August 31, 2025

पुस्तक समीक्षा -'गीत सागर' (काव्य-संग्रह)


                           पुस्तक समीक्षा 

                             **********

                 कृति : 'गीत सागर ' (काव्य-संग्रह) 

                 कृतिकार : राम रतन यादव रतन 

   प्रकाशक :विधा प्रकाशन,उधम सिंह नगर, उत्तराखंड 

                 प्रकाशन वर्ष : 2023 मूल्य : 175 रुपए 

 पुस्तक परिचय प्रदाता/समीक्षक : ओंकार सिंह विवेक 


साहित्यकार केवल स्वांत: सुखाय  ही सृजन नहीं करता है अपितु उसका मौलिक चिंतन एवं सृजन समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है। काव्य की अनेक विधाओं जैसे गीत, मुक्तक, दोहा,कुंडलिया, घनाक्षरी तथा सवैया आदि में काव्यकार अपने भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। गीत की जहां तक बात है उसमें मुखड़े के साथ तीन या चार तक अंतरे होते हैं। गीत प्रारंभ से अंत तक एक ही विषय को विस्तार देते हुए रचा जाता है। शब्द सामंजस्य, शब्द चयन एवं यति-गति के साथ लयात्मकता गीत  की पहली शर्त है। यदि गीतों में प्रतीक, बिंब और अलंकार, मुहावरे आदि भी प्रयोग किए जाएं तो गीत  की ख़ूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। 

कुछ वर्ष पहले रामरतन यादव रतन  का पहला काव्य संग्रह 'काव्य ज्योति' के नाम से आया था जिसे पढ़ने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ था। 'काव्य ज्योति' में विभिन्न विषयों पर रतन जी की भावना प्रधान संभावनाएं जगाती अच्छी रचनाएं पढ़ने में आई थीं ।अब 'गीत सागर' के नाम से रतन जी की दूसरी कृति मेरे सामने है।इसमें रतन जी की 55 रचनाएं संकलित हैं 'गीत सागर' को उन्होंने अपने स्वर्गीय माता एवं पिता के श्री चरणों में समर्पित किया है । श्री रतन जी के माता-पिता आज देवलोक से अपने पुत्र की यह उपलब्धियां देखकर निश्चित ही प्रसन्नता का अनुभव कर रहे होंगे। 


कवि ने 'गुणों का उत्तम प्रसार दो मां,हमारे अवगुण निवार दो मां' कहते हुए सरस्वती की आराधना से अपने गीत संग्रह का  शुभारंभ किया है। सरस्वती वंदना के अंत में एक रचनाकार के लिए क़लम की महत्ता को प्रतिपादित करता हुआ एक सुंदर मुक्तक भी हमें पढ़ने को मिलता है-- 


क़लम हथियार है अपना, क़लम अधिकार है अपना, 

क़लम ही सार  है अपना, क़लम आधार है अपना।

क़लम से ही जगत में हम सभी सम्मान पाते हैं,

क़लम श्रृंगार है अपना, क़लम संसार है अपना।

व्यक्ति की धार्मिक एवं आध्यात्मिक आस्थाएं नि:संदेह उसे मानसिक शांति प्रदान करती हैं। कवि की मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति गहरी श्रद्धा ने उनसे एक सुंदर भजन सृजित कराया है जिसकी कुछ पंक्तियों का आनंद लीजिए 


कृपा प्रभु राम की जिस पर सफलता खूब पता है, 

भजे प्रभु राम को मन से भंवर से पार जाता है। 

पुस्तक में संकलित एक सुंदर बाल गीत की कुछ पंक्तियां देखिए 

चंदा छुपा डूब गए तारे, लाल हमारे अब उठ जा रे ।

पूरब में छाई है लाली, उठकर निरख नज़ारे सारे। 

वातावरण सुखद है प्यारे, लाल हमारे अब उठ जा रे। 

इन पंक्तियों को पढ़कर हमें प्रसिद्ध कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की कविता 'उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो ' का सहसा ही स्मरण हो उठता है। 


गीतों के साथ-साथ पुस्तक में बीच-बीच में महत्वपूर्ण विषयों पर मुक्तकों के माध्यम से भी कवि ने अपनी बात कही है। इस प्रयोग ने पुस्तक को और निखार दे दिया है। प्यार और समर्पण की भावना को बल देता हुआ एक सुंदर मुक्तक  देखिए इस पुस्तक से 

मोहब्बत का मधुर एहसास यदि इंसान पा जाए, 

अंधेरी रात में भी वह मिलन के गीत गा जाए। 

मधुर रिश्ता समर्पण का चले यदि भावना के सँग ,

दिलों के बाग़ में फ़स्ले- बहाराँ गुल खिला  जाए। 

जिन्होंने हमें यह अनमोल जीवन दिया, परवरिश की, पढ़ा- लिखा कर किसी किसी योग्य बनाया, उन मां-बाप का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता। इसी भावना को लेकर कवि ने माता-पिता को समर्पित सुंदर गीत सृजित किया है 

