August 6, 2019

सीधी सच्ची बात

दोहे

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पहले मुझको झिड़कियाँ , फिर थोड़ी मनुहार,
यार  समझ  पाया  नहीं , मैं  तेरा    व्यवहार।
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जिससे मिलकर बाँटते , अपने मन की  पीर,
मिला  नहीं  ऐसा   हमें ,  कोई  भी    गंभीर।
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बिगड़ेगी   कैसे  भला , जग   में  मेरी  बात,
जब  माता  मेरे  लिये , दुआ  करे दिन रात।
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गर्म  सूट  में  सेठ  का ,  जीना  हुआ  मुहाल,
पर  नौकर  नें  शर्ट में ,  जाड़े  दिये  निकाल।
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इक दिन होगी आपकी , मुश्किल भी आसान,
वक़्त किसी का भी सदा , रहता  नहीं समान।
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धन  दौलत  की ढेरियाँ , कोठी  बँगला  कार,
अगर नहीं मन शांत तो , यह  सब हैं  बेकार।
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         -------ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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