सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे,
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे।
ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे।
ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
---- राहत इंदौरी
सफ़र और उसकी थकान सहन करने का मंज़िल की राह में कितना महत्व है,शायर के ऊपर कोट किए गए शेरों से बख़ूबी समझा जा सकता है।सो इसी रौ में हम चार साथी भी सपरिवार कड़कड़ाती ठंड में कोई मक़सद लिए सफ़र पर निकल पड़े।सफ़र भी कोई मामूली नहीं बल्कि सनातन के गौरव,धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी का।
ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी जी द्वारा प्रतिवर्ष 'ग़ज़ल कुंभ' के नाम से एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कराया जाता है।इस साहित्यिक कार्यक्रम में उपस्थित होकर देश भर के कवि/ग़ज़लकार ग़ज़ल पाठ करते हैं।रामपुर से हम चार साथी(मैं ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़) पिछले कई वर्षों से इस कार्यक्रम में सहभागिता करते आ रहे हैं।
इस बार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी (बनारस-वाराणसी)में 10/11जनवरी,2026 को हुआ।इस बार इस कार्यक्रम में हम सभी साथियों ने ग़ज़ल पाठ तो किया ही साथ ही अपने परिजनों के संग पावन नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ सारनाथ जैसे ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के भ्रमण का आनंद भी लिया।
लीजिए पेश है तीन दिन की इस साहित्यिक-सह-पर्यटन यात्रा की सिलसिलेवार पहली कड़ी :
पहला दिन (Day-1)
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9 जनवरी को दोपहर बाद हम लोग अपने-अपने परिवार सहित रामपुर से काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुए। रास्ते भर जो मस्ती हुई सफ़र में उसका बयान करना मुश्किल है। सभी ने गीत,कविता चुटकुले आदि सुनाकर रास्ते भर एक दूसरे का ख़ूब मनोरंजन किया।ट्रेन में साहित्यिक वार्तालाप तथा काव्य पाठ भी हुआ। आसपास की सीटों पर जो यात्री विराजमान थे उन्होंने भी हमारे साथ मस्ती में सहभागिता की।एक महिला यात्री ने तो सबको एक साथ यात्रा करने का अवसर प्रदान करने के लिए अपनी बर्थ भी हमें दे दी और हमारी दूसरे कूपे में निर्धारित सीट सहर्ष स्वीकार कर ली।ग्रुप के सभी साथियों ने उनका बार-बार हृदय से आभार व्यक्त किया।ट्रेन में ग्रुप ने जो डिनर किया उसके तो कहने ही क्या हैं।सभी अपने-अपने घर से कुछ न कुछ अलग डिश बनाकर लाए थे। रोटियों की बात करूँ तो पूरी,पराठे, बथुआ के पराठे तथा फ्राइडराइस आदि--आदि। सब्ज़ियों में आलू,मिक्सड वैज,पंजाबी चने,शिमला मिर्च तथा पनीर,चटनी आदि, क्या क्या नहीं था खाने में।जब
दस्तर-ख़्वान बिछा तो ऐसा लगा मानो वह छप्पन भोग से सज गया हो।इतनी varities के पकवान खाकर आत्मा तृप्त हो गई।आपके मुँह में भी इतने पकवानों का नाम सुनकर पानी तो आ ही गया होगा। 😀😀
परस्पर बतियाते और मस्ती करते हुए 10 जनवरी को प्रातःकाल हम लोग बनारस पहुँचे।
बनारस में कैंट रेलवे स्टेशन के पास होटल प्लाज़ा इन पहले से ही बुक कराया हुआ था।ग्रुप में वयस्कों के साथ बच्चे और किशोर सभी मौजूद थे। जिससे यह ग्रुप एक perfect tourist ग्रुप सा लग रहा था। जैसा कि सर्वविदित है बच्चे technolgy में बड़ों से आगे होते हैं सो बच्चों ने बड़ों के साथ मिलकर फटाफट मोबाइल पर कैब बुक करने का काम शुरू कर दिया।थोड़ी देर में निगोशिएशन के बाद कुछ ऑटो हायर किए और Hotel plaza inn पहुँच गए।
