August 12, 2025

कविता में ढालकर

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कुछ घटनाओं और परिस्थितियों को देकर जैसा चिंतन किया उसे दोहों में ढालकर आपकी अदालत में पेश कर रहा हूँ, प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए 🙏

जो  सूरज  प्रतिदिन  यहाँ, उगल  रहा  था  आग।

उमड़े    बादल   देखकर,गया  अचानक   भाग।।

क्या  दिन  थे  जब  गाँव  में,बरगद पीपल नीम।

होते   थे   सबके  लिए,घर   के    वैद्य-हकीम।।

                         ©️ ओंकार सिंह विवेक


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     अब तो बस पिंजरा है उसमें ------🌹🌹👈👈


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