एक मतला' और एक शेर समाअत कीजिए :
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अभी तीरगी के निशाँ और भी हैं,
उजाले तेरे इम्तिहाँ और भी हैं।
अभी रंजो-ग़म कुछ उठाने हैं बाक़ी,
अभी तो मेरे मेहरबाँ और भी हैं।
@ओंकार सिंह विवेक
कोलकता के प्रतिष्ठित अख़बार 'सदीनामा' का ग़ज़ल प्रकाशित करने के लिए एक बार फिर हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ 🌹🌹🙏🙏 आ...
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