January 23, 2026

वसंत पंचमी तथा शारदे प्राकट्य दिवस विशेष



आज वसंत पंचमी तथा शारदे माँ के प्राकट्य दिवस के पावन अवसर पर आप सभी साथियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।ज्ञान,कला तथा संगीत की देवी सभी पर अपनी कृपा बनाकर रखें इसी कामना के साथ मेरी कुछ सामयिक/प्रासंगिक रचनाएँ आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं।अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं से ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

सरस्वती वंदना--दोहे🌷

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 हो   मेरा   चिंतन   प्रखर , बढ़े  निरंतर  ज्ञान।

 हे   माँ   वीणावादिनी   ,  दो   ऐसा  वरदान।।

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 मातु   शारदे  आपका ,  रहे   कंठ   में   वास।

 वाणी  में   मेरी   सदा , घुलती  रहे  मिठास।।

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 यदि  मिल जाए आपकी,दया-दृष्टि  का  दान।

 माता   मेरी   लेखनी , पाए  जग   में   मान।।

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किया  आपने  शारदे ,  जब  आशीष  प्रदान।

रामचरित  रचकर  हुए , तुलसीदास  महान।।

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हाथ जोड़कर  बस यही, विनती करे 'विवेक'।

नैतिक बल दो माँ मुझे,काम करूँ नित नेक।।

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वसंत के आगमन पर कुछ चौपाई छंद

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मुस्काई   फूलों   की     डाली।

झूमी   गेहूँ   की    हर  बाली।।

धरती  का  क्या  रूप सँवारा।

हे   वसंत ! आभार  तुम्हारा।। 

          🌹

सरसों  झूम- झूम  कर गाती।

खेतों  को  नव  राग सुनाती।।

भौंरे     फूलों    पर    मँडराते।

उनको  मादक  गान सुनाते।।

            🌹

मधुऋतु  हर्षित  होकर  बोली।

आने   वाली   है  अब  होली।।

ढोल , मँजीरे  ,  झांझ  बजेंगे।

नाच-गान   के  सदन  सजेंगे।

            🌹

चिंतन     होता     रहे     घनेरा।

बढ़ता  रहे  ज्ञान   नित   मेरा।।

हंसवाहिनी    दया    दिखाओ।

आकर जिह्वा पर बस जाओ।।

             🌹

         --ओंकार सिंह विवेक

       (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

                    

        

January 21, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग-2)


(बनारस यात्रा भाग - 1 में अभी तक आपने पढ़ा ग्रुप के बनारस पहुंचने, ग़ज़ल कुंभ में ग़ज़ल पाठ करने तथा कुछ सदस्यों द्वारा काल भैरव के दर्शन करने का रोचक वृतांत।अब आगे पढ़िए 👇👇)

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर  कहाँ,
ज़िंदगी  गर  कुछ  रही  तो  ये जवानी फिर कहाँ।
           -- ख़्वाजा मीर दर्द
पता नहीं कब और किस मोड़ पर ज़िंदगी साथ छोड़ दे, जीवन की इसी अनिश्चितता को बयान करता यह शेर समय निकालकर घूमने-फिरने को प्रोत्साहित करता है। तो आइए हमारे भ्रमण दल द्वारा बनारस के सैर सपाटे में दूसरे दिन जिन स्थलों का भ्रमण किया गया उनसे रूबरू कराएँ :
दूसरा दिन (Day-2)
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बनारस (वाराणसी) में काल भैरव को "काशी का कोतवाल" (शहर का रक्षक/पुलिस प्रमुख) माना जाता है और यह मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी काशी में नहीं रह सकता या यात्रा संपन्न नहीं कर सकता। इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन करना भी आवश्यक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि काल भैरव जी को शहर के नागरिकों को दंड देने और समस्याओं से बचाने का अधिकार प्राप्त है और उनकी पूजा से भय,रोग तथा शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है।सो अगले दिन ग्रुप के शेष साथियों(कुछ साथी एक दिन पहले ही दर्शन कर चुके थे) ने भी काल भैरव के दर्शन करने का निश्चय किया।