होटल ऑनलाइन बुक किया था सो आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि साइट पर जितना अच्छा दिखाया गया है होटल उससे कहीं कमतर हो।परंतु होटल देखने के बाद यह धारणा निर्मूल साबित हुई क्योंकि होटल का अनुभव लगभग ठीक ही रहा।
फ्रेश होकर कुछ देर आराम करने के बाद हम चार लोग तो वहां से लगभग 500 मीटर दूर सरदार पटेल धर्मशाला में ग़ज़ल कुंभ कार्यक्रम में सहभागिता हेतु चले गए।परिजन होटल में लंच लेकर फिर से मस्ती के मूड में आए और एक दूसरे से आत्मीयता बढ़ाते हुए बातों में मशग़ूल हो गए। ऐसे अवसर एक दूसरे की रुचियाँ जानने,परिचय बढ़ाने तथा भविष्य की योजनाएँ बनाने में बहुत मददगार साबित होते हैं सो सबने अवसर का भरपूर लाभ उठाया।बाद में कुछ परिजन आराम करने लगे तथा कुछ काल भैरव के दर्शन करने चले गए।
बनारस में ही हमारे समधी साहब भी रहते हैं।उनसे कई दिन पहले चर्चा हो चुकी थी कि हम 5 परिवार एक साहित्यिक कार्यक्रम तथा पर्यटन भ्रमण हेतु तीन दिन के लिए बनारस आ रहे हैं।उन्होंने घर आने का आग्रह किया लेकिन हमारे ग्रुप का तीन दिन का बहुत व्यस्त कार्यक्रम था सो उनसे अपनी विवशता बता दी थी।हमारी व्यस्तता को देखते हुए वे स्वयं ही अपने मित्र के साथ हम लोगों से मिलने होटल पहुँच गए।सभी से उनका गर्मजोशी से परिचय कराया और काफ़ी देर तक चाय-नाश्ते पर उनसे और उनके मित्र से गपशप भी हुई।
(होटल में नाश्ते/खाने पर ग्रुप के कुछ सदस्य)
सभी ने समधी साहब एवं उनके मित्र के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाकर उन मधुर पलों को हमेशा के लिए सुरक्षित किया। उसी दिन शाम को ग़ज़ल कुंभ स्थल पर देश भर से आए कई ग़ज़लकारों से आत्मीय मुलाक़ात हुई।उनके क्षेत्रों में चल रही साहित्यिक गतिविधियों पर सार्थक चर्चा भी हुई।
जिन साहित्यकारों से संवाद हुआ उनमें आयोजक दीक्षित दनकौरी जी के अलावा मीना भट्ट सिद्धार्थ,हीरा लाल हीरा,अभिषेक अग्निहोत्री,मनोज फगवाड़ी तथा खुर्रम नूर,संतोष कुमार प्रीत आदि प्रमुख हैं।
ऊपर के चित्र में दिखाई दे रहे साहित्यकार संतोष कुमार प्रीत जी से पहली बार मिलना हुआ।आपकी विनम्रता और सदाशयता ने बहुत प्रभावित किया।कविता और शायरी को लेकर उनसे काफ़ी बातें हुईं।हमारा अगले दिन परिवार के साथ बनारस घूमने का पहले से कार्यक्रम तय था अत: प्रीत जी का मंच से काव्य पाठ न सुन पाने का हमें अफ़सोस रहा।
शाम के सत्र में हम चारों साथियों(ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़ )ने ग़ज़ल पाठ किया जिसके लिए सदन का भरपूर समर्थन मिला।
पाँव दबाकर पहले लाला जी को रोज़ सुलाता है,
अपने सोने को फिर गंगू टूटी खाट बिछाता है।
-- ओंकार सिंह विवेक
इक ज़रा सी बात पर हँसने लगे,
ग़म मेरे हालात पर हँसने लगे।
सुरेन्द्र अश्क रामपुरी
इक अजब सी बेक़रारी हो रही है,
मैं ग़ज़ल कह दूँ ख़ुमारी हो रही है।
-- राजवीर सिंह राज़
मंज़िल बहुत क़रीब है रस्ता सपाट है,
लेकिन अब इस सफ़र से मेरा मन उचाट है।
--- प्रदीप राजपूत माहिर
क्रमशः(बनारस यात्रा का भाग-2 तथा 3 शीघ्र ही अगली ब्लॉग पोस्ट में)
प्रस्तुति : ओंकार सिंह विवेक
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 18 जनवरी 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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जी हार्दिक आभार 🙏
Deleteजी हार्दिक आभार आपका
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteहार्दिक आभार
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