आजकल ठंड ने सबको जमाकर रख दिया है।क्या
पशु-पक्षी, क्या नर-नारी सभी ठंड से बेहाल हो रहे हैं। यों तो प्राकृतिक संतुलन के लिए सभी ऋतुओं का अपना-अपना महत्व है,परंतु किसी भी मौसम या ऋतु की अप्रत्याशित आक्रामकता जब सबको प्रभावित करती है तो असुविधा तो होती ही है। सभी मौसमों के तेवर और चक्र बदलने के पीछे बहुत से कारण हैं जिन पर फिर कभी चर्चा करेंगे। फ़िलहाल निष्ठुर सर्दी के नाम मेरा एक कुंडलिया छंद आपकी प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा के साथ यहाँ प्रस्तुत है :
आज एक कुंडलिया छंद ज़ालिम सर्दी के नाम
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सर्दी से यह ज़िंदगी , जंग रही है हार।
हे भगवन!अब धूप का,खोलो थोड़ा द्वार।।
खोलो थोड़ा द्वार, ठिठुरते हैं नर-नारी।
जाने कैसी ठंड , जमी हैं नदियाँ सारी।
बैठे हैं सब लोग ,पहन कर ऊनी वर्दी।
फिर भी रही न छोड़,बदन को निष्ठुर सर्दी।।
---ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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