बनारस की गलियों के बारे में हम लोगों ने बहुत सुन रखा था।काल भैरव के दर्शन को जाते समय उन तंग गलियों से भी वास्ता पड़ ही गया जिनकी अब तक केवल चर्चा ही सुनते आए थे। काल भैरव के दर्शन से पहले व्यवस्था में लगे लोगों ने जिन तंग गलियों के हमसे आवश्यक और अनावश्यक चक्कर लगवाए उसे याद करके शरीर में सिहरन सी होने लगती है। हमें अपने रामपुर की पुरानी बस्तियों की जिन बेहद तंग गलियों पर नाज़ होता था बनारस की उन तंग गलियों के सामने उसका गुमान धराशाई होता दिखाई दिया।ऐसी तंग गलियाँ न हमने पहले कभी देखी थीं और न ही शायद भविष्य में देखने को मिलेंगी। सचमुच ये भूल-भुलैया जैसी घुमावदार गलियाँ बनारस को एक विशिष्ट पहचान देती हैं।

बनारस की तंग गलियों से निकलकर आइए अब कुछ खुले इलाक़े में आते हैं। जी हाँ,मैं बात कर रहा हूँ नमो घाट की। सुब्ह-ए-बनारस का लुत्फ़ उठाने के लिए ग्रुप के कुछ साथियों ने नमो घाट का रुख़ किया।

  (कुछ साथी नमो घाट पर सुखद अनुभूतियों के साथ) 
प्राचीनता और आधुनिकता के साथ तालमेल करता यह बनारस का नया घाट है।नमो घाट की अपनी ख़ास बनावट और अंतरराष्ट्रीय सुविधाएँ तथा नमस्ते का स्कल्पचर पर्यटकों को ख़ूब आकर्षित करता है।यहाँ हेलीकॉप्टर भी उतारा जा सकता है।फ्लोटिंग सीएनजी स्टेशन,ओपन एयर थियेटर, कुंड, फ्लोटिंग जेटी पर बाथिंग कुंड और चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएँ भी यहाँ उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं योग स्थल, वाटर स्पोर्ट्स, चिल्ड्रन प्ले एरिया, कैफेटेरिया के अलावा कई अन्य सुविधाएं भी इसकी शोभा में चार चाँद लगाती हैं।यह वाराणसी का पहला घाट है जो दिव्यांगजनों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाया गया है। हमारे ग्रुप के कुछ साथियों ने यहाँ भरपूर मस्ती की।
हमारे दूसरे दिन के भ्रमण कार्यक्रम में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती का नज़ारा करना अभी शेष था सो सब लोग बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए गेट नंबर 4 पर एकत्र हुए।

काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों तथा भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। हजारों सालों पुराना यह मंदिर वाराणसी में पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।विश्वनाथ का शाब्दिक अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान।इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य,सन्त एकनाथ,गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।विश्वनाथ मंदिर को इतिहास में कई मुस्लिम शासकों द्वारा बार-बार तोड़ा गया। मुगल शासक औरंगज़ेब इस मंदिर को गिराने वाला अंतिम मुस्लिम शासक था जिसने मंदिर के स्थान पर वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया।मंदिर की वर्तमान संरचना 1780 में इंदौर के मराठा शासक अहिल्याबाई होल्कर द्वारा तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह के सहयोग से निकटवर्ती स्थान पर बनाई गई थी।वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मंदिर को भव्य विस्तार देकर बहुत बड़े गलियारे का निर्माण कराया गया है जिससे भक्तजनों को बाबा के दर्शन करने में बहुत सुविधा हो गई है।ऐसी मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन किए बिना बनारस की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।ग्रुप के सभी साथियों ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन करके आत्मिक शांति का अनुभव किया।


बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद लंच का समय हो चुका था। सबके पेट में चूहे दौड़ने लगे तो किसी ऐसी होटल की तलाश शुरू की गई जहाँ घर जैसा शुद्ध शाकाहारी और सादा खाना मिल सके। ग्रुप के युवा सदस्यों ने हमेशा की तरह बनारस के मशहूर खानों को नेट पर सर्च करना शुरू कर दिया।कुछ देर सर्च करने के बाद तय हुआ कि ठठेरी बाज़ार में 'दी राम भंडार' की कचौरी/पूरी सब्ज़ी और जलेबी का आनंद लिया जाएगा।सो सब लोग ठठेरी बाज़ार की तंग गलियों में निकल पड़े।
 लोगों से सुन रखा था कि यदि बनारस गए और राम भंडार की पूरी/कचौरी, सब्ज़ी, जलेबी और प्रसिद्ध मलैया डिश नहीं खाई तो कुछ नहीं खाया।
 काफ़ी दूर तक ठठेरी बाज़ार की तंग गली/बाज़ार में उस दुकान का पता पुछते हुए चलते रहे। काफ़ी दूर जाकर किसी ने बताया कि जिन चीज़ों की तलाश में आप जा रहे हैं उनके मिलने का समय तो समाप्त हो चुका है और अब दुकान भी बंद हो चुकी होगी।सो निराश मन से वापस लौटना शुरू किया।

