एक मतला' और एक शेर समाअत कीजिए :
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अभी तीरगी के निशाँ और भी हैं,
उजाले तेरे इम्तिहाँ और भी हैं।
अभी रंजो-ग़म कुछ उठाने हैं बाक़ी,
अभी तो मेरे मेहरबाँ और भी हैं।
@ओंकार सिंह विवेक
आपके स्नेह-आशीष की अभिलाषा के साथ आज अपने जन्मदिन के अवसर पर एक ग़ज़ल के साथ आपसे मुखातिब हूँ : ग़ज़ल ...
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