझते  हैं,
बदला  कैसे   हर  दिन  चोला  जाता  है।

ध्यान  सभी का  देखा ख़ुद  पर तो जाना,
चुप रह कर भी  कितना  बोला  जाता है।

हर  दम  तो  ख़ामोशी  ओढ़  नहीं  सकते,
वक़्त-ए-ज़रूरत मुँह भी खोला  जाता है।
                        -- ओंकार सिंह विवेक


February 6, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग -3/अंतिम कड़ी )

(अब तक आपने पढ़ा : हमारे ग्रुप के बनारस यात्रा संस्मरण में बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन, काल भैरव के दर्शन,नमो घाट भ्रमण तथा दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती आदि के बारे में।अब इस यात्रा संस्मरण की अंतिम कड़ी में पढ़िए सारनाथ यात्रा के बारे में 👇)

बनारस भ्रमण कार्यक्रम के अंतिम दिन हम लोगों को बनारस से लगभग दस किलोमीटर दूर प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थल सारनाथ के लिए निकलना था।दो टैक्सियों की व्यवस्था करके हम लोग सारनाथ पहुँचे।बनारस में जैसी तंग गलियों से गुज़रना हुआ उसके विपरीत सारनाथ में बहुत चौड़ी सड़कें तथा खुलापन सबको बहुत अच्छा लगा।
वहाँ पहुँचकर सबसे पहले हमारे ग्रुप ने जैन मंदिर के दर्शन किए।सारनाथ में सन 1824 में निर्मित दिगंबर जैन मंदिर वह स्थान है जहाँ कहा जाता है कि जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्री श्रेयांशनाथ जी का जन्म हुआ था और इसी कारण यह मंदिर 'श्रेयांशनाथ जैन मंदिर' के नाम से भी प्रसिद्ध है। 
जैन मंदिर के दर्शन करने के उपरांत हम लोग धमेख स्तूप तथा बुद्ध का विशाल मंदिर देखने गए।

यह☝️ विशाल धमेख स्तूप है। यह वह पवित्र स्थान है, जहां ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।धमेख स्तूप: एक विशाल और ठोस गोलाकार स्तूप है, जो उस स्थान को चिह्नित करता है जहाँ बुद्ध बैठे थे। इसे गुप्त काल के दौरान और अधिक विकसित और विस्तारित किया गया था।धमेख स्तूप के पास ही सम्राट अशोक द्वारा स्थापित एक भव्य स्तंभ (अशोक स्तंभ) था (जिसका शीर्ष अब सारनाथ संग्रहालय में है)जो आज भी इस स्थल के महत्व को दर्शाता है।भारत का राष्ट्रीय चिह्न जो हमारे नोटों में भी दर्शाया गया है इसी अशोक स्तंभ से लिया गया है।हम लोग सारनाथ (वाराणसी) में पीपल के वृक्ष के पास स्थित भगवान बुद्ध को समर्पित बौद्ध मंदिर (विशेषकर मूलगंध कुटी विहार) में दर्शन करने के लिए पहुँचे। यह उसी पवित्र स्थान के निकट है जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था।सन 1931 में निर्मित यह मंदिर ध्यान और बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र प्रवर्तन' (प्रथम उपदेश) की याद दिलाता है। 

मंदिर में बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा और जापानी चित्रकार कोसू ओकुसा द्वारा बनाई गई बुद्ध के जीवन को दर्शाने वाले भित्तिचित्र (frescoes) हैं।
 यहाँ लगाया गया पीपल का वृक्ष बोधगया से लाई गई बोधि वृक्ष की एक शाखा का ही रूप है। यहाँ अवसर का लाभ उठाते हुए ग्रुप के साथियों ने बौद्ध भिक्षु के साथ फोटो भी खिंचवाए।
 
 यह स्थान बौद्ध अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक शांति, ध्यान और भगवान बुद्ध तथा बोधिवृक्ष की पूजा का केंद्र है।मूलगंध कुटी विहार: यह वह स्थान है जहाँ बुद्ध के ध्यान लगाने की मान्यता है। इसके पास ही प्राचीन काल के अन्य कई स्तूप और मठों के अवशेष (खंडहर) स्थित हैं।यह स्थान हिरण उद्यान के नाम से जाना जाता है और यहां का वातावरण आज भी अत्यंत शांतिपूर्ण और सुकून भरा है, जो पर्यटकों और बौद्ध भिक्षुओं को ध्यान के लिए आकर्षित करता है।यह स्थान बौद्ध धर्म के केंद्र के रूप में सदियों से प्रसिद्ध रहा है, जहाँ की चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी यात्रा की थी अतः इसका एक ऐतिहासिक महत्व है।वर्तमान में यह पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्गत एक संरक्षित स्थल है, जहां लोग इस ऐतिहासिक घटना को याद करने और आध्यात्मिक शांति पाने के लिए आते हैं। वर्ष भर यहाँ दर्शनार्थियों की ख़ासी भीड़ रहती है।