लोगों ने बताया कि हमेशा ही कुछ इस तरह की भीड़☝️ रहती है 'दी राम भंडार' पर।
अब तक भूख बेक़ाबू हो चुकी थी।गली से बाहर आकर एक साफ़ सुथरे से होटल पर सादा खाना खाया और बनारस की प्रसिद्ध मलइयो स्वीट डिश का आनंद लिया।

बनारसी मलइयो को बनाने का तरीका बहुत आसान है। इसे बनाने के लिए कच्चे दूध को पहले इतना खौलाया जाता है कि  इसका रंग पीला पड़ने लगे।फिर रात में इसे खुले आसमान में ओस के संपर्क में रखा जाता है वो भी खुला करके।सुबह इसे मथा जाता है और मलाई ऊपर आ जाती है।इसी मलाई को केसर,छोटी इलायची और चीनी डालकर फेंटा जाता है।
-इसके झाग को परोसा जाता है जिसे मलइयो कहते हैं।

अब बारी थी अगले पड़ाव यानी दशाश्वमेध घाट की सायंकालीन विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती देखने की।वैसे तो गंगा की हरिद्वार और ऋषिकेश सहित कई जगह आरती होती हैं लेकिन काशी की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। देश के कोने-कोने और विदेश से भी लोग बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने आते हैं।
       (दशाश्वमेध घाट की ओर जाती भीड़) 
दशाश्वमेध घाट पर आरती के समय मेले जैसा माहौल होता है।गंगा के तट पर शाम होते होते माहौल भक्तिमय होने लगता है। पुजारी एक ख़ास वेशभूषा में शंखनाद,घंटी,डमरू की ध्वनि के साथ मां गंगा के जयकारे लगाते हुए आरती संपन्न कराते हैं।
बताते चलें कि वाराणसी में सबसे पहले गंगा आरती की शुरुआत साल 1991 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर हुई थी।तब से ही लगातार शाम के समय सूर्यास्त के बाद आरती की जाती है। यह आरती लगभग 45 मिनट तक चलती है।गंगा आरती के समय गंगा के पानी में दीपक की लौ अलौकिक दृश्य पैदा करती है।गंगा आरती को लेकर मान्यता है कि इससे मन की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

कुछ लोग घाट पर रहकर गंगा आरती का आनंद लेते हैं जबकि बहुत से लोग बोट्स तथा स्टीमर्स तथा क्रूज़ आदि में बैठकर गंगा आरती के भव्य दृश्य का अवलोकन करते हैं।हमारे ग्रुप के लोगों ने भी बोट/स्टीमर में बैठकर काफ़ी नज़दीक़ से गंगा आरती की शोभा को निहारा।


देर रात तक गंगा आरती का आंखों को चौंधियां देने वाला मोहक नज़ारा देखा।उस मोहक नज़ारे का शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन है। आरती का असली आनंद तो यहाँ आकर ही उठा सकते हैं।अतः आपसे आग्रह रहेगा कि कभी बनारस के दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती देखने अवश्य आएँ।
दिन भर की भागदौड़ से ग्रुप के सभी लोगों के तन तो थककर चूर हो चुके थे परंतु मन कहाँ थकने वाले थे।अब हमारे पास घूमने के लिए सिर्फ़ एक दिन ही शेष था सो सबने जल्दी होटल पहुंचकर आराम करने का निश्चय किया। अगले दिन बनारस से थोड़ी दूर स्थित विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बौद्ध धर्म स्थल सारनाथ का भ्रमण करके शाम को हमें वापसी की ट्रेन में भी बैठना था।
बनारस-भ्रमण  की यह कड़ी यहीं समाप्त करते हैं।
ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏

क्रमशः (बनारस यात्रा संस्मरण भाग - 3 यानी अंतिम कड़ी लेकर शीघ्र ही हाज़िर होंगे तब तक के लिए सादर प्रणाम 🙏🙏)

प्रस्तुति 
ओंकार सिंह विवेक 








January 17, 2026

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग -1)


सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे,
चले  चलो  के  जहाँ  तक   ये  आसमान  रहे।

ये क्या उठाये क़दम और  आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
        ---- राहत इंदौरी

