पुस्तक समीक्षा
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कृति : 'बीत गया है जैसे युग' ग़ज़ल-संग्रह
कृतिकार :सुरेंद्र कुमार सैनी
प्रकाशक :अमृत प्रकाशन शाहदरा दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2021 मूल्य : 275 रुपए
पुस्तक परिचय प्रदाता/समीक्षक : ओंकार सिंह विवेक
साहित्यकार के सृजन के पीछे कोई न कोई प्रेरणा अवश्य रही होती है। वह प्रेरणा प्रेमी/प्रेमिका, घर- परिवार,समाज या देश की स्थिति, कहीं से भी प्राप्त हो सकती है। इस प्रेरणा को आधार बनाकर अपने गहन चिंतन की उड़ान से लेखक /कवि बड़े-बड़े गद्य और काव्य ग्रंथों की रचना कर देते हैं। आज हम ऐसे ही एक वरिष्ठ कवि के रचनाकर्म से आपको रूबरू कराना चाहते हैं जिन्होंने अपनी धर्मपत्नी के असामयिक निधन से उपजी पीड़ा को आधार बनाकर विरह भावनाओं पर 'बीत गया है जैसे युग' शीर्षक से एक बहुत मार्मिक ग़ज़ल संग्रह का सृजन किया है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूं रुड़की ,उत्तराखंड निवासी वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेंद्र कुमार सैनी साहब की।
कुछ समय पूर्व दिल्ली के एक साहित्यिक समारोह में सैनी जी से मुलाक़ात हुई थी।बातचीत करने पर मैंने उनको बहुत संवेदनशील, भावुक तथा निश्छल पाया। सैनी साहब का दूसरा ग़ज़ल संग्रह 'बीत गया है जैसे युग' इस समय मेरे हाथ में है।
ग़ज़ल संग्रह को आधोपांत पढ़कर मैं रचनाकार की विरह वेदना को अच्छी तरह समझ पा रहा हूं। अपनी विरह वेदना को शेर दर शेर, ग़ज़ल दर ग़ज़ल सैनी जी ने जो मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति दी है उसको आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
अपने प्रिय की स्मृतियों में तड़पते हुए कवि की मनोदशा को सैनी जी के इस शेर से भली भांति बात समझा जा सकता है-
जैसे पानी के बिना रेत पे तड़पे मछली,
इस तरह बिन तेरे जीवन को बिताया मैंने।
यह ग़ज़ल संग्रह ऐसे तमाम शेर समेटे हुए है जो उपजे तो रचनाकार की व्यक्तिगत पीड़ा से हैं परंतु पढ़ते-पढ़ते पाठक को अपने हृदय की पीड़ा से जुड़े हुए लगने लगते हैं। शेरों /ग़ज़लों में छुपे हुए मर्म को महसूस करके पाठक अनायास ही रचनाकार से निजता का संबंध बना लेता है। इसी पृष्ठभूमि में कुछ शेर देखें-
कभी इन आंसुओं को नीर की धारा नहीं कहना,
किसी के प्यार की सौग़ात को झूठा नहीं कहना।
निश्छल प्रेम की एक और बानगी देखिए -
मैं तेरा नाम आज तक पुकारता रहा,
वो लौ जो बुझ गई उसे निहारता रहा।
ये शेर और देखें जिनमें कामना और विवशता का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है -
घर मेरा काश! एक पल को फिर,
तेरी मुस्कान से बहल जाता।
दिल को मेरे ख़ुशी बड़ी मिलती,
यम का जो एक वार टल जाता ।
जीवन की सच्चाई और दर्शनिकता भरा यह शेर भी देखें -
हम दोनों के बीच यह दूरी तब तक है,
माटी का घट जब तक टूट नहीं जाता ।
विरह वेदना से दिल में उभरा दर्द और उस दर्द में कही गई ग़ज़लें, यही अब जैसे कवि सुरेंद्र कुमार सैनी जी का जीवन संसार हो गया है। यह मार्मिक पंक्तियां भी देखिए -
बिन तुम्हारे हैं ज़िंदगी ऐसे ,
