दोस्तो कुछ रोज़ पहले एक मतला हुआ था।लीजिए ग़ज़ल मुकम्मल हो गई :
ढूँढिए मत उनमें कुछ मे'यार अब,
इनके-उनके हो गए अख़बार अब।
खो गया रिश्तों का वो संसार अब,
हो गए छोटे बहुत परिवार अब।
कब तलक उलझेंगे मज़हब-ज़ात में,
करिए थोड़ा सोच में विस्तार अब।
कौन फिर परचम उठाए अम्न का,
सबके हाथों में तो हैं हथियार अब।
पहले जैसी गर्म-जोशी कब रही,
मिलते हैं रस्मन ही रिश्तेदार अब।
कौन आसानी से करता है मियाँ,
अपनी कमियों को यहाँ स्वीकार अब।
साधुओं जैसा नहीं लगता 'विवेक',
साधुओं का हमको तो आचार अब।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
Nice ghazal
ReplyDeleteThanks
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