सफ़र और उसकी थकान सहन करने का मंज़िल की राह में कितना महत्व है,शायर के ऊपर कोट किए गए शेरों से बख़ूबी समझा जा सकता है।सो इसी रौ में हम चार साथी भी सपरिवार कड़कड़ाती ठंड में कोई मक़सद लिए सफ़र पर निकल पड़े।सफ़र भी कोई मामूली नहीं बल्कि सनातन के गौरव,धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी का।
ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी जी द्वारा प्रतिवर्ष 'ग़ज़ल कुंभ' के नाम से एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कराया जाता है।इस साहित्यिक कार्यक्रम में उपस्थित होकर देश भर के कवि/ग़ज़लकार ग़ज़ल पाठ करते हैं।रामपुर से हम चार साथी(मैं ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़) पिछले कई वर्षों से इस कार्यक्रम में सहभागिता करते आ रहे हैं।
इस बार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी (बनारस-वाराणसी)में 10/11जनवरी,2026 को हुआ।इस बार इस कार्यक्रम में हम सभी साथियों ने ग़ज़ल पाठ तो किया ही साथ ही अपने परिजनों के संग पावन नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ सारनाथ जैसे ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के भ्रमण का आनंद भी लिया।
लीजिए पेश है तीन दिन की इस साहित्यिक-सह-पर्यटन यात्रा की सिलसिलेवार पहली कड़ी :
पहला दिन (Day-1)
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9 जनवरी को दोपहर बाद हम लोग अपने-अपने परिवार सहित रामपुर से काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुए। रास्ते भर जो मस्ती हुई सफ़र में उसका बयान करना मुश्किल है। सभी ने गीत,कविता चुटकुले आदि सुनाकर रास्ते भर एक दूसरे का ख़ूब मनोरंजन किया।ट्रेन में साहित्यिक वार्तालाप तथा काव्य पाठ भी हुआ। आसपास की सीटों पर जो यात्री विराजमान थे उन्होंने भी हमारे साथ मस्ती में सहभागिता की।एक महिला यात्री ने तो सबको एक साथ यात्रा करने का अवसर प्रदान करने के लिए अपनी बर्थ भी हमें दे दी और हमारी दूसरे कूपे में निर्धारित सीट सहर्ष स्वीकार कर ली।ग्रुप के सभी साथियों ने उनका बार-बार हृदय से आभार व्यक्त किया।ट्रेन में ग्रुप ने जो डिनर किया उसके तो कहने ही क्या हैं।सभी अपने-अपने घर से कुछ न कुछ अलग डिश बनाकर लाए थे। रोटियों की बात करूँ तो पूरी,पराठे, बथुआ के पराठे तथा फ्राइडराइस आदि--आदि। सब्ज़ियों में आलू,मिक्सड वैज,पंजाबी चने,शिमला मिर्च तथा पनीर,चटनी आदि, क्या क्या नहीं था खाने में।जब 
दस्तर-ख़्वान बिछा तो ऐसा लगा मानो वह छप्पन भोग से सज गया हो।इतनी varities के पकवान खाकर आत्मा तृप्त हो गई।आपके मुँह में भी इतने पकवानों का नाम सुनकर पानी तो आ ही गया होगा। 😀😀
परस्पर बतियाते और मस्ती करते हुए 10 जनवरी को प्रातःकाल हम लोग बनारस पहुँचे।
बनारस में कैंट रेलवे स्टेशन के पास होटल प्लाज़ा इन पहले से ही बुक कराया हुआ था।ग्रुप में वयस्कों के साथ बच्चे और किशोर सभी मौजूद थे। जिससे यह ग्रुप एक perfect tourist ग्रुप सा लग रहा था। जैसा कि सर्वविदित है बच्चे technolgy में बड़ों से आगे होते हैं सो बच्चों ने बड़ों के साथ मिलकर फटाफट मोबाइल पर कैब बुक करने का काम शुरू कर दिया।थोड़ी देर में निगोशिएशन के बाद कुछ ऑटो हायर किए और Hotel plaza inn पहुँच गए।