भगवान बुद्ध के प्रमुख मंदिर के समीप ही प्रसिद्ध डियर पार्क है।इसमें वर्तमान में मुख्य रूप से चितकबरा हिरण तथा दुर्लभ काला हिरण मौजूद हैं। इसके अलावा,पार्क में एमू ,मगरमच्छ ,कछुए और विभिन्न प्रकार के पक्षी, जैसे कि पेंटेड स्टॉर्क (रंगीन सारस) और व्हाइट नेक्ड स्टॉर्क भी देखे जा सकते हैं। 
पक्षी और अन्य जीवों के लिए बाड़े बने हुए हैं।यहाँ पेलिकन व स्टॉर्क प्रजाति के पक्षी भी निवास करते हैं।
पार्क लगभगर 33 एकड़ में फैला हुआ है,जहाँ तालाब और घने पेड़-पौधे हैं,जो इसे एक शांत और सुंदर मिनी चिड़ियाघर बनाते हैं।बच्चों ने यहाँ जमकर मस्ती की।

सारनाथ में दुर्लभ ऐतिहासिक चीज़ें देखने को मिल रही थीं।सभी साथी इस प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथा धार्मिक स्थल की यात्रा करके स्वयं को धन्य समझ रहे थे।सभी ने सारनाथ संग्रहालय का रुख़ किया।यह संग्रहालय भारत का सबसे पुराना पुरातात्विक संग्रहालय है जो 1910 में स्थापित किया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सारनाथ की खुदाई से मिली लगभग 6,832 से अधिक बौद्ध मूर्तियों और कलाकृतियों को इस संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सम्राट अशोक का चतुर्मुख स्तंभ यहीं रखा हुआ है। 
जैसा मैंने पहले भी उल्लेख किया कि यह वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश 'धर्मचक्रप्रवर्तन' दिया था,जो बौद्ध धर्म के चार पवित्र स्थलों में से एक है।
इस संग्रहालय में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक की वस्तुएं हैं।इन्हें देखकर हमें अपने इतिहास और संस्कृति पर बहुत गर्व होता है।
अशोक का सिंह स्तंभ शीर्ष  इस संग्रहालय की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृति है, जो पॉलिश किए गए बलुआ पत्थर से बनी है।
इसके अलावा'धर्मचक्र मुद्रा' में बैठे बुद्ध की प्रसिद्ध प्रतिमा भी विद्यमान है।बोधिसत्व,विभिन्न हिंदू देवताओं की मूर्तियां, और प्राचीन स्तूपों के अवशेष भी संग्रहालय में मौजूद हैं।संग्रहालय की इमारत को एक बौद्ध विहार (Monastery) की तरह डिज़ाइन किया गया है।
इस संग्रहालय को घूमने के लिए सबसे अच्छा समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच है (आमतौर पर यह शुक्रवार को बंद रहता है)। 
यह स्थान भारतीय इतिहास और बौद्ध धर्म की कलात्मक विरासत को देखने के लिए एक अनिवार्य स्थल है अतः मेरा अनुरोध है कि एक बार सपरिवार इस स्थल के दर्शन के लिए अवश्य आएँ।


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन खुदाई वाले स्थल👇 के भ्रमण पर हमारे ग्रुप को जो अनुभूति हुई उसका आनंद शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

 सारनाथ की खुदाई में मौर्य काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से लेकर गुप्त काल (चौथी-छठी शताब्दी ईस्वी) तक की महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए। प्रसिद्ध अशोक स्तंभ (सिंह शीर्ष),धमेख स्तूप, बौद्ध मठ,बुद्ध की प्रतिमाएं और विभिन्न मिट्टी के बर्तन आदि सभी आज भी बिल्कुल सुरक्षित हालत में देखकर बहुत आश्चर्य होता है। इन चीज़ों को देखकर उस काल की भवन निर्माण कला, सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। खुदाई में मिले अवशेष बौद्ध धर्म के प्रथम उपदेश स्थल के गौरवशाली इतिहास को दर्शाते हैं।प्राप्त बौद्ध विहारों के अंश तथा भवनों आदि के हिस्से और फर्श आदि की मज़बूती और सफ़ाई को देखकर ऐसा मालूम होता है मानों ये चीज़ें हाल ही में बनाई गई हों।
(ऊपर के सभी चित्र खुदाई वाले स्थल का भ्रमण करते हुए लिए गए) 
हमें सारनाथ में घूमते-घूमते शाम हो चुकी थी परंतु किसी भी साथी का मन यहाँ से वापस जाने का नहीं हो रहा था।परंतु रात को हमारी वाराणसी से रामपुर की वापसी की ट्रेन थी अतः सबने सारनाथ के सुंदर नज़ारे आँखों में बसाकर वापसी का सफ़र शुरू किया।
सारनाथ जैसे प्रसिद्ध बौद्ध स्थल के भ्रमण के पश्चात मैंने वहाँ का संक्षिप्त विवरण इस ब्लॉग पोस्ट में देने का प्रयास किया है।इस ऐतिहासिक स्थल की महत्ता और असली आनंद को तो आप इसका भ्रमण करके ही महसूस कर पाएंगें।अत: मेरा अनुरोध रहेगा कि कभी समय निकालकर इन स्थलों का भ्रमण अवश्य करें।
        --- ओंकार सिंह विवेक 



