महफ़िलें सजती रहें शेर-ओ-सुख़न की,
मश्क़ हो ही जाएगी ख़ुद फ़िक्र-ओ-फ़न की।
कैसे मुमकिन है बिना कुछ सोचे-समझे,
बात हम करते रहें बस उनके मन की।
है मुसलसल ख़ास लोगों के असर में,
क्या सुनेगा बात हाकिम आम जन की।
आओ कर लें पहले भूमंडल की चिंता,
नाप ली जाएगी दूरी फिर गगन की।
सुनके आँखों में न आते कैसे आँसू,
थी कथा वो राम जी के वन गमन की।
कामयाबी की बुलंदी चूमने में,
भूमिका होती है सब मेहनत-लगन की।
होती है माँ-बाप की बस इतनी ख़्वाहिश,
बात समझें काश! बच्चे उनके मन की।
ग़ज़ल 2
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फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन
ज्यूँ ही रथ पर चढ़के सूरज आ गया,
देखकर कुहरा उसे थर्रा गया।
आदमी मिलते थे जब दिल खोलकर,
दोस्तो वो दौर तो कब का गया।
बस गए हम शहर में आकर मगर,
गाँव से रिश्ता नहीं तोड़ा गया।
कोठियों में बँट गई सब रौशनी,
झुग्गियों का फिर से हक़ मारा गया।
देखते हैं क्या नतीजा आए अब,
पर्चा तो इस बार भी अच्छा गया।
देखा कितनों को ही बग़लें झाँकते,
आईना महफ़िल में जब रक्खा गया।
हो गए महफ़िल में सब उसके मुरीद,
अपने शे'रों से ग़ज़ब वो ढा गया।
--- ओंकार सिंह विवेक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)