नए साल के शुरू में आप सब की ख़िदमत में एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ। ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य ही अवगत कराइए 🙏🙏
ग़ज़ल
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ज्यूँ ही रथ पर चढ़के सूरज आ गया,
देखकर कुहरा उसे थर्रा गया।
आदमी मिलते थे जब दिल खोलकर,
दोस्तो वो दौर तो कब का गया।
बस गए हम शहर में आकर मगर,
गाँव से रिश्ता नहीं तोड़ा गया।
कोठियों में बँट गई सब रौशनी,
झुग्गियों का फिर से हक़ मारा गया।
देखते हैं क्या नतीजा आए अब,
पर्चा तो इस बार भी अच्छा गया।
देखा कितनों को ही बग़लें झाँकते,
आईना महफ़िल में जब रक्खा गया।
हो गए महफ़िल में सब उसके मुरीद,
अपने शे'रों से ग़ज़ब वो ढा गया।
-- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
लाजबाब
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार 🙏
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