February 4, 2026

उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई की ओर से मशहूर शायर ताहिर फ़राज़ साहब की श्रद्धांजलि सभा


आलमी शोहरत-याफ़्ता शायर ताहिर फ़राज़ साहब नहीं रहे

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देश और दुनिया में अपनी एहसासात से लबरेज़ शायरी से धूम मचाने वाले रामपुर के आलमी शोहरत-याफ़्ता शायर जनाब ताहिर फ़राज़ साहब का 24 जनवरी,2026 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया।परिजनों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार मुंबई में ही सांताक्रुज़ क़ब्रिस्तान में किया गया।उनके असामयिक निधन पर ज़िंदगी की हक़ीक़त बयान करता हुआ उनका यह शेर बहुत याद आ रहा है :

        ज़िन्दगी तेरे  त'आक़ुब में  हम,

        इतना चलते हैं कि मर जाते हैं।

                         -- ताहिर फ़राज़

ताहिर फ़राज़ साहब उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई के संरक्षक तथा सभा के संयोजक सुरेन्द्र अश्क रामपुरी के उस्ताद भी थे। साहित्य सभा के सदस्यों ने शोक सभा का आयोजन करके 25 जनवरी,2026 को मरहूम ताहिर फ़राज़ साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।सभा के अध्यक्ष ओंकार सिंह विवेक ने कहा कि उत्तर प्रदेश साहित्य सभा की स्थानीय इकाई को फ़राज़ साहब का मार्गदर्शन सदैव राह दिखाता रहेगा।साहित्यिक कार्यक्रमों में कविता और शायरी के हवाले से अक्सर आपसे सबको बहुत क़ीमती राय मिलती रहती थी। सभा के संयोजक सुरेन्द्र अश्क रामपुरी तथा सचिव राजवीर सिंह ने कहा कि ताहिर फ़राज़ साहब एक अच्छे शायर होने के साथ साथ एक बेहतरीन इंसान भी थे। उनकी विनम्रता और सदाशयता हमेशा याद आती रहेगी।हिंदुस्तान के अलावा अमरीका,यूरोप सहित अनेक खाड़ी देशों में ताहिर फ़राज़ साहब का मुशायरों में जाना होता रहता था।शोक सभा में सदस्यों ने ताहिर फ़राज़ साहब के ग़ज़ल संग्रह 'काश' तथा 'कश्कोल' में प्रकाशित ग़ज़लों का पाठ करके उनका स्मरण किया।

ताहिर फ़राज़ साहब हमेशा देश और दुनिया में प्यार और मुहब्बत को बढ़ाने की बातें किया करते थे।यही बातें वह अपनी शायरी के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने का काम उम्र भर करते रहे।उनकी यह पंक्तियाँ देखें :

       मौत सच है ये बात अपनी जगह,

        ज़िंदगी  का  सिंगार  करते रहो।

        नफ़ा  नुक़सान  होता  रहता  है,

        प्यार  का  कारोबार  करते रहो।

                 -- ताहिर फ़राज़ 

शोक सभा में उपरोक्त के अतिरिक्त सुधाकर सिंह परिहार,प्रदीप राजपूत माहिर,सोहन लाल भारती,पतराम सिंह,शिवकुमार चन्दन,सुमित मीत,गौरव नायक, अनमोल रागिनी चुनमुन, फ़ैसल मुमताज़,नवीन पांडे, बलवीर सिंह, सुनीता खन्ना,पुन्नू तथा आस्था खन्ना आदि ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए ताहिर फ़राज़ साहब के साथ रहे अपने अनुभवों कोअश्रुपूरित नेत्रों से व्यक्त किया।

---ओंकार सिंह विवेक,अध्यक्ष

उत्तर प्रदेश साहित्य सभा रामपुर इकाई 

सम्मानित समाचार पत्र 'दैनिक जागरण' ने अपने दिनांक 26 जनवरी,2026 के अंक में श्रद्धांजलि सभा के समाचार को विस्तार से प्रकाशित किया इसके लिए हम संपादक मंडल का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।


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चतुर सुजान

मित्रो सादर प्रणाम 🌹🌹🙏🙏 आज के चतुर नेताओं के चरित्र को उजागर करता एक कुण्डलिया छंद प्रस्तुत है।आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी 🙏...