साहित्यिक मंच रचनाकार के सातवें स्थापना दिवस पर प्रकाशित पत्रिका 'रचनाकार' में हमारी ग़ज़ल को भी स्थान मिला।इस प्रतिष्ठित मंच से पिछले कई वर्ष से समीक्षक के रूप में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त रहा है।पत्रिका में रचना को स्थान देने के लिए संपादक मंडल का आभार व्यक्त करते हुए मैं संस्था के निरंतर पल्लवित और पुष्पित होने की कामना करता हूँ।
आप भी इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए :
ग़ज़ल
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कभी कुछ शादमानी लिख रहा हूँ,
कभी मैं सरगिरानी लिख रहा हूँ।
हवाओं के सितम की हर कहानी,
चराग़ों की ज़ुबानी लिख रहा हूँ।
बहुत दिन तक न चल पाएगी जग में,
बुरों की हुक्मरानी, लिख रहा हूँ।
मैं सरगम लिख रहा हूँ गीत की भी,
ग़ज़ल की भी रवानी लिख रहा हूँ।
कई तो हैं ख़फा़ इस पर ही मुझसे,
कि मैं पानी को पानी लिख रहा हूँ।
पिता को लिख रहा हूँ एक राजा,
मैं अपनी माँ को रानी लिख रहा हूँ।
समझ लो कैसे फिर किरदार होंगे,
सियासत की कहानी लिख रहा हूँ।
-- ओंकार सिंह विवेक
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