फूल से ख़ुशबू हो जुदा जैसे।
इस जहां में है हर ख़ुशी ऐसे,
फूल कांटों में हो खिला जैसे ।
सैनी जी की ग़ज़ल का यह मार्मिक शेर पढ़कर किसकी पलकें न भीग जाएंगी भला -
उसके कपड़ों वाला बक्सा जब-जब भी खोला है मैंने,
माज़ी की यादों का सागर मेरे दिल में लहराया है।
हर व्यक्ति के मन में सुनहरे भविष्य और नई आशाओं के न जाने कितने सपने पल रहे होते हैं परंतु विधि के विधान के आगे आदमी कैसे विवश हो जाता है,रचनाकार के इस शेर से भली भांति समझा जा सकता है -
कौन भला जीतेगा अपनी क़िस्मत से ,
अपनी क़िस्मत से जब जीत न पाए राम ।
'बीत गया है जैसे युग' की अधिकांश ग़ज़लों में विरह के प्रणय भाव की जो सहज और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति की गई है वह नि:संदेह ही ग़ज़ल प्रेमियों को अभिभूत करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। एक और शेर दृष्टव्य है :
अब न वो आएंगे वापस यह तो सच है लेकिन,
उनका साया - सा बुलाता है तो हंस देता हूं।
इस शेर में 'साया - सा बुलाता है' में जो मर्मभेदी भाव छुपा है वह पाठक के दिल में उतर जाता है।जो अपना कभी न लौटकर आने के लिए अनंत की यात्रा पर चला गया उसकी याद भला कैसे न आएगी इस शेर को पढ़कर। इसी ग़ज़ल का एक और शेर भी देखें -
सबकी सांसों पे यहां रहता है यम का पहरा,
दंभ फिर कोई दिखाता है तो हँस देता हूं।
कितने शेर कोट किए जाएं इस ग़ज़ल संग्रह के,हर शेर अपने आप में विरह वेदना और प्रणय भाव का जैसे एक समुंदर ही समेटे हुए है। सैनी जी की इन ग़ज़लों की ख़ूबी यह है कि यह अपनी सरल भाषा और रवानी के चलते हर किसी के दिल में उतरने की क़ूवत रखती हैं। ग़ज़लों में कहीं कोई बनावट दिखाई नहीं देती। सैनी जी आम बोलचाल की भाषा में अपने शेरों के माध्यम से पाठक से सीधे संवाद करते हुए दिखाई पड़ते हैं।
मेरा सौभाग्य है कि वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सुरेंद्र कुमार सैनी जी की ग़ज़लों को पढ़ने और उन पर अपने विचार साझा करने का अवसर मिला।मैं सैनी जी को इतनी सहज और शाश्वत प्रणय भावना और अपनी विरह वेदना को ग़ज़लों में ढालकर हमें सौंपने के लिए हार्दिक बधाई देता हूं और ईश्वर से कामना करता हूं कि वह उन्हें दीर्घायु प्रदान करें ताकि भविष्य में हमें सैनी जी की और भी सुंदर काव्य कृतियां पढ़ने को मिलें। अंत में किसी अज्ञात शायर का यह शेर सैनी जी को समर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं :
अजब लहजा है उसकी गुफ़्तगू का,
ग़ज़ल जैसी ज़बाँ वो बोलता है।
---- ओंकार सिंह विवेक
ग़ज़लकार /समीक्षक/ कंटेंट राइटर
Bahut sundar sameeksha
ReplyDeleteHardik aabhar
Deleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 30 अगस्त 2025 को लिंक की जाएगी ....
Deletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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जी ज़रूर, हार्दिक आभार 🙏
ReplyDeleteबहुत सुंदर समीक्षा
ReplyDeleteआभार आदरणीया।
Deleteबेहतरीन समीक्षा 🙏
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका 🙏
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