मित्रो सादर प्रणाम🙏🙏
पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते आज काफ़ी दिन बाद एक ग़ज़ल के माध्यम से आपसे संवाद हो रहा है।यह ग़ज़ल मैंने कुछ समय पहले एक साहित्यिक ग्रुप में दिए गए 'तरही' मिसरे पर कही थी।
इस ग़ज़ल को प्रकाशित करने के लिए मैं कोलकता से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' के संपादक मंडल का हृदय से आभार प्रकट करता हूं।यह ग़ज़ल मेरे हाल ही में प्रकाशित हुए ग़ज़ल संग्रह 'कुछ मीठा कुछ खारा' में भी सम्मिलित है। मेरी ग़ज़ल के साथ ही जनाब शकूर अनवर साहब की बेहतरीन ग़ज़ल भी छपी है। मैं उनको भी मुबारकबाद पेश करता हूं।
अच्छे लोगों में जो उठना-बैठना हो जाएगा,
फिर कुशादा सोच का भी दायरा हो जाएगा।
क्या पता था हिंदू-ओ-मुस्लिम की बढ़ती भीड़ में,
एक दिन इंसान ऐसे लापता हो जाएगा।
और बढ़ जाएगी फिर मंज़िल को पाने की ललक,
मुश्किलों का मुस्तक़र जब रास्ता हो जाएगा।
सुन रहे हैं कब से उनको बस यही कहते हुए,
मुफ़लिसी का मुल्क से अब ख़ातिमा हो जाएगा।
कर लिया करते थे पहले शौक़िया बस शायरी,
क्या पता था इस क़दर इसका नशा हो जाएगा।
आओ सबका दर्द बाँटें,सबसे रिश्ता जोड़ लें,
इस तरह इंसानियत का हक़ अदा हो जाएगा।
फिर ही जाएँगे यक़ीनन दश्त के भी दिन 'विवेक',
अब्र का जिस रोज़ थोड़ा दिल बड़ा हो जाएगा।
©️ Onkar Singh 'Vivek'
sad ghazal dhamaka 😢😢👈👈