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वीडियो रील ही घटना की बनाने आई,
भीड़ कब घायलों की जान बचाने आई।
सोचिए कैसे हिरासाँ न हों प्यासी फ़सलें,
मर गई प्यास तो बरसात बुझाने आई।
पेट की आग जो करवा ले वही थोड़ा है,
नाच लड़की कोई रस्सी पे दिखाने आई।
'आदतन बाप ने तो दी न तवज्जोह हरगिज़,
लाल रूठा तो उसे माँ ही मनाने आई।
हौसला देखके मेरा न टिकी इक लम्हा,
मुझपे मुश्किल कोई जब रो'ब जमाने आई।
यूँ तो कितनी ही यहाँ आईं-गईं सरकारें,
मुश्किलें कोई न जनता की घटाने आई।
जब नज़र आया तभी वार उजाले ने किए,
'अक़्ल फिर भी न अँधेरे की ठिकाने आई।
-- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
एक वरिष्ठ साहित्यकार का शानदार काव्य पाठ सुनिए 🌹🌹 👈👈
बेहतरीन ग़ज़ल
ReplyDeleteआभार आदरणीया
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