एक मतला' और एक शेर समाअत कीजिए :
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अभी तीरगी के निशाँ और भी हैं,
उजाले तेरे इम्तिहाँ और भी हैं।
अभी रंजो-ग़म कुछ उठाने हैं बाक़ी,
अभी तो मेरे मेहरबाँ और भी हैं।
@ओंकार सिंह विवेक
सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे, चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे। ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल...
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