मुक्तक
कभी सदमात देकर ख़ून के आँसू रुलाता है,
कभी ज़ख़्मों पे मेरे आप ही मरहम लगाता है।
उसे दुश्मन कहूँ या फिर कहूँ हमदर्द है मेरा,
बड़ी उलझन में हूँ मेरी समझ में कुछ न आता है।
-----------ओंकार सिंह'विवेक'
@सर्वाधिकार सुरक्षित
कोलकता के प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' का ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए एक बार फिर हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ 🌹🌹🙏🙏 आ...
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