गहरी हों कितनी भी नदियां, हम कश्ती पतवार बनेंगे,

मात- पिता की सेवा को हम सहज- सुलभ हर बार बनेंगे। 

जब भी जो कुछ उनसे मांगा सब हमको उपलब्ध कराया, 

श्रम- सीकर से सींच - सींचकर हमें जगत में योग्य बनाया। 

है कर्तव्य हमारा उनके सपनों का संसार बनेंगे, 

मात-पिता की सेवा को हम सहज- सुलभ हर बार बनेंगे। 


आज की स्वार्थी दुनिया में नाते - रिश्तों में वह अपनापन कहां बचा है। अब तो लोग सिर्फ़  मतलब के लिए संबंध बनाते हैं और उन्हें बढ़ाते हैं। ऐसी बातों से जब कवि  रतन का मन व्यथित होता है तो वह कह उठते हैं 

जीवन की आपाधापी में जीना अब दुश्वार हो गया, 

संबंधों में प्रेम कहां है स्वारथ का संसार हो गया।

चूंकि कवि राम रतन यादव रतन उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जनपद से संबंध रखते हैं जहां की आंचलिक भाषा भोजपुरी है, सो प्रस्तुत पुस्तक में कई रचनाएं हमें भोजपुरी में भी देखने को मिलती है। गांव के बदले हुए हालात पर चिंता प्रकट करते हुए भोजपुरी में कवि कहता है 

खेतन- खेतन प्लाट कट गइल, मनई सब हलकान भइल,

भाग- भाग सब शहर जात बा, गंउबा अब वीरान भइल। 

जैने खेतवा में है  भइया सरसों अरहर लहरात रहल, 

आज समझ में ना हीआवत ऊंहवा उठ गइल बड़ा महल। 


कवि की लेखनी किसी एक विषय तक सीमित नहीं रहती। उसकी दृष्टि हर दृश्य, परिदृश्य और विषय पर पड़ती है और वह भी एक ख़ास अंदाज़ में। कवि  रतन ने प्रकृति चित्रण, देश प्रेम, बाल जीवन तथा सामाजिक परिवेश जैसे जीवन से जुड़े सभी पहलुओं को अपने काव्य सृजन का माध्यम बनाया है। पुस्तक की भाषा बहुत सरल है।भाषा के क्लिष्ट बंधनों में न बंधते हुए कवि ने आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है जो एक अच्छी बात है। इतना ही नहीं कवि ने अन्य भाषा के शब्द,जो आम बोलचाल में प्रयुक्त किए जाते हैं का भी खुले दिल से प्रयोग किया है। कवि की बाल कविताओं में जो प्रवाह दिखाई देता है वह भविष्य में उनके एक अच्छे बाल कवि होने की तरफ़  इशारा करता है। 


'गीत सागर' काव्य संग्रह में भावनाओं का सैलाब दिखाई पड़ता है, जिसमें सहज हृदय कवि ने शिल्प को साधने का सफल प्रयास किया है। कवि की पहली कृति 'काव्य ज्योति' भी मेरी नज़र से गुज़री थी। उससे 'गीत सागर'  की तुलना करके मैं  कह सकता हूं कि कवि का सृजन उत्तरोत्तर उत्तमता की ओर अग्रसर है। थोड़ी- बहुत टंकण त्रुटियां जो आमतौर पर अक्सर पुस्तकों में रह जाती हैं वह इस काव्य संकलन में भी मौजूद हैं। हिंदी छंदों में मात्रा पतन तथा तुकांत श्रेष्ठता, शब्द चयन आदि की जहां तक बात है, मानक हिंदी काव्य के पक्षधर विद्धजन कवि रतन जी से  भविष्य में और बेहतर की उम्मीद कर सकते हैं। 


मुझे आशा है की संभावनाओं से भरे प्रिय कवि राम रतन यादव रतन जी की यह काव्य कृति 'गीत सागर' काव्य जगत में भरपूर स्नेह पाएगी।मैं उनके सुखी और समृद्ध जीवन की कामना करते हुए स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी के इस शेर के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं :

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, 

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

काव्य सृजन की यह आग कवि रतन के सीने में यूं ही जलती रहे इसी कामना के साथ।

---- ओंकार सिंह विवेक 

साहित्यकार /समीक्षक/ कंटेंट राइटर 


      'गीत सागर' (काव्य-संग्रह) समीक्षा 🌹🌹👈👈










 



No comments:

Post a Comment

Featured Post

पुस्तक समीक्षा -'गीत सागर' (काव्य-संग्रह)

                           पुस्तक समीक्षा                               **********                  कृति : 'गीत सागर ' (...