होटल ऑनलाइन बुक किया था सो आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो कि साइट पर जितना अच्छा दिखाया गया है होटल उससे कहीं कमतर हो।परंतु होटल देखने के बाद यह धारणा निर्मूल साबित हुई क्योंकि होटल का अनुभव लगभग ठीक ही रहा।
फ्रेश होकर कुछ देर आराम करने के बाद हम चार लोग तो वहां से लगभग 500 मीटर दूर सरदार पटेल धर्मशाला में ग़ज़ल कुंभ कार्यक्रम में सहभागिता हेतु चले गए।परिजन होटल में लंच लेकर फिर से मस्ती के मूड में आए और एक दूसरे से आत्मीयता बढ़ाते हुए बातों में मशग़ूल  हो गए। ऐसे अवसर एक दूसरे की रुचियाँ जानने,परिचय बढ़ाने तथा भविष्य की योजनाएँ बनाने में बहुत मददगार साबित होते हैं सो सबने अवसर का भरपूर लाभ उठाया।बाद में कुछ परिजन आराम करने लगे तथा कुछ काल भैरव के दर्शन करने चले गए।
बनारस में ही हमारे समधी साहब भी रहते हैं।उनसे कई दिन पहले चर्चा हो चुकी थी कि हम 5 परिवार एक साहित्यिक कार्यक्रम तथा पर्यटन भ्रमण हेतु तीन दिन के लिए बनारस आ रहे हैं।उन्होंने घर आने का आग्रह किया लेकिन हमारे ग्रुप का तीन दिन का बहुत व्यस्त कार्यक्रम था सो उनसे अपनी विवशता बता दी थी।हमारी व्यस्तता को देखते हुए वे स्वयं ही अपने मित्र के साथ हम लोगों से मिलने होटल पहुँच गए।सभी से उनका गर्मजोशी से परिचय कराया और काफ़ी देर तक चाय-नाश्ते पर उनसे और उनके मित्र से गपशप भी हुई।
        (होटल में नाश्ते/खाने पर ग्रुप के कुछ सदस्य) 
सभी ने समधी साहब एवं उनके मित्र के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाकर उन मधुर पलों को हमेशा के लिए सुरक्षित किया।
 (चित्र में बाएं से दाएं मेरी धर्म पत्नी,मैं तथा हमारे समधी जी एवं उनके मित्र)
(चित्र में ग्रुप के साथ हमारे समधी जी एवं उनके मित्र)

 उसी दिन शाम को ग़ज़ल कुंभ स्थल पर देश भर से आए कई ग़ज़लकारों से आत्मीय मुलाक़ात हुई।उनके क्षेत्रों में चल रही साहित्यिक गतिविधियों पर सार्थक चर्चा भी हुई। 
जिन साहित्यकारों से संवाद हुआ उनमें आयोजक दीक्षित दनकौरी जी के अलावा मीना भट्ट सिद्धार्थ,हीरा लाल हीरा,अभिषेक अग्निहोत्री,मनोज फगवाड़ी तथा खुर्रम नूर,संतोष कुमार प्रीत आदि प्रमुख हैं। 
ऊपर के चित्र में दिखाई दे रहे साहित्यकार संतोष कुमार प्रीत जी से पहली बार मिलना हुआ।आपकी विनम्रता और सदाशयता ने बहुत प्रभावित किया।कविता और शायरी को लेकर उनसे काफ़ी बातें हुईं।हमारा अगले दिन परिवार के साथ बनारस घूमने का पहले से कार्यक्रम तय था अत: प्रीत जी का मंच से काव्य पाठ न सुन पाने का हमें अफ़सोस रहा।
शाम के सत्र में हम चारों साथियों(ओंकार सिंह विवेक, सुरेन्द्र अश्क रामपुरी, प्रदीप राजपूत माहिर तथा राजवीर सिंह राज़ )ने ग़ज़ल पाठ किया जिसके लिए सदन का भरपूर समर्थन मिला।
      पाँव दबाकर पहले लाला जी को रोज़ सुलाता है,
       अपने  सोने को  फिर गंगू टूटी खाट बिछाता है।
                        -- ओंकार सिंह विवेक 
       इक ज़रा सी बात पर हँसने लगे,
       ग़म मेरे  हालात  पर हँसने लगे।
                    सुरेन्द्र अश्क रामपुरी 
       इक अजब सी  बेक़रारी हो रही है,
       मैं ग़ज़ल कह दूँ ख़ुमारी हो रही है।
               -- राजवीर सिंह राज़ 
        
मंज़िल  बहुत   क़रीब  है    रस्ता  सपाट  है,
लेकिन अब इस सफ़र से मेरा मन उचाट है।
                   --- प्रदीप राजपूत माहिर 

क्रमशः(बनारस यात्रा का भाग-2 तथा 3 शीघ्र ही अगली ब्लॉग पोस्ट में) 
प्रस्तुति : ओंकार सिंह विवेक 


























January 15, 2026

हाय रे सर्दी !


