मुक्तक काव्य की ऐसी विद्या है जिसमें चार पंक्तियों में ही बड़ी मारक बात कह दी जाती है।पहली दो पंक्तियों में किसी विषय को उठाकर अंतिम पंक्तियों में बड़े कौशल के साथ शिल्प का निर्वहन करते हुए विषय को पूर्ण करना ही अच्छे मुक्तककार की पहचान है।
मैंने दो मुक्तकों के सृजन का प्रयास किया है जो आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं। प्रतिक्रिया से अवश्य ही अवगत कराएं 🙏
मुक्तक 1
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मुरझाए से हैं सब चेहरे जो रहते थे खिले हुए,
साफ़ दिखाई देते हैं विश्वास परस्पर हिले हुए।
कैसे क़ाबू पाया जाए बोलो दहशतगर्दी पर,
अंदर वाले ही जब हों बाहर वालों से मिले हुए।
मुक्तक 2
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न ही भर पेट खाता है न पूरी नींद सोता है,
अधिक सामर्थ्य से अपनी हमेशा बोझ ढोता है।
जिसे श्रम की कभी अपने उचित क़ीमत नहीं मिलती,
वही मज़दूर होता है वही मज़दूर होता है।
----ओंकार सिंह विवेक