आजकल ठंड ने सबको जमाकर रख दिया है।क्या 
पशु-पक्षी, क्या नर-नारी सभी ठंड से बेहाल हो रहे हैं। यों तो प्राकृतिक संतुलन के लिए सभी ऋतुओं का अपना-अपना महत्व है,परंतु किसी भी मौसम या ऋतु की अप्रत्याशित आक्रामकता जब सबको प्रभावित करती है तो असुविधा तो होती ही है। सभी मौसमों के तेवर और चक्र बदलने के पीछे बहुत से कारण हैं जिन पर फिर कभी चर्चा करेंगे। फ़िलहाल निष्ठुर सर्दी के नाम मेरा एक कुंडलिया छंद आपकी प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा के साथ यहाँ प्रस्तुत है :

आज एक कुंडलिया छंद ज़ालिम सर्दी के नाम
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सर्दी   से   यह  ज़िंदगी , जंग  रही  है  हार।
हे भगवन!अब धूप का,खोलो  थोड़ा द्वार।।
खोलो    थोड़ा   द्वार, ठिठुरते  हैं  नर-नारी।
जाने  कैसी   ठंड , जमी   हैं  नदियाँ  सारी।
बैठे   हैं  सब  लोग ,पहन  कर  ऊनी   वर्दी।
फिर भी रही न छोड़,बदन को निष्ठुर सर्दी।।
                           ---ओंकार सिंह विवेक
             (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

January 8, 2026

महफ़िले सजती रहें शेर-ओ-सुख़न की


दो सम्मानित अख़बारों 'अरवल टाइम्स' जहानाबाद, बिहार तथा 'सदीनामा', कोलकता में प्रकाशित मेरी दो ग़ज़लों का आनंद लीजिए 🌹🌹🙏🙏
सहयोग हेतु आदरणीय रमेश कँवल साहब तथा आदरणीय ओमप्रकाश नूर साहब का आभार प्रकट करता हूँ।
        ग़ज़ल 1
        *******

महफ़िलें   सजती   रहें    शेर-ओ-सुख़न    की,

मश्क़ हो ही जाएगी ख़ुद  फ़िक्र-ओ-फ़न  की।


कैसे   मुमकिन  है   बिना   कुछ   सोचे-समझे,

बात   हम   करते  रहें   बस  उनके  मन   की।


है   मुसलसल  ख़ास   लोगों   के   असर    में, 

क्या  सुनेगा   बात   हाकिम  आम   जन  की।


आओ  कर लें    पहले   भूमंडल   की   चिंता,

नाप   ली   जाएगी   दूरी   फिर    गगन   की।

                

सुनके   आँखों   में    न   आते    कैसे   आँसू, 

थी  कथा  वो  राम  जी   के  वन   गमन  की।


कामयाबी      की       बुलंदी       चूमने     में,

भूमिका   होती   है   सब   मेहनत-लगन  की।


होती  है  माँ-बाप  की   बस इतनी   ख़्वाहिश,

बात   समझें   काश! बच्चे   उनके  मन   की।


           ग़ज़ल 2

           ********

फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन


ज्यूँ ही रथ पर चढ़के सूरज आ  गया,

देखकर   कुहरा   उसे    थर्रा    गया।      


आदमी मिलते थे जब दिल खोलकर,

दोस्तो  वो  दौर  तो  कब   का  गया।


बस गए  हम शहर  में  आकर  मगर,

गाँव  से  रिश्ता   नहीं   तोड़ा   गया।   


कोठियों  में   बँट  गई   सब  रौशनी,

झुग्गियों का फिर से हक़  मारा गया।


देखते  हैं  क्या  नतीजा  आए   अब,

पर्चा  तो  इस  बार भी अच्छा  गया।


देखा कितनों  को ही बग़लें  झाँकते,

आईना महफ़िल में जब रक्खा गया।


हो गए महफ़िल में सब उसके मुरीद,

अपने शे'रों  से  ग़ज़ब  वो ढा  गया।

       --- ओंकार सिंह विवेक 

   (सर्वाधिकार सुरक्षित) 

प्रोत्साहन प्रतिसाद हेतु मैं प्रतिष्ठित साहित्यिक पटक राष्ट्रीय तूलिका मंच का आभार प्रकट करता हूँ।
इसी तरह प्रोत्साहन प्रतिसाद हेतु मैं साहित्यिक मंच रचनाकार का भी हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।


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